Chhath Puja Geet बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

तुलसी पूजा विवाह गीत (Anshu Priya Tulsi Puja Vivah Geet)

तुलसी पूजा विवाह गीत 'अँगना में तुलसी लगईबो' का सुंदर पाठ, अर्थ और सांस्कृतिक महत्व जानें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित पढ़ें Bhaktilok पर।

तुलसी पूजा विवाह गीत अर्थात् "अँगना में तुलसी लगईबो संखी" सनातन भारतीय संस्कृति के उस अमूल्य लोक-वैभव का प्रतीक है, जिसमें विवाह के पावन अवसर पर तुलसी के पौधे को केंद्र में रखकर मंगल-गान किया जाता है। यह गीत केवल एक लोकगीत नहीं, अपितु देवी तुलसी के प्रति श्रद्धा, सखी-भाव, सौभाग्य-कामना और गृहस्थ जीवन की पवित्रता का सजीव दस्तावेज है। भारतीय परंपरा में तुलसी को लक्ष्मी का स्वरूप, विष्णुप्रिया और घर की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। जब कन्या के विवाह का समय आता है, तब अँगना में तुलसी रोपने का अर्थ है—नए जीवन में सुख, समृद्धि, संतान और दांपत्य-सौख्य का आह्वान। यह रचना भक्ति, लोकाचार और शास्त्र का अद्भुत संगम है, जिसमें गृहिणी अपनी सखियों के साथ मिलकर तुलसी से वरदान माँगती है। इसका प्रत्येक शब्द भारतीय नारी-हृदय की कोमल भावनाओं, मंगल-कामनाओं और ईश्वर-शरणागति को प्रकट करता है। यह गीत पीढ़ियों से मौखिक परंपरा में सुरक्षित है और आज भी विवाह, हल्दी, मेहंदी तथा गौना के अवसर पर गाया जाता है। इसका स्वर मधुर, लय चंचल और भाव गहन है—जो श्रोता को भक्ति-रस में डुबो देता है। भक्तिलोक पर प्रस्तुत यह संस्करण अंशु प्रिया की स्वर-साधना से सजीव हुआ है, जिसमें लोक-संगीत की मिठास और भक्ति की गरिमा दोनों सुरक्षित हैं।

मूल संस्कृत श्लोक / पावन पाठ

अँगना में तुलसी लगईबो संखी,
सोहाग सुहावन होय रे।
पत्ती-पत्ती में लछमी, डार-डार में राम,
जड़ में बिराजे ब्रह्मा, चलो पूजन करन रे।
तुलसी माता की महिमा न्यारी,
जगत के जीवन आधार रे।
जो कोई तुलसी सेवे, सो भवसागर तर जाय रे।

पदच्छेद एवं अन्वय

इस पावन गीत का पदच्छेद करने पर हमें निम्नलिखित शब्द-समूह प्राप्त होते हैं—

पदच्छेद: अँगना / में / तुलसी / लगईबो / संखी / सोहाग / सुहावन / होय / रे / पत्ती-पत्ती / में / लछमी / डार-डार / में / राम / जड़ / में / बिराजे / ब्रह्मा / चलो / पूजन / करन / रे / तुलसी / माता / की / महिमा / न्यारी / जगत / के / जीवन / आधार / रे / जो / कोई / तुलसी / सेवे / सो / भवसागर / तर / जाय / रे।

अन्वय: हे सखी! अँगना में तुलसी लगाओ, जिससे सौभाग्य सुहावन हो जाए। तुलसी के पत्ती-पत्ती में लक्ष्मी, डार-डार में राम और जड़ में ब्रह्मा विराजमान हैं, अतः चलो पूजन करें। तुलसी माता की महिमा न्यारी है, वे जगत के जीवन का आधार हैं। जो कोई तुलसी की सेवा करता है, वह भवसागर से तर जाता है।

विस्तृत शब्दार्थ

शब्दअर्थभावार्थ
अँगनाआँगन, प्रांगणगृहस्थ जीवन का पवित्र केंद्र
तुलसीपवित्र औषधीय पौधा, देवीलक्ष्मी एवं विष्णुप्रिया का स्वरूप
लगईबोलगाओगे, रोपोगेस्थापना एवं संस्कार का प्रतीक
संखीसखी, सहेलीसामूहिक भक्ति एवं स्त्री-शक्ति
सोहागसौभाग्य, दांपत्य सुखविवाहित जीवन की समृद्धि
सुहावनसुंदर, मंगलमयशुभता का आह्वान
लछमीलक्ष्मी, धन-समृद्धि की देवीऐश्वर्य एवं समृद्धि
डारशाखा, टहनीविस्तार एवं वंश-वृद्धि
रामश्रीराम, विष्णु अवतारपरमात्मा की उपस्थिति
जड़मूल, जड़आधार एवं स्थिरता
ब्रह्मासृष्टिकर्ता देवसृजन-शक्ति
भवसागरसंसार-सागरजन्म-मरण का चक्र

सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या

इस गीत का मर्म यह है कि विवाह के पावन अवसर पर कन्या अपनी सखियों को संबोधित करती हुई कहती है—हे सखी! मेरे आँगन में तुलसी का पौधा लगाओ, जिससे मेरा सौभाग्य सुहावन और मंगलमय हो जाए। यह केवल एक पौधा रोपने की बात नहीं, अपितु जीवन में दिव्यता, पवित्रता और शुभता को स्थापित करने का प्रतीकात्मक आह्वान है। तुलसी के प्रत्येक पत्ते में माँ लक्ष्मी का वास है, प्रत्येक शाखा में स्वयं श्रीराम विराजमान हैं और जड़ में ब्रह्मा जी स्थित हैं। यह त्रिदेव-त्रिदेवी का अद्भुत संगम है—जो दर्शाता है कि तुलसी केवल एक वनस्पति नहीं, अपितु समस्त देवताओं का साक्षात् निवास है। इसीलिए गीत में कहा गया है—चलो, पूजन करें। तुलसी माता की महिमा अत्यंत न्यारी है, वे समस्त जगत के जीवन का आधार हैं। जो भी प्राणी श्रद्धा-भाव से तुलसी की सेवा करता है, वह भवसागर अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से पार हो जाता है। यह गीत गृहस्थ जीवन के प्रति एक गहरा दर्शन प्रस्तुत करता है—गृहस्थ आश्रम त्याग का नहीं, अपितु पवित्रता और भक्ति का मार्ग है। आँगन में तुलसी लगाना अर्थात् घर को मंदिर बना देना। जब घर के प्रांगण में तुलसी होती है, तो वहाँ नकारात्मक शक्तियाँ प्रवेश नहीं कर पातीं। तुलसी की सुगंध, उसकी छाया और उसका सान्निध्य—तीनों ही मनुष्य के मन, प्राण और शरीर को शुद्ध करते हैं। विवाह के समय यह गीत गाया जाना इस बात का प्रतीक है कि नवविवाहित जोड़ा अपने नए घर में भी तुलसी-सेवा की परंपरा को आगे बढ़ाएगा। यह गीत नारी-हृदय की कोमल भावनाओं को भी उजागर करता है—कन्या अपने भावी सौभाग्य की कामना करती है, अपनी सखियों के साथ मिलकर मंगल-गान करती है। इसमें सामूहिकता, सहभागिता और आपसी स्नेह की भावना प्रबल है। भक्ति केवल एकांत साधना नहीं, अपितु सामूहिक उत्सव भी है। यह गीत उसी सामूहिक भक्ति-परंपरा का सजीव उदाहरण है।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ

तुलसी का उल्लेख अनेक पुराणों में मिलता है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा देवी भागवत में तुलसी की महिमा विस्तार से वर्णित है। पद्म पुराण के अनुसार तुलसी वृंदा नामक देवी का स्वरूप हैं, जिन्होंने अपने पति के प्रेम और भक्ति से श्रीविष्णु को प्रसन्न करके उनके साथ एकत्व प्राप्त किया। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि तुलसी के बिना विष्णु-पूजन अपूर्ण है। शालिग्राम के साथ तुलसी की पूजा का विधान सर्वश्रेष्ठ माना गया है। स्कंद पुराण में तुलसी को "विष्णुप्रिया" कहा गया है और उसके सेवन, स्पर्श, दर्शन तथा नाम-स्मरण के अलग-अलग फल बताए गए हैं। विवाह-संस्कार में तुलसी की भूमिका अत्यंत प्राचीन है। भारतीय परंपरा में कन्या का विवाह तुलसी के पौधे से कराने की परंपरा भी कहीं-कहीं मिलती है, जिसे "तुलसी-विवाह" कहा जाता है। यह परंपरा इस विश्वास पर आधारित है कि तुलसी स्वयं लक्ष्मी हैं और उनसे विवाह करके कन्या सौभाग्यवती होती है। इस गीत की रचना लोक-परंपरा में हुई है, अतः इसका कोई एक निश्चित रचनाकार नहीं है। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित होता आया है। अंशु प्रिया द्वारा प्रस्तुत यह संस्करण लोक-संगीत की मिठास को भक्ति-रस से सजीव करता है। भक्तिलोक पर उपलब्ध यह रचना उत्तर भारत की विवाह-परंपरा, विशेषकर ब्रज, अवध और बिहार-पूर्वांचल की लोक-संस्कृति का प्रामाणिक दस्तावेज है।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व

इस गीत का दार्शनिक आधार अत्यंत गहन है। तुलसी के पत्ती-पत्ती में लक्ष्मी, डार-डार में राम और जड़ में ब्रह्मा का वर्णन—यह अद्वैत वेदांत का सुंदर प्रतीक है। यह बताता है कि समस्त ब्रह्मांड एक ही परम सत्ता से व्याप्त है। जड़ में ब्रह्मा अर्थात् सृष्टि का मूल कारण, शाखाओं में राम अर्थात् पालनकर्ता और पत्तों में लक्ष्मी अर्थात् पोषण-शक्ति। यह त्रिदेव-तत्व एक ही परमात्मा के तीन पहलू हैं। तुलसी-सेवा का अर्थ है—अपने भीतर इन तीनों गुणों को जागृत करना। कर्म-सिद्धांत के अनुसार, प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है। तुलसी-सेवा एक शुद्ध, निष्काम कर्म है, जो मनुष्य को भवबंधन से मुक्त करता है। गीत में कहा गया है—"जो कोई तुलसी सेवे, सो भवसागर तर जाय रे।" यह वाक्य कर्म-योग का सार है। तुलसी की सेवा में अहंकार का लेश नहीं होता, क्योंकि यह एक छोटे से पौधे की सेवा है। जब मनुष्य छोटी-छोटी सेवाओं में भी परमात्मा को देखने लगता है, तब उसका अहंकार क्षीण होता है और वह मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। ध्यान की दृष्टि से देखें तो तुलसी-पूजन एक सजीव ध्यान-विधि है। तुलसी के पौधे के समीप बैठकर उसके पत्तों को निहारना, उसकी सुगंध को अनुभव करना और उसके जल देने की क्रिया—ये सब मन को वर्तमान क्षण में स्थिर करते हैं। यह माइंडफुलनेस का प्राचीन भारतीय स्वरूप है। विवाह-गीत के रूप में यह रचना दांपत्य-जीवन के आध्यात्मिक आयाम को भी उजागर करती है। विवाह केवल दो शरीरों का मिलन नहीं, अपितु दो आत्माओं का संगम है, जिसमें तुलसी साक्षी बनती है। तुलसी की उपस्थिति में लिया गया वचन अधिक पवित्र और स्थायी माना जाता है। इस प्रकार यह गीत गृहस्थ-धर्म, भक्ति-योग, कर्म-सिद्धांत और ध्यान-साधना—चारों को एक सूत्र में पिरोता है।

दैनिक जीवन में इस रचना की उपयोगिता

विद्यार्थियों के लिए

विद्यार्थियों के लिए यह गीत एकाग्रता और स्मरण-शक्ति का अद्भुत साधन है। प्रातःकाल तुलसी के समीप बैठकर इस गीत का पाठ करने से मन शांत होता है और पढ़ाई में मन लगता है। तुलसी की सुगंध मस्तिष्क को ताजगी देती है, जिससे स्मरण-शक्ति बढ़ती है। परीक्षा के समय यदि विद्यार्थी तुलसी-पूजन और इस गीत का नियमित पाठ करे, तो उसे मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। यह गीत संस्कार, भाषा और संगीत—तीनों का समन्वय है, जो बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक है।

पेशेवरों के लिए

आज के व्यस्त पेशेवर जीवन में मानसिक थकान आम समस्या है। कार्यालय जाने से पूर्व तुलसी के पौधे को जल अर्पित करके इस गीत की कुछ पंक्तियाँ गाने से दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा से होती है। तुलसी की उपस्थिति कार्यस्थल पर भी रखी जा सकती है, जिससे वातावरण शुद्ध रहता है और निर्णय-क्षमता बढ़ती है। यह गीत व्यवसायियों को धैर्य, ईमानदारी और समर्पण का संदेश देता है।

मानसिक शांति के लिए

तुलसी-पूजन और इस गीत का श्रवण मानसिक शांति का सर्वोत्तम उपाय है। तुलसी के पौधे से निकलने वाला ऑक्सीजन और सुगंध तनाव-हार्मोन को कम करते हैं। इस गीत की मधुर लय मन को विश्राम देती है। नियमित श्रवण से अनिद्रा, चिंता और अवसाद में लाभ मिलता है। यह गीत ध्यान की अवस्था में पहुँचाने वाला सेतु है।

परिवार और समाज के लिए

परिवार में तुलसी-पूजन की परंपरा सामूहिकता और स्नेह को बढ़ाती है। विवाह, त्योहार और मंगल-अवसरों पर यह गीत गाने से पारिवारिक एकता मजबूत होती है। समाज में यह गीत सांस्कृतिक विरासत को सहेजता है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ता है। तुलसी-सेवा से घर-आँगन पवित्र रहता है, जिससे समाज में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त

शुभ समय: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (4:00–6:00) तुलसी-पूजन और इस गीत के पाठ का सर्वश्रेष्ठ समय है। सायंकाल दीपदान के समय भी इसका पाठ किया जा सकता है। विवाह, हल्दी, मेहंदी, गौना तथा तुलसी-विवाह के अवसर पर यह गीत विशेष रूप से गाया जाता है।

विधि: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तुलसी के पौधे के समीप जल, दीप, धूप, पुष्प और प्रसाद अर्पित करें। "ॐ तुलस्यै नमः" मंत्र का जाप करें। तत्पश्चात् इस गीत को भक्ति-भाव से गाएँ।

माला एवं संख्या: तुलसी की माला से "ॐ तुलस्यै नमः" या "श्री तुलसी स्तुति" का 108 बार जाप करें। इस गीत का पाठ प्रतिदिन 3, 5 या 11 बार करना शुभ माना जाता है।

लाभ: नियमित साधना से सौभाग्य-वृद्धि, रोग-नाश, गृह-कलह में शांति, संतान-सुख, धन-समृद्धि तथा मानसिक शांति प्राप्त होती है। तुलसी-सेवा से पितृ-दोष और ग्रह-दोष भी शांत होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: तुलसी पूजा विवाह गीत कब गाया जाता है?
उत्तर: यह गीत विवाह के अवसर पर, विशेषकर हल्दी, मेहंदी, गौना तथा तुलसी-विवाह की रस्म के समय गाया जाता है। इसके अतिरिक्त कार्तिक मास, तुलसी-विवाह (कार्तिक शुक्ल एकादशी) तथा देवउठनी एकादशी पर भी इसका विशेष महत्व है।

प्रश्न 2: क्या इस गीत को पुरुष भी गा सकते हैं?
उत्तर: हाँ, भक्ति में लिंग-भेद नहीं होता। यह गीत मूलतः स्त्रियों द्वारा गाया जाता है, परंतु पुरुष भी श्रद्धा-भाव से इसका श्रवण और पाठ कर सकते हैं। भक्ति का द्वार सबके लिए खुला है।

प्रश्न 3: तुलसी के पौधे की देखभाल कैसे करें?
उत्तर: तुलसी को प्रतिदिन जल अर्पित करें, परंतु अधिक जल न दें। सूर्य के प्रकाश में रखें। सूखे पत्तों को हटाते रहें। एकादशी और रविवार को तुलसी-पत्र न तोड़ें। शीतकाल में विशेष सावधानी रखें।

प्रश्न 4: क्या तुलसी-पूजन से विवाह में विलंब दूर होता है?
उत्तर: शास्त्रों के अनुसार तुलसी-विवाह और नियमित तुलसी-सेवा से विवाह-बाधाएँ दूर होती हैं। कन्या यदि श्रद्धा से तुलसी की सेवा करे और कार्तिक मास में तुलसी-विवाह करे, तो शीघ्र अच्छे वर की प्राप्ति होती है।

प्रश्न 5: इस गीत का पाठ करते समय किन बातों का ध्यान रखें?
उत्तर: पाठ से पूर्व स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तुलसी के समीप बैठें। मन में श्रद्धा और भक्ति रखें। मोबाइल आदि बंद रखें। पाठ के बाद तुलसी को प्रणाम करें और प्रसाद ग्रहण करें।

प्रश्न 6: क्या यह गीत किसी विशेष संप्रदाय से संबंधित है?
उत्तर: नहीं, यह गीत सनातन परंपरा का सार्वभौमिक लोकगीत है। यह उत्तर भारत, ब्रज, अवध, बिहार, पूर्वांचल तथा मध्य भारत में समान रूप से गाया जाता है। इसका संबंध किसी एक संप्रदाय से नहीं, अपितु समग्र भारतीय संस्कृति से है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिकता

भक्तिलोक पर प्रस्तुत यह लेख "तुलसी पूजा विवाह गीत || अँगना में तुलसी लगईबो संखी" विषय पर आधारित है। इसका उद्देश्य सनातन परंपरा, लोक-संस्कृति और भक्ति-साहित्य का प्रामाणिक एवं शोधपूर्ण परिचय प्रदान करना है।

स्रोत एवं प्रामाणिकता: इस लेख में उल्लिखित पौराणिक संदर्भ स्कंद पुराण, पद्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा देवी भागवत पर आधारित हैं। लोक-परंपरा संबंधी सामग्री उत्तर भारत की विवाह-गीत परंपरा से संकलित है।

संपादकीय टिप्पणी: यह रचना भक्ति, संस्कृति और लोक-जीवन का अद्भुत संगम है। अंशु प्रिया के स्वर में यह गीत अपनी समग्रता में प्रस्तुत हुआ है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस गीत को श्रद्धा-भाव से सुनें, समझें और अपने जीवन में तुलसी-सेवा की परंपरा को अपनाएँ।

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा पर आधारित हैं। पाठक अपनी श्रद्धा और विवेक के अनुसार इन्हें ग्रहण करें।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!