Ganga Bhajan बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

Maa Ganga Shri Vishnu Ke Charno Mein Rehti

माँ गंगा श्री विष्णु के चरणों में रहती भजन के लिरिक्स, अर्थ और महिमा पढ़ें। जानें गंगा जी के अवतरण की अलौकिक गाथा Bhaktilok पर।

सनातन धर्म में माँ गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि साक्षात् चैतन्यमयी देवी, मोक्षदायिनी और पतित-पावनी शक्ति हैं। "माँ गंगा श्री विष्णु के चरणों में रहती" यह पावन भजन भगवान विष्णु के श्रीचरणों से गंगा जी की उत्पत्ति और उनके पृथ्वी पर अवतरण की अलौकिक गाथा को अत्यंत मधुर और भक्तिमय रूप में प्रस्तुत करता है। यह भजन साधक के अंतःकरण में श्रद्धा, समर्पण और वैराग्य के भाव जाग्रत करता है। जब हम इस भजन का श्रवण या गायन करते हैं, तो हमें गंगा मैया के उस दिव्य स्वरूप का स्मरण होता है जो त्रिपथगा बनकर तीनों लोकों को पवित्र करती हैं। इस भजन का मुख्य भाव भगवान विष्णु के प्रति अनन्य भक्ति और माँ गंगा की असीम करुणा है, जो अपने स्पर्श मात्र से मनुष्यों के जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय कर देती हैं।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ माँ गंगा श्री विष्णु के चरणों में रहती ॥

(स्थायी)
माँ गंगा श्री विष्णु के चरणों में रहती,
चरणों में रहती, सदा पावन बहती।
भागीरथ की तपस्या से धरती पे आई,
पतित पावन करके मुक्ति दिलाई॥

(अंतरा - 1)
विष्णु के चरणों से निकली है धारा,
जिसने है सारे जग को संवारा।
ब्रह्मा के कमंडल से होकर के गुजरी,
शिव की जटाओं में आकर के बिखरी।
भोले की जटा से जो धरती पे आई,
पतित पावन करके मुक्ति दिलाई॥

(अंतरा - 2)
पापों को धोती है मैया हमारी,
महिमा है इसकी जग में न्यारी।
जो भी नहाए गंगा के पानी,
उसकी तो सुधरे जनम की कहानी।
भवसागर से सबको पार लगाती,
चरणों में रहती, सदा पावन बहती॥

(अंतरा - 3)
हरिद्वार, काशी में महिमा है भारी,
आरती उतारे यहाँ दुनिया सारी।
गंगा की लहरें जो अमृत बहातीं,
भक्तों के संकट को पल में मिटातीं।
शरण में जो आए उसे अपना बनाती,
माँ गंगा श्री विष्णु के चरणों में रहती॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन माँ गंगा के दिव्य और अलौकिक स्वरूप की वंदना करता है। इसका सरल अर्थ और भावार्थ इस प्रकार है:

विष्णु चरणों की महिमा: भजन की शुरुआत में ही यह स्पष्ट किया गया है कि माँ गंगा का मूल उद्गम भगवान श्री हरि विष्णु के चरण कमल हैं। जब वामन अवतार में भगवान विष्णु ने अपना पैर ब्रह्मांड की सीमा तक बढ़ाया, तब ब्रह्मा जी ने उनके चरण प्रक्षालन के जल को अपने कमंडल में सुरक्षित रख लिया। यही जल गंगा के रूप में प्रवाहित हुआ। इसलिए इन्हें 'विष्णुपदी' भी कहा जाता है।

भागीरथ का तप और शिव की जटाएं: राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों (सगर के साठ हजार पुत्रों) की मुक्ति के लिए घोर तपस्या की। गंगा का वेग इतना तीव्र था कि यदि वे सीधे पृथ्वी पर आतीं, तो पृथ्वी रसातल में चली जाती। इस वेग को नियंत्रित करने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया। जटाओं से शांत होकर गंगा जी पृथ्वी पर अवतरित हुईं और भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार किया।

मुक्ति और पावनता का संदेश: भजन का मूल संदेश यह है कि गंगा जल केवल पानी नहीं, बल्कि साक्षात् अमृत है। जो भी मनुष्य श्रद्धापूर्वक गंगा में स्नान करता है या उनके नाम का स्मरण करता है, उसके त्रिविध ताप (दैहिक, दैविक, भौतिक) नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • त्रिपथगा स्वरूप का वर्णन: इस भजन में गंगा जी के तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) में बहने वाले स्वरूप का संकेत मिलता है।
  • हरि-हर का समन्वय: गंगा जी विष्णु के चरणों से निकलती हैं और शिव के मस्तक पर विराजती हैं। यह भजन वैष्णव और शैव मतों के सुंदर समन्वय को दर्शाता है।
  • मुक्तिदायिनी शक्ति: कलयुग में नाम संकीर्तन और गंगा स्नान को मोक्ष का सबसे सुलभ साधन माना गया है, जिसकी पुष्टि यह भजन करता है।
  • सांस्कृतिक धरोहर: यह भजन भारत की प्राचीन नदी संस्कृति और जल के प्रति अगाध श्रद्धा को रेखांकित करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस पावन भजन का गायन और श्रवण वैसे तो किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु निम्नलिखित अवसरों पर इसका विशेष महत्व है:

प्रातः काल की पूजा: सुबह के समय इस भजन को सुनने से मन शांत होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। विशेषकर गंगा स्नान के समय या घर में स्नान करते समय इसका स्मरण अत्यंत फलदायी माना जाता है।

गंगा दशहरा और कार्तिक पूर्णिमा: गंगा दशहरा, कार्तिक पूर्णिमा, मकर संक्रांति और अर्धकुंभ या महाकुंभ जैसे पावन पर्वों पर इस भजन का सामूहिक कीर्तन करने से अनंत गुना पुण्य की प्राप्ति होती है।

आरती के पूर्व: संध्या काल में जब घर में या मंदिर में गंगा माँ की आरती की जाती है, तब इस भजन को गाकर वातावरण को और अधिक भक्तिमय बनाया जा सकता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से निम्नलिखित दिव्य सत्ताओं से जुड़ा हुआ है:

भगवान श्री विष्णु: गंगा जी के आदि स्रोत भगवान विष्णु हैं। उनके वामन अवतार के चरण-नख से गंगा जी का प्राकट्य हुआ था, इसलिए इन्हें विष्णुपदी कहा जाता है। भगवान विष्णु की आराधना के बिना गंगा-भक्ति अधूरी मानी जाती है। अधिक गहराई से जुड़ने के लिए भक्त श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी करते हैं।

भगवान शिव (चंद्रशेखर): गंगा जी को पृथ्वी पर धारण करने वाले देवों के देव महादेव हैं। शिव जी ने अपनी जटाओं में गंगा को बांधकर उनके प्रचंड वेग को शांत किया और फिर अत्यंत सौम्य रूप में उन्हें पृथ्वी पर छोड़ा। इस प्रसंग का सुंदर वर्णन शिव तांडव स्तोत्र में भी मिलता है।

राजर्षि भगीरथ: इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा भगीरथ, जिनकी अनन्य तपस्या के कारण ही गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण संभव हो सका। उनके इस महान कार्य के कारण ही गंगा जी का एक नाम 'भागीरथी' पड़ा।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक लोक धुनों और पौराणिक आख्यानों पर आधारित है। भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सदियों से गंगा मैया की महिमा गाई जाती रही है। आधुनिक युग में 'अंबे भक्ति' (Ambeybhakti) द्वारा इसे नए संगीत और सुरीली आवाज के साथ प्रस्तुत किया गया है, जिससे यह युवा पीढ़ी के बीच भी अत्यंत लोकप्रिय हो गया है। इस भजन की पृष्ठभूमि श्रीमद्भागवत महापुराण और देवी भागवत पुराण के उन प्रसंगों से प्रेरित है जहाँ गंगा अवतरण की कथा विस्तार से वर्णित है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें अवधी और ब्रजभाषा के शब्दों का भी सुंदर मिश्रण मिलता है। इसकी काव्य शैली गेय (गाने योग्य) है। इसमें प्रयुक्त अनुप्रास अलंकार और शांत रस श्रोता को सीधे ध्यान की अवस्था में ले जाते हैं। "चरणों में रहती, सदा पावन बहती" जैसी पंक्तियाँ बार-बार दोहराई जाने वाली टेक (रिफ्रेन) के रूप में प्रयुक्त हुई हैं, जो मन को एकाग्र करने में सहायक हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक भक्ति गीत नहीं है, बल्कि इसमें गहरे आध्यात्मिक संदेश छिपे हैं:

  • समर्पण और विनम्रता: जैसे गंगा जी स्वर्ग की ऊंचाइयों से उतरकर पृथ्वी के कल्याण के लिए नीचे आती हैं, वैसे ही मनुष्य को भी अपने जीवन में ज्ञान और शक्ति पाकर विनम्र होना चाहिए।
  • परोपकार की भावना: गंगा जी बिना किसी भेदभाव के पापी, पुण्यात्मा, पशु-पक्षी और प्रकृति सभी का कल्याण करती हैं। हमें भी अपने जीवन में परोपकार का मार्ग अपनाना चाहिए।
  • सतत कर्मशीलता: गंगा जी निरंतर बहती रहती हैं, मार्ग में आने वाली बाधाओं को पार करती हुई अंततः समुद्र (परमात्मा) में विलीन हो जाती हैं। यह हमें सिखाता है कि जीवन में कभी रुकना नहीं चाहिए और निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
विष्णुपदी विष्णु के चरणों से उत्पन्न गंगा जी का वह स्वरूप जो भगवान विष्णु के चरणों से प्रकट हुआ।
पतित पावन पापियों को पवित्र करने वाली जो पतितों (गिरे हुए लोगों) का उद्धार कर उन्हें मोक्ष प्रदान करे।
भवसागर संसार रूपी समुद्र जन्म और मृत्यु का चक्र जिससे मुक्त होना ही मोक्ष है।
त्रिपथगा तीन पथों पर चलने वाली स्वर्ग (मंदाकिनी), पृथ्वी (भागीरथी) और पाताल (भोगवती) में बहने वाली।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"माँ गंगा श्री विष्णु के चरणों में रहती, चरणों में रहती, सदा पावन बहती।"
अर्थ: माँ गंगा का नित्य निवास भगवान विष्णु के परम पावन चरणों में है। वे वहाँ से प्रवाहित होकर संपूर्ण सृष्टि को पवित्र करती हुई निरंतर बहती रहती हैं।

"भागीरथ की तपस्या से धरती पे आई, पतित पावन करके मुक्ति दिलाई।"
अर्थ: राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा जी स्वर्ग से पृथ्वी पर आईं और उन्होंने सगर के पुत्रों सहित समस्त पापी जीवों का उद्धार कर उन्हें मोक्ष प्रदान किया।

"ब्रह्मा के कमंडल से होकर के गुजरी, शिव की जटाओं में आकर के बिखरी।"
अर्थ: भगवान विष्णु के चरणों से निकलने के बाद ब्रह्मा जी ने उन्हें अपने कमंडल में स्थान दिया। तत्पश्चात, पृथ्वी पर अवतरित होते समय उनके तीव्र वेग को संभालने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

गंगा स्नान और ध्यान के समय निम्नलिखित श्लोक का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है:

"गंगा गंगेति यो ब्रूयात् योजनानां शतैरपि।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥"

अर्थ: जो मनुष्य सैकड़ों योजन (कोसों) दूर से भी केवल 'गंगा-गंगा' शब्द का उच्चारण करता है, वह अपने सभी पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त करता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम माँ गंगा श्री विष्णु के चरणों में रहती
मुख्य देवी/देवता माँ गंगा, भगवान विष्णु, भगवान शिव
प्रस्तुति / चैनल अंबे भक्ति (Ambeybhakti)
भाषा हिंदी (भक्तिमय खड़ी बोली)
मुख्य भाव समर्पण, श्रद्धा, मोक्ष की कामना
उपयुक्त अवसर गंगा दशहरा, कार्तिक पूर्णिमा, दैनिक प्रातः पूजा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु के वामन अवतार के समय जब उन्होंने अपना पैर ब्रह्मांड की सीमा तक बढ़ाया, तब उनके अंगूठे के नख से आकाशगंगा प्रकट हुई। भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न होने के कारण ही उन्हें 'विष्णुपदी' कहा जाता है।

गंगा जी को पृथ्वी पर लाने का श्रेय सूर्यवंश के राजा भगीरथ को जाता है। उन्होंने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए हजारों वर्षों तक घोर तपस्या की थी।

गंगा जी का स्वर्ग से उतरते समय वेग इतना तीव्र था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर पाती और रसातल में चली जाती। पृथ्वी की रक्षा के लिए भगवान शिव ने गंगा जी के वेग को अपनी जटाओं में समेट लिया।

इस भजन के श्रवण से मन को असीम शांति मिलती है, मानसिक तनाव दूर होता है और साधक के भीतर भक्ति एवं वैराग्य के भाव जाग्रत होते हैं। यह घर के वातावरण को भी शुद्ध और सकारात्मक बनाता है।

हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है। इसी दिन माँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था।

वैज्ञानिक और धार्मिक दोनों ही दृष्टिकोणों से गंगा जल अत्यंत विशिष्ट है। इसमें विशेष प्रकार के बैक्टीरिया (बैक्टीरियोफेज) पाए जाते हैं जो हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करते हैं, जिससे गंगा जल लंबे समय तक रखने पर भी खराब नहीं होता।

गंगा जी को 'त्रिपथगा' कहा जाता है क्योंकि वे स्वर्ग में अलकनंदा/मंदाकिनी, पृथ्वी पर भागीरथी/गंगा और पाताल में भोगवती के रूप में प्रवाहित होती हैं।

इस भजन का मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति और माँ गंगा की पावनता पर विश्वास रखना है। यह हमें सिखाता है कि श्रद्धापूर्वक किया गया नाम-स्मरण और सत्कर्म मनुष्य को भवसागर से पार उतार देता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन की व्याख्या और पौराणिक संदर्भों को श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और स्कंद पुराण के गंगा माहात्म्य खंड से सत्यापित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को न केवल भजन के बोल प्रदान करना है, बल्कि उसके पीछे छिपे गहरे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व से भी परिचित कराना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण: गंगा अवतरण एवं वामन अवतार प्रसंग।
  • स्कंद पुराण: काशी खंड और गंगा माहात्म्य।
  • पारंपरिक भजन संग्रह: अंबे भक्ति (Ambeybhakti) द्वारा प्रस्तुत नवीन संस्करण।

संबंधित भजन एवं लेख

यदि आप माँ गंगा और भगवान विष्णु की भक्ति से ओतप्रोत अन्य रचनाओं का आनंद लेना चाहते हैं, तो निम्नलिखित लेखों को अवश्य पढ़ें:

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!