🙏 गंगा के किनारे – Ganga Ke Kinare
(शिव भजन – Shiv Bhajan Lyrics in Hindi)
📝 भजन विवरण
📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)
चाँद को निहारु
शिव को पुकारु
चाँद को निहारु
शिव को पुकारु
॥ स्थायी ॥
गंगा के किनारे बैठ के
बैठ के
गंगा के किनारे बैठ के
बैठ के
गंगा के किनारे बैठ के
॥ अंतरा १ ॥
रूह को सँवारु आरती उतारु
गंगा के किनारे बैठ के
बैठ के
गंगा के किनारे बैठ के
बैठ के
॥ अंतरा २ ॥
हम तो हमारे ही जीवन से
है इतने सताए हुए
टूटे हैं बिखरे हैं हम तो
सबके भुलाए हुए
॥ अंतरा ३ ॥
कहते हैं आए जो गंगा नहाए
हर जाते हैं सब रोग
अब हमने समझा है अब हमने जाना
क्यू गंगा आते हैं लोग
॥ अंतरा ४ ॥
थक गए थे हम
दुखों को उठा के
अब चैन आया
आई अब सांसें
गंगा के किनारे बैठ के
बैठ के
गंगा के किनारे बैठ के
बैठ के
॥ अंतरा ५ ॥
क्यू रोए हर बात में बंदेया
क्या लाया था साथ में बंदेया
जाने दे जो चला गया है
कुछ भी नहीं तेरे हाथ में बंदेया
क्यू रोए हर बात में बंदेया
क्या लाया था साथ में बंदेया
जाने दे जो चला गया है
कुछ भी नहीं तेरे हाथ में बंदेया
॥ अंतरा ६ ॥
मन नहीं भरता जितना भी ताकें
इतना सुकून हैं भर गई आंखें
गंगा के किनारे बैठ के
गंगा धराए शिव गंगा धराए
हर हर भोले नमः शिवाय
गंगा धराए शिव गंगा धराए
हर हर भोले नमः शिवाय
गंगा धराए शिव गंगा धराए
हर हर भोले नमः शिवाय
✍️ रचनाकार :- प्रचलित लोक भजन (अज्ञात)
🙏 भजन का अर्थ और संदेश
यह मार्मिक भजन गंगा के पवित्र तट पर बैठकर शिव-आराधना और आत्म-शांति का वर्णन करता है। “चाँद को निहारु, शिव को पुकारु” – भक्त चाँद (शीतलता, सौंदर्य) को निहारता है और शिव (विनाशक, कल्याणकारी) को पुकारता है।
भजन में जीवन के दुखों, टूटन और भुलाए जाने का दर्द व्यक्त किया गया है। भक्त कहता है कि वह अपने ही जीवन से सताया हुआ है, टूटा-बिखरा हुआ, सबका भुलाया हुआ। लेकिन गंगा किनारे बैठने से उसे शांति मिलती है। “थक गए थे हम दुखों को उठा के, अब चैन आया” – यह पंक्ति गंगा और शिव की शरण में आने से मिलने वाली आंतरिक शांति को दर्शाती है।
भजन में एक गहरा दार्शनिक संदेश भी है – “क्यू रोए हर बात में बंदेया, क्या लाया था साथ में बंदेया” – हम इस दुनिया में खाली हाथ आए हैं और खाली हाथ जाना है। जो चला गया, उसे जाने दो। यह वैराग्य और संतोष का संदेश है।
अंत में “हर हर भोले नमः शिवाय” के जयघोष के साथ भजन समाप्त होता है – यह शिव-गंगा की अखंडता को दर्शाता है, क्योंकि गंगा शिव की जटाओं से प्रकट हुई हैं।
🔍 भजन का विशेष महत्त्व
गंगा और शिव का अटूट संबंध: पौराणिक मान्यता है कि गंगा देवी शिव की जटाओं से धरती पर उतरीं। इसलिए गंगा किनारे बैठकर शिव का ध्यान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। यह भजन उसी भावना को जीवंत करता है।
आत्म-शांति और दुखों से मुक्ति: आधुनिक जीवन की व्यस्तता और तनाव के बीच यह भजन याद दिलाता है कि प्रकृति की गोद में, पवित्र नदी के तट पर बैठकर मन को सँवारा जा सकता है। “रूह को सँवारु, आरती उतारु” – यह आत्मा का श्रृंगार और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव है।
वैराग्य और संतोष का संदेश: “जाने दे जो चला गया है, कुछ भी नहीं तेरे हाथ में” – यह पंक्ति गीता के उपदेश “प्राप्त-प्राप्तव्य-विवर्जित” (जो मिला उसे स्वीकार करो, जो गया उसे छोड़ दो) की याद दिलाती है।
💖 भक्ति रस का संगम
🎯 संदेश
जीवन के दुखों से घबराकर भागने की बजाय, पवित्र स्थानों पर जाकर, ईश्वर का स्मरण करके और प्रकृति के सान्निध्य में रहकर आंतरिक शांति प्राप्त की जा सकती है। गंगा किनारे बैठना केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि आत्म-मंथन और पुनर्जीवन का अवसर है।
✨ आस्था का प्रतीक
यह भजन उन सभी के लिए प्रेरणा है जो मानसिक तनाव, अवसाद या जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। यह बताता है कि शिव और गंगा की शरण में जाने से रोग दूर होते हैं, सांसें सही चलती हैं, और जीवन में सुकून आता है।
🙏 ॐ नमः शिवाय ।। हर हर महादेव ।। जय गंगा मैया ।।