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Nadiya Ke Teere Teere Chhath Geet By Sharda Sinha [Full Song

पढ़ें Nadiya Ke Teere Teere Bhojpuri Chhath Geet By Sharda Sinha [Full Song] I Arag का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक म

लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा की महिमा भारतीय संस्कृति में अद्वितीय है। इस पावन अवसर पर गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत न केवल उत्सव की शोभा बढ़ाते हैं, बल्कि व्रतियों के कठिन तप, अटूट श्रद्धा और समर्पण को भी स्वर प्रदान करते हैं। स्वर कोकिला पद्म भूषण डॉ. शारदा सिन्हा द्वारा गाया गया कालजयी गीत "नदिया के तीरे तीरे" (Nadiya Ke Teere Teere) एक ऐसा ही मर्मस्पर्शी और भक्तिपूर्ण गीत है जो हर छठ प्रेमी के हृदय में उतर जाता है। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं है, बल्कि गंगा-यमुना और सरयू जैसी पवित्र नदियों के तट पर खड़े होकर भगवान सूर्य देव और छठी मइया को अर्घ्य देने की व्याकुलता, पवित्रता और अटूट विश्वास का सजीव चित्रण है। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन गीत के संपूर्ण बोल, उसका गहरा आध्यात्मिक भावार्थ, सांस्कृतिक महत्व और इससे जुड़ी परंपराओं का गहन विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

नदिया के तीरे तीरे, अरघिया देबों रे सूपवा,
हे छठी मइया, अरघिया देबों रे सूपवा॥

कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए,
बहंगी लचकत जाए, छठी मइया हो...
नदिया के तीरे तीरे, अरघिया देबों रे सूपवा॥

सातों संताने मिलि के, अरघिया देबों रे सूपवा,
हे छठी मइया, अरघिया देबों रे सूपवा॥

केकरा से पूछि के, अरघिया देबों रे सूपवा,
केकरा से पूछि के, अरघिया देबों रे सूपवा॥

पूतवा से पूछि के, अरघिया देबों रे सूपवा,
हे छठी मइया, अरघिया देबों रे सूपवा॥

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह गीत छठ पूजा के सबसे महत्वपूर्ण क्षण यानी नदी के किनारे खड़े होकर संध्या और सूर्योदय के समय अर्घ्य देने की प्रक्रिया को दर्शाता है। गीत की प्रत्येक पंक्ति में लोक जीवन की सादगी और ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम समाहित है:

  • प्रथम अंतरा (नदिया के तीरे तीरे...): व्रती कहती है कि हे छठी मइया! मैं नदी के पवित्र किनारे पर खड़े होकर सूप में अर्घ्य की सामग्री सजाकर आपको समर्पित कर रही हूँ। यह नदी का किनारा केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और परमात्मा के मिलन का साक्षी है।
  • द्वितीय अंतरा (कांच ही बांस के बहंगिया...): छठ पूजा में बांस की बहंगी का विशेष महत्व है। नवजात बांस से बनी बहंगी जब फल, ठेकुआ और पूजा की अन्य सामग्रियों से भर जाती है, तो वह भार के कारण लचकने लगती है। यह लचकना व्रती के समर्पण और पूजा की प्रचुरता को दर्शाता है।
  • तृतीय अंतरा (सातों संताने मिलि के...): छठ पूजा केवल व्यक्तिगत साधना नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार और समाज को एक सूत्र में पिरोने वाला पर्व है। जब परिवार के सभी सदस्य (सातों संतानें) मिलकर अर्घ्य देते हैं, तो यह पारिवारिक एकता, समृद्धि और सामूहिक प्रार्थना का प्रतीक बन जाता है।
  • चतुर्थ एवं पंचम अंतरा (केकरा से पूछि के... पूतवा से पूछि के...): यह संवाद शैली में लिखा गया अंश है। इसमें पूछा जाता है कि यह अर्घ्य किससे पूछकर या किसकी सहमति और मंगलकामना के लिए दिया जा रहा है? उत्तर मिलता है कि अपने पुत्र और संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए यह अर्घ्य दिया जा रहा है।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मुख्य भावना 'वात्सल्य', 'प्रकृति प्रेम' और 'पूर्ण समर्पण' है। छठ पूजा एक ऐसा पर्व है जिसमें किसी पुरोहित या मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं होती। व्रती सीधे प्रकृति के प्रत्यक्ष देवता सूर्य और उनकी शक्ति छठी मइया से संवाद करती है। यह गीत संदेश देता है कि ईश्वर की आराधना के लिए किसी आडंबर की नहीं, बल्कि शुद्ध अंतःकरण, पवित्र बांस की बहंगी, मिट्टी के चूल्हे पर बने प्रसाद और नदी के शीतल जल की आवश्यकता होती है। यह गीत पारिवारिक मूल्यों को सुदृढ़ करने और संतानों के कल्याण की कामना को सर्वोपरि रखने का संदेश देता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण श्रेणी गीत की जानकारी (Song Details)
गीत का नाम नदिया के तीरे तीरे (Nadiya Ke Teere Teere)
मुख्य गायिका पद्म भूषण डॉ. शारदा सिन्हा (Sharda Sinha)
गीत का प्रकार पारंपरिक भोजपुरी छठ गीत (Traditional Bhojpuri Chhath Geet)
मुख्य वाद्य यंत्र ढोलक, मंजीरा, बांसुरी, हारमोनियम
भाषा भोजपुरी / मैथिली मिश्रित लोक भाषा
मुख्य विषय छठ पूजा, सूर्य अर्घ्य, पारिवारिक सुख-समृद्धि
संगीत शैली बिहार की पारंपरिक लोक संगीत शैली

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

इस गीत को अपनी दिव्य और मर्मस्पर्शी आवाज से अमर बनाने का श्रेय डॉ. शारदा सिन्हा को जाता है। बिहार की माटी की महक को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने वाली शारदा सिन्हा जी को 'बिहार कोकिला' कहा जाता है। उनके गाए छठ गीत हर वर्ष कार्तिक और चैत्र मास में हर घर, गली और घाट पर गूंजते हैं। उनकी आवाज में जो करुणा, मातृत्व और भक्ति का भाव है, वह सीधे सुनने वाले के आंसू ला देता है। इस गीत का संगीत पारंपरिक लोक धुनों पर आधारित है, जिसे पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से संजोकर रखा गया है और शारदा जी ने इसे आधुनिक रिकॉर्डिंग के माध्यम से अमर बना दिया।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द (Word) सरल अर्थ (Meaning) सांस्कृतिक संदर्भ (Context)
तीरे तीरे किनारे-किनारे नदी के पवित्र घाट या तट के समीप खड़े होना।
अरघिया अर्घ्य / जल और दूध का अर्पण सूर्य देव को सूप में रखकर दी जाने वाली अंजलि।
सूपवा बांस का बना सूप जिसमें पूजा का प्रसाद और फल रखकर अर्घ्य दिया जाता है।
बहंगिया बांस की कांवड़ / बहंगी प्रसाद ढोने के लिए बांस से बना पारंपरिक ढांचा।
लचकत लचकना या झुकना प्रसाद के भारी वजन और श्रद्धा के कारण बांस का झुकना।
पूतवा पुत्र / संतान वंश की रक्षा और संतान की दीर्घायु की कामना।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ पूजा का त्योहार वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। "नदिया के तीरे तीरे" गीत इस पर्व के वैज्ञानिक पक्ष को भी छूता है। नदी के बहते जल में खड़े होकर सूर्य की रश्मियों को ग्रहण करना शरीर और मन को नई ऊर्जा से भर देता है।

सांस्कृतिक रूप से, यह गीत बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) की लोक संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। जब व्रती महिलाएं छठ पूजा सामग्री सूची के अनुसार सूप सजाती हैं और घाट की ओर प्रस्थान करती हैं, तब इस गीत का गायन उनके मार्ग की थकान को दूर कर देता है। यह गीत समाज के हर वर्ग को एक समान धरातल पर लाता है, जहाँ अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है और सभी एक ही घाट पर एक साथ अर्घ्य देते हैं।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह पारंपरिक गीत हमें कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सिखाता है:

  • प्रकृति का संरक्षण: नदी के किनारे पूजा करना हमें जल स्रोतों को स्वच्छ और पवित्र रखने की प्रेरणा देता है।
  • सादगी और सुगमता: बांस, मिट्टी और घर के बने पकवानों (ठेकुआ) का उपयोग यह सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए महंगे साधनों की आवश्यकता नहीं है।
  • पारिवारिक सामंजस्य: "सातों संताने मिलि के" पंक्ति दर्शाती है कि परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ मिलकर कार्य करना ही वास्तविक सुख है।
  • धैर्य और तपस्या: 36 घंटे का निर्जला व्रत रखने वाली माताएं इस गीत के माध्यम से अपनी मानसिक शक्ति और धैर्य को सुदृढ़ करती हैं।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यद्यपि यह गीत वर्षभर सुना जा सकता है, परंतु इसका वास्तविक आनंद और महत्व छठ पूजा के चार दिवसीय अनुष्ठान के दौरान होता है:

  1. नहाय-खाय (प्रथम दिन): इस दिन से ही घरों में शारदा सिन्हा के गीतों की गूंज शुरू हो जाती है।
  2. खरना (द्वितीय दिन): प्रसाद बनाने के समय इस शांत और मधुर गीत को सुनकर मन एकाग्र होता है।
  3. संध्या अर्घ्य (तृतीय दिन): जब व्रती घाट की ओर प्रस्थान करते हैं, तब यह गीत सामूहिक रूप से गाया जाता है।
  4. उषा अर्घ्य (चतुर्थ दिन): सुबह के समय सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हुए सूर्य देव अर्घ्य मंत्र के साथ इस गीत का गायन अनुष्ठान को पूर्ण बनाता है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु संक्षिप्त विवरण
गीत का शीर्षक नदिया के तीरे तीरे
मुख्य स्वर डॉ. शारदा सिन्हा
संबद्ध पर्व महापर्व छठ पूजा (कार्तिक/चैत्र)
मुख्य आराध्य सूर्य देव एवं छठी मइया
काव्य रस भक्ति रस, वात्सल्य रस
प्रतीक चिन्ह बांस की बहंगी, सूप, नदी का घाट
सांस्कृतिक प्रभाव वैश्विक भोजपुरी समाज

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: "नदिया के तीरे तीरे" गीत की मुख्य गायिका कौन हैं?
उत्तर: इस अत्यंत लोकप्रिय और पारंपरिक छठ गीत की मुख्य गायिका स्वर कोकिला पद्म भूषण डॉ. शारदा सिन्हा हैं।

प्रश्न 2: इस गीत में 'बहंगिया' का क्या अर्थ है?
उत्तर: 'बहंगिया' का अर्थ बांस से बनी उस कांवड़ से है जिसमें छठ पूजा का प्रसाद, फल और सूप रखकर घाट तक ले जाया जाता है।

प्रश्न 3: यह गीत किस भाषा में गाया गया है?
उत्तर: यह गीत मुख्य रूप से भोजपुरी और मैथिली के लोक पुट से सजी पारंपरिक लोक भाषा में गाया गया है।

प्रश्न 4: गीत में "सातों संताने मिलि के" पंक्ति का क्या महत्व है?
उत्तर: यह पंक्ति पारिवारिक एकता और सामूहिक रूप से माता-पिता व संतानों द्वारा मिलकर पूजा संपन्न करने के महत्व को दर्शाती है।

प्रश्न 5: छठ पूजा में नदी के किनारे (तीरे) का क्या महत्व है?
उत्तर: नदी का किनारा प्रकृति के शुद्धतम रूप का प्रतीक है। बहते जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देना शारीरिक और आध्यात्मिक शुद्धि का मार्ग है।

प्रश्न 6: क्या यह गीत चैती छठ में भी गाया जाता है?
उत्तर: हाँ, यह गीत कार्तिक मास की मुख्य छठ पूजा और चैत्र मास की चैती छठ दोनों ही अवसरों पर समान रूप से श्रद्धा के साथ गाया जाता है।

प्रश्न 7: इस गीत का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इस गीत का मुख्य संदेश प्रकृति की उपासना, पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना और सादगीपूर्ण जीवन शैली को अपनाना है।

प्रश्न 8: शारदा सिन्हा के छठ गीतों को इतना पसंद क्यों किया जाता है?
उत्तर: शारदा सिन्हा की आवाज में गजब की सादगी, शुद्धता और लोक जीवन के प्रति गहरी संवेदना है, जो सीधे श्रोताओं के अंतर्मन को छूती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पर आधारित है। इस लेख का उद्देश्य लोक संस्कृति के अमूल्य रत्नों को सहेजकर पाठकों तक शुद्ध और प्रामाणिक रूप में पहुंचाना है। "नदिया के तीरे तीरे" गीत के माध्यम से हमने बिहार की समृद्ध लोक परंपरा और संगीत विरासत को रेखांकित करने का प्रयास किया है। यह सामग्री पारंपरिक मान्यताओं, लोकगीतों के प्रामाणिक संकलन और सांस्कृतिक विशेषज्ञों के विचारों के समन्वय से तैयार की गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • बिहार की लोक संस्कृति और पारंपरिक संगीत संकलन।
  • डॉ. शारदा सिन्हा के आधिकारिक संगीत एल्बम और साक्षात्कार।
  • छठ पूजा व्रत कथा एवं पारंपरिक लोक साहित्य।
  • पद्म पुरस्कार विजेता कलाकारों के सांस्कृतिक योगदान पर आधारित प्रलेख।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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