Chhath Puja Geet मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

ऊगी ए सुरुज देव लेईली अरघीया छठपरब वीडियो

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ऊगी ए सुरुज देव लेईली अरघीया - छठी मइया और सूर्य उपासना का पावन लोकगीत

सनातन संस्कृति और लोक परंपराओं में छठी मइया और सूर्य देव की उपासना का पर्व अत्यंत श्रद्धा, पवित्रता और निष्ठा के साथ मनाया जाता है। लोक आस्था के महापर्व छठ के अवसर पर गाए जाने वाले पारंपरिक गीत, भजन और लोकगीत इस पर्व के अध्यात्म और उल्लास को द्विगुणित कर देते हैं। "ऊगी ए सुरुज देव लेईली अरघीया" केवल एक सामान्य गीत नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, सूर्य नारायण और छठी मइया के प्रति एक विरह, समर्पण और अटूट विश्वास से भरी हुई पुकार है। पूर्वांचल, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कोने-कोने में गूंजने वाला यह पावन लोकगीत हर व्रतधारी के अंतर्मन को झकझोर देता है। इस विस्तृत लेख में हम इस भजन के बोल, इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ, सूर्य उपासना का महत्व, लोक परंपरा और छठ पर्व की महिमा का सविस्तार अध्ययन करेंगे, जिससे साधक इस गीत के मर्म को भली-भांति समझ सकें।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थायी (मुखड़ा):

ऊगी ए सुरुज देव लेईली अरघीया,
अरघ के बेरिया भेल बिहान छियै हे!
सुगा धइले धनुष से खेलैथ सुरुज देव,
दर्शन दियै न मोर भगवान छियै हे...

अंतरा 1:

घाटवा पर उमड़ल बानी भारी भीड़,
केकरा से पुछी सुरुज देव के डहरिया?
भउजी रे मोरी पतरकी, अरघ सजवले बानी,
देखs सुरुज देव भइले बिसुरिया छियै हे...

अंतरा 2:

काँचहि बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय,
बहंगी के पहुँचावे घाट पहुंचल बानी राय।
दीन दुखी के तूहीं तारणहार छियै हे,
हमरा अउरतिया के राखिहौ लाज छियै हे...

अंतरा 3:

सुरुज देवता तs जग के उजियारा,
तेहूँ बिनु जीवन लागे अन्धियारा।
छठी मइया तोहर महिमा अपार छियै हे,
तोहरे किरपा से बसे संसार छियै हे...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह पारंपरिक लोकगीत सूर्य देव और छठी मइया के प्रति एक निश्छल भक्त की मार्मिक पुकार है। गीत के मुखड़े में व्रती या भक्त सूर्य भगवान से प्रार्थना करता है कि हे सूरज देव! अब सुबह हो चुकी है, अरघ (अर्घ्य) का समय बीत रहा है, कृपया प्रकट होकर हमारा अर्घ्य स्वीकार करें। भक्त की भावना इतनी पवित्र और अनन्य है कि वह सूर्य देव की प्रतीक्षा में व्याकुल है।

आगे की पंक्तियों में छठ घाट के दृश्यों का सजीव चित्रण किया गया है। घाट पर भारी भीड़ उमड़ी हुई है, और भक्त अपनी लोक परंपरा के अनुसार बांस की बहंगी पर पूजा की सामग्रियां सजाकर पवित्र जल स्रोतों (नदी, तालाब, पोखर) के तट पर पहुंचे हैं। काँचहि बांस (कच्चे बांस) की बहंगी का लचकना और व्रतियों का कठिन नियमों का पालन करते हुए आगे बढ़ना इस पर्व की कठोर साधना को दर्शाता है।

गीत के अंत में भगवान सूर्य को जगत का उजियारा और संकटमोचन बताया गया है। भक्त यह विनती करता है कि जिस प्रकार सूर्य संपूर्ण संसार को प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार हमारे जीवन के अंधकार को भी दूर करें और हमारे परिवार तथा वंश की रक्षा करें। छठी मइया की महिमा का गुणगान करते हुए यह गीत पारिवारिक सुख, आरोग्य और संतान की दीर्घायु की कामना से ओत-प्रोत है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह गीत सनातन संस्कृति के उस मूल आधार को दर्शाता है जहाँ प्रत्यक्ष देवता यानी भगवान सूर्य की उपासना की जाती है। इस लोकगीत की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • प्रत्यक्ष देवता की उपासना: इसमें सूर्य भगवान को साक्षात रूप में पुकारा गया है, जिन्हें आंखों से देखा जा सकता है और जिनकी ऊर्जा से संपूर्ण ब्रह्मांड पोषित होता है।
  • लोक भाषा और माधुर्य: यह गीत भोजपुरी और अंगिका/मैथिली के ठेठ लोक शब्दों से सजा हुआ है, जो सीधे हृदय को स्पर्श करता है।
  • कठिन साधना और समर्पण: छठ महापर्व के दौरान 36 घंटे के निर्जला व्रत और अनुशासन का सजीव चित्रण इसमें मिलता है।
  • पारिवारिक कल्याण: यह भजन केवल व्यक्तिगत मुक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज, परिवार और संतान की सुख-समृद्धि के लिए गाया जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस पावन लोकगीत को गाने और सुनने के विशेष अवसर और नियम होते हैं:

  • छठ महापर्व के दौरान: यह गीत मुख्य रूप से कार्तिक शुक्ल षष्ठी और उसके आसपास यानी नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के समय गाया जाता है।
  • घाट यात्रा के समय: जब महिलाएं और पुरुष सूप और दउरा लेकर माथे पर प्रसाद रखकर छठ घाट की ओर प्रस्थान करते हैं, तब यह गीत समूह में गाया जाता है।
  • सांस्कृतिक अनुष्ठानों में: लोक संस्कृति के संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों और पारंपरिक बैठकों में इस प्रकार के भजनों का विशेष स्थान है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस गीत के केंद्र में मुख्य रूप से दो दिव्य शक्तियां हैं - भगवान सूर्य नारायण और माता छठी (षष्ठी देवी)।

  • सूर्य देव: वे आरोग्य, तेज, आयु और ऊर्जा के प्रदाता हैं। वेदों में उन्हें 'आरोग्यं दिवाकरः' कहा गया है।
  • छठी मइया: इन्हें प्रकृति की देवी और भगवान सूर्य की बहन या शक्ति माना जाता है, जो संतानों की रक्षा और उनकी लंबी आयु का वरदान देती हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन ठेठ लोक शैली (Folk Style) में रचा गया है। इसकी भाषा भोजपुरी और मैथिली का सुंदर मिश्रण है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे 'सुरुज देव', 'अरघीया', 'बेरिया', 'बहंगिया', और 'डहरिया' ग्रामीण अंचल की सोंधी खुशबू और लोक संस्कृति की गहराई को प्रकट करते हैं। बिना किसी कृत्रिम अलंकार के यह गीत सीधे लोकमानस से जुड़ा हुआ है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह लोकगीत हमें कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सिखाता है:

  • प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: जल, सूर्य, वायु और पृथ्वी के प्रति आभार व्यक्त करने का यह सबसे बड़ा उत्सव है।
  • कठिन परिस्थितियों में अडिग रहना: जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं, व्रत और साधना के माध्यम से लक्ष्य तक पहुंचना सिखाता है।
  • सामूहिकता और भाईचारा: छठ घाट पर जाति, वर्ग और भेदभाद से ऊपर उठकर सभी का एक साथ मिलकर उत्सव मनाना समाज में समरसता का संदेश देता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पद सरल अर्थ सांस्कृतिक संदर्भ
सुरुज देव सूर्य भगवान प्रत्यक्ष देवता और ऊर्जा के स्रोत
अरघीया / अरघ अर्घ्य जल और दूध से सूर्य को दिया जाने वाला जल अर्पित करना
बेरिया समय / वेला पूजा का निश्चित शुभ मुहूर्त
बहंगिया बांस का बना ढांचा जिस पर दोनों ओर प्रसाद रखकर कंधे पर उठाया जाता है
बिसुरिया प्रतीत होना / विलंब होना सूर्य के दर्शन में देरी होना

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

गीत की प्रत्येक पंक्ति भक्त की उस तड़प को दर्शाती है जो वह अपने आराध्य के दर्शन के लिए महसूस करता है। जब व्रती पूरे दिन निर्जला रहकर संध्या या सुबह के समय जल में खड़े होकर सूर्य देव की प्रतीक्षा करते हैं, तो उनका रोम-रोम इसी प्रार्थना में लीन रहता है कि हे भगवान, अब और प्रतीक्षा न कराएं, दर्शन देकर हमारे व्रत को सफल बनाएं। बहंगी के माध्यम से घर से घाट तक की यात्रा इस बात का प्रतीक है कि जीवन का हर एक भार ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

सूर्य उपासना से संबंधित यह वैदिक मंत्र इस भजन के भाव को और अधिक दृढ़ करता है:

ॐ घृणि सूर्याय नमः

एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकंपय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन / गीत का नाम ऊगी ए सुरुज देव लेईली अरघीया
संबंधित पर्व छठ महापर्व
आराध्य देवी-देवता सूर्य देव एवं छठी मइया
भाषा / शैली भोजपुरी / लोकगीत
मुख्य भाव भक्ति, प्रतीक्षा, समर्पण और प्रकृति प्रेम
गाने का अवसर कार्तिक एवं चैती छठ पूजा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह पारंपरिक लोकगीत मुख्य रूप से लोक आस्था के महापर्व 'छठ पूजा' के दौरान संध्या अर्घ्य और सुबह के अर्घ्य के समय, घाट पर जाते समय गाया जाता है।

सूर्य देव प्रत्यक्ष देवता हैं जो समस्त जीवन को ऊर्जा, प्रकाश, स्वास्थ्य और आयु प्रदान करते हैं। उनकी कृपा से ही प्रकृति का चक्र सुचारू रूप से चलता है।

यह गीत ठेठ भोजपुरी और अंगिका लोकभाषा में रचा गया है, जो उत्तर भारत की लोक संस्कृति की गहरी छाप छोड़ता है।

यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है, किंतु अब यह देश-विदेश में जहां भी पूर्वांचल के लोग रहते हैं, वहां धूमधाम से मनाया जाता है।

बहंगी बांस का एक पारंपरिक उपकरण होता है जिसके दोनों सिरों पर टोकरी (दउरा) बांधकर प्रसाद रखा जाता है और व्रती या उनके परिजन इसे कंधे पर उठाकर घाट तक ले जाते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत पारंपरिक लोक साहित्य, व्रतों के लोकगीतों और सांस्कृतिक मान्यताओं का गहन अध्ययन करके प्रस्तुत की गई है। इसका उद्देश्य पाठकों को लोक संस्कृति की गहराई से परिचित कराना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पारंपरिक लोकगीत संग्रह एवं मौखिक परंपराएं
  • सनातन व्रत एवं त्योहार संस्कृति, ग्रंथ संदर्भ
  • सूर्य पुराण एवं वैदिक ज्योतिषीय मान्यताएं

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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