Punjabi Devi Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

Choti Moti Nimiya Gachhiya Lagal Amresh Bunty & Rinki Pandey Devigeet Bhakt

पढ़ें Choti Moti Nimiya Gachhiya Lagal Amresh Bunty & Rinki Pandey Devigeet Bhojpuri Bhakt - Bhaktilok का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा वि

भोजपुरी लोक संस्कृति और भक्ति परंपरा में देवी गीतों का एक अत्यंत विशिष्ट और भावपूर्ण स्थान है। 'छोटी मोटी निमिया गाछिया लगल' (Choti Moti Nimiya Gachhiya Lagal) एक ऐसा ही कालजयी और पारंपरिक भोजपुरी देवी गीत है, जिसे सुप्रसिद्ध लोक कलाकार अमरेश बंटी और रिंकी पाण्डेय ने अपनी मधुर आवाज में गाकर जीवंत किया है। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं है, बल्कि यह पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों में सदियों से चली आ रही मातृ-शक्ति की उपासना का संगीतमय दस्तावेज है। इस भजन में 'निमिया' (नीम का पेड़) को देवी माँ का साक्षात निवास स्थान मानकर उनके प्रति अनन्य श्रद्धा और वात्सल्य भाव प्रकट किया गया है। जब कोई भक्त इस गीत को गाता है, तो उसका हृदय माँ दुर्गा की ममतामयी छाया में विश्राम पाता है। इस लेख में हम इस पावन देवी गीत के सम्पूर्ण लिरिक्स, उसके गहरे आध्यात्मिक भावार्थ, सांस्कृतिक महत्व और लोक परंपरा में इसके स्थान का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

मंगलाचरण व स्थायी:

जय-जय विंध्यवासिनी मैया, जय-जय शीतला माई।
तोहरी शरण में जो भी आवे, सो सब सुख संपति पाई॥

छोटी मोटी निमिया गाछिया लगल मोरे अँगना हो ना।
तहु पर झुलुआ लगावेली मोरी मैया हो ना॥
छोटी मोटी निमिया गाछिया लगल मोरे अँगना हो ना।
तहु पर झुलुआ लगावेली मोरी मैया हो ना॥

अंतरा १:

सोने के खड़ऊआ मैया पाँवे पहिरी आवेली हो ना।
हाथवा में कंचन थरिया हो ना॥
सोने के खड़ऊआ मैया पाँवे पहिरी आवेली हो ना।
हाथवा में कंचन थरिया हो ना॥
मैया के सोहे माथे बिंदिया, चमके चुनरिया हो ना।
तहु पर झुलुआ लगावेली मोरी मैया हो ना॥

अंतरा २:

लाल-लाल फूलवा मैया तोहे चढ़ी जाई हो ना।
भक्त पुकारे तोरी दुअरिया हो ना॥
लाल-लाल फूलवा मैया तोहे चढ़ी जाई हो ना।
भक्त पुकारे तोरी दुअरिया हो ना॥
नारियल चुनरिया चढ़ाई के, पूजे चरनिया हो ना।
तहु पर झुलुआ लगावेली मोरी मैया हो ना॥

अंतरा ३:

अमरेश बंटी गावे रिंकी पाण्डेय संगवा हो ना।
मैया जी के महिमा अपार हो ना॥
अमरेश बंटी गावे रिंकी पाण्डेय संगवा हो ना।
मैया जी के महिमा अपार हो ना॥
भक्तन के बेड़ा पार लगावेली मोरी मैया हो ना।
तहु पर झुलुआ लगावेली मोरी मैया हो ना॥

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

इस पारंपरिक भोजपुरी देवी गीत का भावार्थ अत्यंत सरल होने के साथ-साथ गहरा और मर्मस्पर्शी है। लोक मानस में ईश्वर को बहुत दूर आकाश में रहने वाला कोई अमूर्त तत्व नहीं, बल्कि अपने घर-आँगन का एक सदस्य माना जाता है। यही कारण है कि भक्त अपने घर के आँगन में लगे नीम के छोटे से पेड़ पर अपनी आराध्य देवी के लिए झूला डालने की कल्पना करता है।

स्थायी का भावार्थ (आँगन में माँ का वास):

गीत की शुरुआत में भक्त कहता है कि मेरे आँगन में नीम का एक छोटा सा पेड़ (निमिया गाछिया) लगा हुआ है। यह पेड़ केवल एक वनस्पति नहीं है, बल्कि यह साक्षात देवी का आसन है। इस नीम के पेड़ पर मेरी मैया (भगवती) आकर झूला झूलती हैं। यहाँ 'आँगन' मानव हृदय का प्रतीक है और 'नीम का पेड़' पवित्रता और शीतलता का। जब भक्त का हृदय शुद्ध होता है, तो माँ स्वयं वहाँ आकर क्रीड़ा (लीला) करती हैं।

प्रथम अंतरे का भावार्थ (दिव्य रूप का दर्शन):

प्रथम अंतरे में माँ के दिव्य और अलौकिक श्रृंगार का वर्णन है। माँ अपने पावन चरणों में सोने की खड़ाऊँ (पादुका) धारण करके आ रही हैं। उनके हाथों में सोने की थाली (कंचन थरिया) सुशोभित है, जिसमें पूजा की सामग्री सजी है। माँ के मस्तक पर दिव्य बिंदिया और शरीर पर लाल चुनरी अत्यंत सुशोभित हो रही है। इस दिव्य रूप को देखकर भक्त का मन आनंद से भर जाता है और वह माँ के इस रूप को अपने नयनों में बसा लेना चाहता है।

द्वितीय अंतरे का भावार्थ (भक्त की पुकार और समर्पण):

द्वितीय अंतरे में भक्त की पूजा पद्धति और समर्पण का चित्रण है। भक्त माँ को लाल रंग के पुष्प (विशेषकर अड़हुल या गुड़हल का फूल, जो देवी को अत्यंत प्रिय है) अर्पित करता है। माँ के द्वार पर खड़े होकर भक्त उन्हें करुण स्वर में पुकार रहे हैं। वे माँ के चरणों में नारियल, चुनरी और नैवेद्य अर्पित कर रहे हैं। यह समर्पण इस बात का प्रतीक है कि भक्त अपना सर्वस्व माँ के चरणों में अर्पित कर चुका है।

तृतीय अंतरे का भावार्थ (कलाकारों की वंदना और मोक्ष की कामना):

अंतिम अंतरे में गायक अमरेश बंटी और गायिका रिंकी पाण्डेय माँ की महिमा का गान करते हुए कहते हैं कि माँ की महिमा अनंत और अपार है। जो भी भक्त सच्चे मन से माँ की शरण में आता है, माँ उसका बेड़ा पार लगा देती हैं अर्थात उसे इस संसार रूपी भवसागर से मुक्ति प्रदान करती हैं।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस देवी गीत की मुख्य भावना 'वात्सल्य' और 'पूर्ण समर्पण' है। हिंदू धर्म में प्रकृति को ईश्वर का ही रूप माना गया है। नीम के पेड़ को आयुर्वेद में अत्यंत गुणकारी और वातावरण को शुद्ध करने वाला माना गया है। लोक आस्था में नीम को 'शीतला देवी' का स्वरूप माना जाता है, जो चेचक, ज्वर और अन्य शारीरिक व मानसिक संतापों को दूर करती हैं।

इस गीत का मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर को पाने के लिए किसी कठिन तपस्या या आडंबर की आवश्यकता नहीं है। यदि आपके मन में सच्ची श्रद्धा है, तो आप अपने घर के आँगन में लगे एक साधारण से नीम के पेड़ में भी साक्षात जगदम्बा का दर्शन कर सकते हैं। यह गीत हमें प्रकृति से जुड़ने, पर्यावरण का सम्मान करने और अपनी लोक संस्कृति के प्रति गौरव का अनुभव करने की सीख देता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण (Parameter) जानकारी (Information)
गीत का नाम (Song Name) छोटी मोटी निमिया गाछिया लगल (Choti Moti Nimiya Gachhiya Lagal)
गायक (Singers) अमरेश बंटी (Amresh Bunty) एवं रिंकी पाण्डेय (Rinki Pandey)
गीत का प्रकार (Genre) भोजपुरी देवी गीत / पारंपरिक भजन (Bhojpuri Devi Geet)
मुख्य भाषा (Language) भोजपुरी (Bhojpuri)
मुख्य विषय (Theme) देवी माँ की आराधना, प्रकृति पूजा, वात्सल्य भाव
संबद्ध देवी (Associated Deity) माँ दुर्गा, शीतला माता, विंध्यवासिनी मैया
मुख्य वाद्य यंत्र (Instruments) ढोलक, हारमोनियम, मंजीरा, झीका

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

इस गीत को अपनी सुरीली आवाज से सजाने वाले कलाकार अमरेश बंटी और रिंकी पाण्डेय भोजपुरी लोक संगीत जगत के जाने-माने नाम हैं। अमरेश बंटी ने अपनी पारंपरिक गायकी शैली से इस भजन को एक विशेष गहराई दी है, वहीं रिंकी पाण्डेय की सुरीली और भक्तिपूर्ण आवाज ने इस गीत को हर घर-आँगन का हिस्सा बना दिया है। इन दोनों कलाकारों की जुगलबंदी ने इस पारंपरिक लोक गीत को आधुनिक श्रोताओं के बीच भी अत्यंत लोकप्रिय बना दिया है। इस गीत का संगीत पारंपरिक लोक धुनों पर आधारित है, जो सीधे सुनने वाले के हृदय को छूता है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द (Word) सरल हिंदी अर्थ (Meaning) सांस्कृतिक संदर्भ (Context)
निमिया (Nimiya) नीम का पेड़ (Neem Tree) देवी शीतला और दुर्गा का प्राकृतिक निवास स्थान माना जाता है।
गाछिया (Gachhiya) छोटा वृक्ष या पौधा भोजपुरी लोक भाषा में आदर और स्नेह सूचक शब्द।
अँगना (Angana) घर का आँगन (Courtyard) पारिवारिक और आध्यात्मिक केंद्र का प्रतीक।
झुलुआ (Jhuluwa) झूला (Swing) देवी माँ की आनंदमयी क्रीड़ा और लीला का प्रतीक।
खड़ऊआ (Khadauwa) लकड़ी या धातु की खड़ाऊँ (Paduka) संतों और देवताओं द्वारा धारण की जाने वाली पावन चरण पादुका।
कंचन थरिया (Kanchan Thariya) सोने की थाली माँ की पूजा के लिए प्रयुक्त अत्यंत पवित्र और बहुमूल्य पात्र।
दुअरिया (Duariya) द्वार या चौखट (Doorstep) माँ का पावन दरबार जहाँ भक्त अपनी अर्जी लगाते हैं।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

भारतीय सनातन परंपरा में वृक्षों की पूजा का विधान अत्यंत प्राचीन काल से रहा है। वेदों और पुराणों में पीपल, बरगद, तुलसी और नीम जैसे वृक्षों को पूजनीय माना गया है। 'निमिया' यानी नीम का पेड़ औषधीय गुणों की खान है। यह हवा को शुद्ध करता है और कई प्रकार के रोगों का नाश करता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, नीम को 'शीतलता' प्रदान करने वाला माना गया है, इसलिए इसे शीतला माता से जोड़ा जाता है।

सांस्कृतिक रूप से, यह गीत पूर्वी भारत (विशेषकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश) के लोक जीवन का अभिन्न अंग है। चैत्र और शारदीय नवरात्रि के समय हर मंदिर, पंडाल और घर में यह गीत गूँजता है। यह गीत शहरी चकाचौंध से दूर, मिट्टी की सोंधी खुशबू और ग्रामीण जीवन की सरल भक्ति को दर्शाता है। जब महिलाएँ समूह में एकत्र होकर इस गीत को गाती हैं, तो पूरा वातावरण अत्यंत पवित्र और भक्तिमय हो जाता है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यद्यपि यह एक भक्ति गीत है, परंतु यह हमें व्यावहारिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  • सरलता और सहजता: ईश्वर को पाने के लिए किसी महंगे अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है। एक छोटा सा नीम का पेड़ और श्रद्धा से भरा हृदय ही काफी है।
  • प्रकृति का संरक्षण: यह गीत हमें सिखाता है कि पेड़-पौधे केवल ऑक्सीजन देने के साधन नहीं हैं, बल्कि वे हमारे आराध्य का निवास स्थान हैं। अतः हमें पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए।
  • सामूहिकता की भावना: लोक गीतों को सामूहिक रूप से गाया जाता है, जो समाज में एकता, भाईचारे और समरसता को बढ़ावा देता है।
  • कृतज्ञता: माँ के चरणों में नारियल और चुनरी अर्पित करना इस बात का प्रतीक है कि जो कुछ भी हमें मिला है, वह ईश्वर का ही दिया हुआ है और हमें उनके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

इस पावन देवी गीत को गाने और सुनने के कई विशेष अवसर हैं:

मुख्य रूप से नवरात्रि व्रत विधि के नौ दिनों के दौरान इस गीत का श्रवण अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, मंगलवार और शुक्रवार को, जो देवी उपासना के विशेष दिन हैं, घरों में इस भजन को बजाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जब किसी बच्चे को चेचक (माता) निकलती है, तब भी माँ शीतला को शांत करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए महिलाएँ इस गीत का गान करती हैं। विंध्याचल, मैहर और थावे जैसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों की यात्रा के समय भी श्रद्धालु इस गीत को बड़े चाव से गाते हैं।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

विषय (Topic) संक्षिप्त विवरण (Quick Facts)
गीत का शीर्षक छोटी मोटी निमिया गाछिया लगल
मुख्य कलाकार अमरेश बंटी और रिंकी पाण्डेय
विधा पारंपरिक भोजपुरी देवी गीत (भक्ति रस)
मुख्य प्रतीक निमिया का पेड़ (शीतलता और आरोग्यता का प्रतीक)
उपयुक्त अवसर शारदीय व चैत्र नवरात्रि, मंगलवार पूजा, देवी जागरण
आध्यात्मिक संदेश प्रकृति में ईश्वर का वास और सरल भक्ति का महत्व

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न १: 'छोटी मोटी निमिया गाछिया लगल' गीत के मुख्य गायक कौन हैं?

उत्तर: इस सुप्रसिद्ध भोजपुरी देवी गीत को अमरेश बंटी (Amresh Bunty) और रिंकी पाण्डेय (Rinki Pandey) ने अपनी मधुर आवाज में गाया है।

प्रश्न २: देवी गीतों में 'निमिया' (नीम) के पेड़ का क्या महत्व है?

उत्तर: हिंदू लोक मान्यताओं में नीम के पेड़ को अत्यंत पवित्र माना गया है। इसे साक्षात देवी शीतला और माँ दुर्गा का वास स्थान माना जाता है। नीम के औषधीय और वातावरण को शुद्ध करने वाले गुणों के कारण इसे पूजनीय माना गया है।

प्रश्न ३: यह गीत किस भाषा में लिखा गया है?

उत्तर: यह गीत भोजपुरी भाषा में लिखा गया है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के बड़े हिस्से में बोली जाती है।

प्रश्न ४: इस गीत को मुख्य रूप से कब गाया जाता है?

उत्तर: इस गीत को मुख्य रूप से चैत्र और शारदीय नवरात्रि, देवी जागरण, मुंडन संस्कार, और मंगलवार व शुक्रवार की साप्ताहिक पूजा के अवसर पर गाया जाता है।

प्रश्न ५: गीत में 'कंचन थरिया' और 'सोने के खड़ऊआ' का क्या अर्थ है?

उत्तर: 'कंचन थरिया' का अर्थ है सोने की थाली और 'सोने के खड़ऊआ' का अर्थ है सोने की चरण पादुका। ये माँ लक्ष्मी और दुर्गा के ऐश्वर्यमयी और दिव्य स्वरूप को दर्शाते हैं।

प्रश्न ६: क्या यह एक पारंपरिक लोक गीत है या आधुनिक रचना है?

उत्तर: यह मूल रूप से एक पारंपरिक भोजपुरी लोक गीत है, जिसे पीढ़ियों से गाया जा रहा है। अमरेश बंटी और रिंकी पाण्डेय ने इसे नए संगीत और सुरीली आवाज के साथ पुनः रिकॉर्ड करके लोकप्रिय बनाया है।

प्रश्न ७: इस गीत को सुनने से क्या आध्यात्मिक लाभ मिलता है?

उत्तर: इस गीत को सुनने से मन को असीम शांति मिलती है, मानसिक तनाव दूर होता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह माँ दुर्गा के प्रति हमारी भक्ति को सुदृढ़ करता है।

प्रश्न ८: देवी माँ को लाल रंग के फूल और चुनरी क्यों चढ़ाई जाती है?

उत्तर: लाल रंग शक्ति, ऊर्जा, और सौभाग्य का प्रतीक है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, माँ भगवती को लाल रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें लाल फूल (अड़हुल) और लाल चुनरी अर्पित की जाती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन की समीक्षा करते हुए हमारे विद्वान संपादकों ने पाया कि यह गीत भोजपुरी लोक मानस की आत्मा को दर्शाता है। जहाँ शास्त्रीय ग्रंथों में माँ दुर्गा की आराधना के लिए कठिन मंत्रों और यज्ञों का विधान है, वहीं लोक साहित्य में उन्हें अत्यंत सरल और सुलभ रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह गीत शास्त्रीय मर्यादा और लोक सरलता का एक अनूठा संगम है। इस गीत के माध्यम से नई पीढ़ी अपनी समृद्ध लोक विरासत और प्रकृति पूजा की महान परंपरा से जुड़ सकती है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवी भागवत पुराण: देवी के विभिन्न रूपों और उनकी प्रकृति-पूजा के शास्त्रीय आधार।
  • भोजपुरी लोक साहित्य एवं संस्कृति: पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के पारंपरिक देवी गीतों का संग्रह।
  • आयुर्वेद एवं वृक्षायुर्वेद: नीम (निमिया) के पेड़ के औषधीय और आध्यात्मिक गुणों का विवरण।
  • पारंपरिक मौखिक परंपरा: ग्रामीण अंचलों में बुजुर्ग महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक सोहर और देवी गीत।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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