Chhath Puja Geet बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

केलवा के पात पर छठ पूजा का गीत

पढ़ें केलवा के पात पर छठ पूजा का गीत का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

छठ पूजा गीत | Folk Tradition

महिमा, भावार्थ और सांस्कृतिक महत्व

लोक आस्था, प्रकृति प्रेम और सूर्य उपासना के अद्वितीय महापर्व छठ की जब भी चर्चा होती है, तो लोकगीतों की गूंज से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। "केलवा के पात पर उगेलन सुरुजमल, झांके झुके बालकवा" केवल एक पारम्परिक लोकगीत नहीं है, बल्कि यह सूर्य देव और छठी मईया के प्रति अगाध श्रद्धा, समर्पण और भारतीय संस्कृति की उस गहरी जीवनदृष्टि का जीवंत दस्तावेज है जो प्रकृति के हर उपादान को पूज्य मानती है। यह कालजयी गीत बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और देश-विदेश में बसे प्रवासियों के अंतर्मन को झंकृत करता है। इस लेख में हम इस पावन भजन के संपूर्ण बोल, उसके गहरे दार्शनिक भावार्थ, गायन की परंपरा और छठ पर्व के आध्यात्मिक पक्ष पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

शीघ्र जानकारी (Quick Information)
गीत का नाम विषय / देवता भाषा / बोली मुख्य भाव अवसर
केलवा के पात पर छठ पूजा का गीत सूर्य देव एवं छठी मईया भोजपुरी / मैथिली लोकभाषा विनम्रता, समर्पण और सूर्य उपासना छठ महापर्व (नहाय-खाय से उद्यत अर्घ्य तक)

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

केलवा के पात पर उगेलन सुरुजमल, झांके झुके बालकवा
केलवा के पात पर उगेलन सुरुजमल, झांके झुके बालकवा
होइब ना सहाय, सुरुज देव होइब ना सहाय
दर्शन दीहीं अपार, सुरुज देव होइब ना सहाय..

पहिले पहिल हम कइलीं छठी मईया बरत तोहार
करिहूँ क्षमा छठी मईया, भूल-चूक गलती हमार
सबके अरजिया सुनीं छठी मईया, पूरा करीं सब काज
केलवा के पात पर उगेलन सुरुजमल, झांके झुके बालकवा..

सुरुज देव के महिमा भारी, जग के पालनहार
अंधियारा मिटावेला, करेला उजियार
भक्ति भाव से जे गावे, ओकर बेड़ा पार
केलवा के पात पर उगेलन सुरुजमल, झांके झुके बालकवा..

उगेलन सुरुजमल भइले बिहानवा
दरस परसि भइले पावन परानवा
जोड़ के जोरे लेइया अर्घ्य के थारिया
सुन लीं पुकार छठी मईयाि महतारी!
केलवा के पात पर उगेलन सुरुजमल, झांके झुके बालकवा...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह लोकगीत अत्यंत कोमल और भावुक तानों में गाया जाता है। इसके शब्द भले ही सरल लोकभाषा (भोजपुरी/मैथिली) के हैं, किंतु इसका आंतरिक अर्थ बहुत गहरा और आध्यात्मिक है। गीत की पहली पंक्ति "केलवा के पात पर उगेलन सुरुजमल, झांके झुके बालकवा" में एक बहुत ही सुंदर दृश्य और दार्शनिक प्रतीक छिपा है। 'केलवा के पात' यानी केले के पत्ते की कोमलता और पवित्रता पर जब सूर्य देव की प्रथम किरणें पड़ती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति स्वयं बालक रूप में उस परम प्रकाश का वंदन कर रही है। केले का पौधा सनातन संस्कृति में अत्यंत शुभ, पवित्र और अविनाशक (वंश वृद्धि का प्रतीक) माना जाता है क्योंकि इसका हर भाग पूजा में उपयोग होता है।

भजन के अंतरे में व्रती अत्यंत विनीत भाव से कहती है— "पहिले पहिल हम कइलीं छठी मईया बरत तोहार, करिहूँ क्षमा छठी मईया भूल-चूक गलती हमार।" यह एक साधारण गृहिणी या भक्त का परमात्मा के समक्ष संपूर्ण समर्पण है। मनुष्य से अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगना और अपनी संतान व परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करना इस लोकगीत की मूल आत्मा है।

सूर्य देव को 'जग के पालनहार' कहा गया है जो केवल अंधकार को ही नहीं मिटाते, बल्कि मानव जीवन के संताप, अज्ञान और आरोग्यता के संकटों का भी निवारण करते हैं। लोक विश्वास है कि जो भी भक्त सच्चे हृदय से इस गीत का गान करता है, उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं और उसका जीवन नैया भवसागर से पार हो जाती है। ऐसे ही अन्य भक्ति गीतों और अनुष्ठानों के बारे में जानने के लिए आप छठ पूजा गीत संग्रह देख सकते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

1. प्रकृति के साथ जुड़ाव

छठ पर्व पूरी तरह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का पर्व है। इस गीत में केले के पत्ते (केलवा के पात) को माध्यम बनाकर यह दर्शाया गया है कि हमारी आस्था भौतिक प्रपंच से दूर सीधे प्रकृति की गोद में पलती है।

2. बाल-सुलभ सरलता और विनय

भक्त का भगवान के साथ संबंध एक बच्चे और माता जैसा होता है। 'झांके झुके बालकवा' और 'भूल-चूक गलती क्षमा करिहूँ' जैसे वाक्यांश भक्त की निष्कपट और बाल-सुलभ भावनाओं को उजागर करते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यह गीत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले छठ महापर्व के दौरान गाया जाता है। इसे गाने के प्रमुख अवसर निम्नलिखित हैं:

  • नहाय-खाय और खरना के दिन: जब व्रती महिलाएं प्रसाद तैयार करती हैं और पूरा घर छठी मईया के भजनों से गूंज उठता है।
  • संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के समय: नदी या तालाब के घाट पर जाते समय महिलाएं समूह में ढोल-मंजीरे के साथ इस गीत का मधुर गान करती हैं।
  • दैनिक साधना: प्रातఃकाल सूर्योदय के समय घर की छत या प्रांगण में जल अर्पण करते समय भी इस गीत को गुनगुनाया जा सकता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / भाव
केलवा के पात केले का पत्ता पवित्रता और प्रकृति का प्रतीक जिसपर अर्घ्य सजाया जाता है।
सुरुजमल सूर्य देव समस्त ऊर्जा और जीवन के प्रदाता भगवान सूर्य का आदरसूचक संबोधन।
बालकवा बालक / बाल रूप सूर्य की कोमल बाल-किरणें जो प्रात्यूष बेला में प्रकट होती हैं।
अरजिया प्रार्थना / विनती भक्त द्वारा छठी मईया के चरणों में रखी गई अपनी मनोकामना।
बेड़ा पार संकटों से मुक्ति जीवन रूपी भवसागर को आसानी से पार कर लेना।

छठ पूजा परंपरा और सूर्य उपासना का आध्यात्मिक संदेश

छठ पर्व केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आत्म-शुद्धि, अनुशासन और समानता का सबसे बड़ा संदेशवाहक है। इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें उगते हुए सूर्य के साथ-साथ डूबते हुए सूर्य (अस्तगामी सूर्य) की भी उतनी ही निष्ठा से पूजा की जाती है। यह सनातन संस्कृति की उस उदात्त सोच को दर्शाता है जो जीवन के उत्थान के साथ-साथ उसके अवसाद या ढलान को भी सम्मान देना सिखाती है।

"केलवा के पात पर..." जैसे गीत समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम से स्थानांतरित होने वाले ये लोकगीत हमारी सांस्कृतिक धरोहर की असली पूंजी हैं। इस विषय से जुड़ी अन्य पौराणिक कथाओं के लिए आप गोवर्धन पूजा व्रत कथा एवं अन्य पर्वों के लेखों का भी अध्ययन कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह गीत मुख्य रूप से लोक आस्था के महापर्व 'छठ पूजा' के दौरान, विशेषकर खरना, संध्या अर्घ्य और सुबह के अर्घ्य के समय व्रतियों और महिलाओं द्वारा समूह में गाया जाता है।

सनातन संस्कृति में केले के पौधे और पत्तों को अत्यधिक पवित्र माना जाता है। छठ पूजा में प्रसाद और अर्घ्य की थाली सजाने के लिए केले के पत्तों का अनिवार्य रूप से उपयोग किया जाता है, जो प्रकृति के प्रति हमारे आदर को दर्शाता है।

सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना जाता है जो समस्त संसार को ऊर्जा, आयु, आरोग्यता और प्रकाश प्रदान करते हैं। छठ पर्व पर उनकी कृपा से आरोग्यता और संतान की दीर्घायु की कामना की जाती है।

हाँ, यह एक अत्यंत लोकप्रिय पारंपरिक लोकगीत है जिसे कई प्रसिद्ध लोक कलाकारों (जैसे उषा यादव एवं अन्य पारंपरिक गायकों) ने अपनी मधुर आवाज़ में गाया है और यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोक-स्मृति में जीवित है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख लोक परंपरा, सांस्कृतिक धरोहर और छठ पूजा के पारंपरिक गीतों के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसमें प्रयुक्त गीत के बोल और उनके भावार्थ पारंपरिक मान्यताओं और क्षेत्रीय लोकाचार पर आधारित हैं।


स्रोत एवं संदर्भ (Sources & References)
  • पारंपरिक लोकगीत संग्रह एवं मौखिक सांस्कृतिक परंपराएं।
  • बिहार और पूर्वांचल के लोक पर्वों से जुड़े शोध ग्रंथ एवं आलेख।
  • सूर्य उपासना और छठ महापर्व के ऐतिहासिक व आध्यात्मिक संदर्भ।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!