Chhath Puja Geet बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

आ गया हर छठ घाट पर बजने वाला छठ गीत

पढ़ें आ गया हर छठ घाट पर बजने वाला छठ गीत का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा की महिमा सनातन संस्कृति में अद्वितीय है। इस पावन अवसर पर जब लोकगायिका अक्षरा सिंह की सुरीली और भावपूर्ण आवाज में कोई नया छठ गीत रिलीज होता है, तो पूरा वातावरण छठी मइया के भक्ति रस में सराबोर हो जाता है। "आ गया हर छठ घाट पर बजने वाला छठ गीत" केवल एक संगीत रचना नहीं है, बल्कि यह पूर्वांचल की समृद्ध लोकसंस्कृति, सूर्य उपासना की परंपरा और छठी माता के प्रति अटूट आस्था का जीवंत प्रतीक है। जब नहाय-खाय से लेकर खरना और अर्घ्य के दिनों में गली-मोहल्लों से लेकर छठ घाटों तक यह गीत गूंजता है, तो हर उम्र के श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठते हैं। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस लोकप्रिय छठ गीत के बोल, उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, संगीत संयोजन, पर्व के महत्व और लोकआस्था से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

स्थाई (मुखड़ा):

आ गया हर छठ घाट पर बजने वाला गीत,
छठी मइया के महिमा गावे सारा लोक-रीत!
उगहु हे आदितमल, अरघिया लेहू स्वीकार,
भक्ति भाव से झूमे सारा संसार!

अंतरा 1:

बाँस के बहंगिया बहंगी लचकत जाय,
लचकत जाय बहंगी बहंगी लचकत जाय!
केरवा के पात पर उगेलन सुरुजमल,
झाંके झुके झरोखे से भक्तन का दल!
अक्षरा के सुरवा में गूंजे मइया के भजन,
धन्य भइल घाट आ पावन भइल मन!

अंतरा 2:

घाट पर स सजले बाड़न सुघर बजार,
दउरवा में सजावल बा पूजा के समान!
सूप सुफाड़े ले के चलली सती नारी,
दरस करे खातिर उमड़ल नर-नारी!
हे छठी मइया, दीन पर दया तू करियs,
अँखिया के सोझा सदा दरसन तू दियs!

अंतिम चरण (रिफ्रैन):

जय छठी मइया! जय छठी मइया!
सूर्य देव की जय! अर्घ्य की महिमा अपरम्पार!
हर घाट पर गूंजे बस एक ही पुकार,
छठी मइया तोहरे चरनन में लागे संसार!

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह लोकगीत छठ पर्व के दौरान भक्तों की आंतरिक भावनाओं, समर्पण और घाट पर होने वाले उत्सवी माहौल का अत्यंत सजीव चित्रण करता है। गीत के मुखड़े में ही इस बात की घोषणा हो जाती है कि यह रचना छठ घाटों की अनिवार्य पहचान बन चुकी है। 'उगहु हे आदितमल' यानी भगवान सूर्य के प्रकट होने की प्रार्थना और अर्घ्य समर्पण की बेला का इसमें सुंदर वर्णन है।

पहले अंतरे में पारंपरिक लोकबिंबों का प्रयोग किया गया है जैसे 'बाँस के बहंगिया बहंगी लचकत जाय' और 'केरवा के पात पर उगेलन सुरुजमल'। यह रूपक छठ पूजा के उन पवित्र दृश्यों को आंखों के सामने ले आता है जहां व्रती सिर पर प्रसाद से भरा सूप और टोकरी लेकर घाट की ओर बढ़ते हैं। संगीतकार और गायिका ने मिलकर इस पारंपरिक शैली को आधुनिक धुनों के साथ इस प्रकार पिरोया है कि युवा पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ जाती है।

दूसरे अंतरे में घाट की सजावट, बाजार की रौनक, और व्रतियों के अनुशासित संयम का बखान है। 'सूप सुफाड़े ले के चलली सती नारी' पंक्ति उन करोड़ों व्रती माताओं और बहनों के त्याग, तपस्या और अटूट विश्वास को नमन करती है जो बिना अन्न-जल ग्रहण किए कठिन 36 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं। भावार्थ यह है कि छठी मइया की कृपा से ही समाज में सुख-शांति और परिवार की समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत का मूल भाव लोक-समर्पण, प्रकृति पूजा और पारिवारिक कल्याण है। छठ पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह सूर्य नारायण और प्रकृति की छठी मैया (माता षष्ठी) के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का पर्व है। गीत यह संदेश देता है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ के बीच भी जब हम अपनी लोक संस्कृति और मातृभाषा से जुड़े रहते हैं, तो हमारी आत्मा को असीम शांति मिलती है। इसमें अहंकार का त्याग कर पूर्ण शरणागति और सामूहिक सहभागिता का सुंदर संदेश छिपा है।

गीत की जानकारी | Song Information

गीत का नाम छठ घाट स्पेशल लोकगीत (आ गया हर छठ घाट पर बजने वाला छठ गीत)
प्रमुख गायिका अक्षरा सिंह (लोकप्रिय भोजपुरी गायिका एवं अभिनेत्री)
संगीतकार पारंपरिक लोक धुन एवं आधुनिक संगीत संयोजन
भाषा भोजपुरी / हिंदी लोक भाषा
मुख्य विषय छठ महापर्व, सूर्य उपासना, प्रकृति प्रेम एवं लोकसंस्कृति
प्रसारण वर्ष 2021 एवं अद्यतन छठ पर्व संस्करण

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

लोक कला और संस्कृति को जीवित रखने में कलाकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अक्षरा सिंह जैसी प्रख्यात लोक कलाकारों ने जब पारंपरिक छठ गीतों को आधुनिक वीडियो और संगीत के साथ प्रस्तुत किया, तो वैश्विक स्तर पर बैठे प्रवासियों (Diaspora) के लिए भी अपनी मिट्टी से जुड़े रहना आसान हो गया। गीत के बोल और इसकी लयबद्ध संरचना लोकगीतों की उस विधा से प्रेरित है जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी बुजुर्ग महिलाओं द्वारा पारंपरिक सोहर और चैती-छठ गीतों के रूप में गाया जाता रहा है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द सरल अर्थ संदर्भ
बहंगिया बाँस की बनी कावड़ जिसमें प्रसाद की टोकरियां रखकर ढोई जाती हैं घाट पर जाते समय व्रतियों द्वारा उपयोग
आदितमल भगवान सूर्य नारायण (आदित्य) सूर्य उपासना का संदर्भ
दउरवा बाँस का बना हुआ बड़ा सूप या टोकरी जिसमें फल और ठेकुआ रखा जाता है पूजा सामग्री रखने का पात्र
केरवा केला (केले के पौधे और पत्ते) छठ पूजा का अनिवार्य पवित्र पौधा
सुघर सुंदर, सुसज्जित या पवित्र घाट की सुंदरता का वर्णन

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ पर्व एकमात्र ऐसा लोकोत्सव है जिसमें अस्थाचलगामी (अस्त होते हुए) और उगते हुए दोनों सूर्यों की पूजा की जाती है। यह इस दार्शनिक सत्य को रेखांकित करता है कि जो उदय हुआ है उसका अस्त होना और जो अस्त हुआ है उसका पुनः उदय होना प्रकृति का शाश्वत नियम है। ऐसे में जब घाटों पर बजने वाले गीत इस दर्शन को स्वर देते हैं, तो श्रोता के मन में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है। यह गीत जाति, बंधन और वर्गभेद से ऊपर उठकर समाज को एक सूत्र में पिरोता है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

  • कठिन परिश्रम और अनुशासन: छठ व्रत की तरह जीवन में भी लक्ष्य प्राप्ति के लिए कड़े अनुशासन और संयम की आवश्यकता होती है।
  • प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: जल, सूर्य, वायु और वनस्पतियों के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, अतः प्रकृति का सम्मान सर्वोपरि है।
  • सामूहिक सद्भाव: छठ घाट पर सभी लोग मिलकर बिना किसी भेदभाव के पर्व मनाते हैं, जो सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव: चाहे कितनी भी आधुनिकता आ जाए, अपनी भाषा, परंपरा और संस्कारों को कभी नहीं भूलना चाहिए।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

इस प्रकार के लोकगीत विशेष रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक (नहाय-खाय से लेकर उद्यमान सूर्य को अर्घ्य देने तक) घर-घर, बाजार की दुकानों और विशेषकर छठ घाटों पर बजाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, जब भी पूर्वांचल या देश-विदेश में बसे भारतीय समुदाय में छठ पूजा की तैयारियां शुरू होती हैं, तब यह संगीत हर घर की देहरी पर गूंजने लगता है। इसके बारे में अधिक जानने के लिए आप छठ पूजा व्रत एवं विधि और सूर्य देव स्तोत्र एवं महिमा के लेख भी पढ़ सकते हैं।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

पैरामीटर विवरण
गीत का शीर्षक आ गया हर छठ घाट पर बजने वाला छठ गीत
संगीत विधा भोजपुरी लोक संगीत / भक्ति गीत
प्रमुख भावना भक्ति, उल्लास, मातृ प्रेम एवं सूर्य आराधना
पात्र / देवता छठी मइया एवं भगवान सूर्य नारायण
उपयुक्त अवसर कार्तिक छठ महापर्व
प्लेटफॉर्म लोक संगीत मंच एवं डिजिटल मीडिया

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह लोकप्रिय छठ गीत प्रसिद्ध भोजपुरी लोकगायिका एवं अभिनेत्री अक्षरा सिंह की सुरीली आवाज में सजा है, जिसे छठ घाटों पर विशेष रूप से पसंद किया जाता है।

छठ पूजा के गीत इस महापर्व के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक माहौल को जीवंत बनाते हैं। ये गीत व्रतियों की कठिन तपस्या को सहज बनाते हैं और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं।

'बहंगिया' बाँस से बनी एक विशेष कावड़ होती है जिसके दोनों सिरों पर प्रसाद से भरी टोकरियाँ (दउरा) रखकर व्रती और उनके परिवारजन छठ घाट तक ले जाते हैं।

यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। वर्तमान में देश-विदेश में जहां भी पूर्वांचल के लोग रहते हैं, वहां यह पर्व अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है।

इस पर्व में भगवान सूर्य नारायण (प्रत्यक्ष देवता) और उनकी बहन प्रकृति देवी षष्ठी माता (छठी मइया) की आराधना की जाती है।

हाँ, यह गीत पारंपरिक लोक धुनों और शब्दों (जैसे बाँस की बहंगी, केरवा के पात) को आधार बनाकर आधुनिक संगीत के साथ रीमिक्स और संयोजित किया गया है।

छठ का यह महापर्व कुल चार दिनों का होता है, जिसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है, दूसरा दिन खरना, तीसरा दिन संध्या अर्घ्य और चौथे दिन प्रातःकालीन अर्घ्य के साथ इसका समापन होता है।

कार्तिक मास के छठ पर्व के दिनों में सुबह उठकर या शाम के समय घाट की यात्रा के दौरान इस गीत को सुनने से विशेष ऊर्जा और भक्तिमय आनंद की अनुभूति होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत, और सनातन पर्वों के अध्ययन के आधार पर तैयार की गई है। भक्तिलोक की संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सभी पाठकों को पारंपरिक कला और धार्मिक अनुष्ठानों की सटीक, प्रामाणिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध जानकारी प्राप्त हो। प्रस्तुत आलेख में प्रयुक्त सभी शब्द और भाव लोक परंपराओं के अनुरूप हैं। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पारंपरिक भोजपुरी लोकगायन एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान परंपरा
  • भारतीय सूर्य उपासना और षष्ठी व्रत की पौराणिक कथाएं
  • क्षेत्रीय लोकगीत संकलन एवं सांस्कृतिक साहित्य
  • पंचांग एवं पर्व निर्देशिका संदर्भ

संबंधित भजन एवं लेख

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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