बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे पावन और महापर्व छठ पूजा के अवसर पर गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत केवल संगीत नहीं, बल्कि आस्था, समर्पण और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। सुप्रसिद्ध लोक गायिका 'देवी' (DEVI) की सुमधुर आवाज में सजे "Bhojpuri Chhath Pooja Geet" का यह संग्रह छठी मैया और भगवान सूर्य देव की आराधना का एक अत्यंत पावन माध्यम है। वर्ष 2017 में रिलीज हुआ यह गीत संग्रह आज भी हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस महापर्व में श्रद्धा और भक्ति का संचार करता है। इस लेख में हम इस संग्रह के प्रमुख गीतों के बोल, उनके गहरे आध्यात्मिक भावार्थ, छठ पूजा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और इन गीतों के माध्यम से मिलने वाले जीवन संदेशों का सविस्तार विश्लेषण करेंगे।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics
गीत १: कांच ही बांस के बहंगिया
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए।
बहंगी लचकत जाए...
बात जे पुछैले बटोहिया, बहंगी केकरा के जाए?
बात जे पुछैले बटोहिया, बहंगी केकरा के जाए?
तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहंगी छठी माई के जाए।
बहंगी छठी माई के जाए...
गीत २: केलवा के पात पर उगेलन सुरुज देव
केलवा के पात पर उगेलन सुरुज देव, झांकेले झुकेले।
एकर ऊपर सुगा मेड़राए, सुगा मेड़राए...
उ जे खबरी जनइबो अउरंग देव से, सुगा देब मरवाए।
उ जे खबरी जनइबो अउरंग देव से, सुगा देब मरवाए...
मारबो रे सुगवा धनुष से, सुगा गिरे मुरझाय।
सुगा गिरे मुरझाय...
गीत ३: उगा हो सुरुज देव भइल भिनसार
उगा हो सुरुज देव भइल भिनसार, अरघ के रे बेरवा।
अरघ के रे बेरवा...
बाट जोहेली छठी मैया, भइल भिनसार।
भइल भिनसार...
नारियल केरा घवधवा, सजल दउरवा।
सजल दउरवा...
उगा हो सुरुज देव भइल भिनसार...
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
छठ पूजा के इन पारंपरिक गीतों में प्रकृति, मानवीय संवेदनाओं और ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
कांच ही बांस के बहंगिया का भावार्थ
इस गीत में उस पवित्र बांस की बहंगी (टोकरी ले जाने वाला ढांचा) का वर्णन है, जिसे नवविवाहित या व्रती पुरुष अपने कंधे पर उठाकर घाट की ओर ले जाते हैं। 'कांच ही बांस' का अर्थ है कच्चा और अत्यंत शुद्ध बांस, जो पवित्रता का प्रतीक है। जब राहगीर (बटोहिया) पूछता है कि यह बहंगी किसके लिए जा रही है, तो श्रद्धा से भरा भक्त कहता है कि क्या तुम अंधे हो? यह बहंगी हमारी आराध्य छठी मैया के लिए जा रही है। यह गीत दर्शाता है कि छठ पूजा में उपयोग होने वाली हर सामग्री कितनी शुद्ध और पवित्र होती है।
केलवा के पात पर उगेलन सुरुज देव का भावार्थ
इस गीत में केले के पत्तों के पीछे से उदित होते सूर्य देव का अत्यंत मनोहारी चित्रण है। गीत में एक तोता (सुगा) केले के घौद और फलों पर मंडरा रहा है। व्रती चिंतित है कि कहीं सुगा इन फलों को जूठा न कर दे, क्योंकि छठ का प्रसाद अत्यंत शुद्ध होना चाहिए। यदि सुगा फल को जूठा करेगा, तो सूर्य देव (अउरंग देव) क्रोधित होंगे। यह गीत प्रकृति के जीवों और मनुष्य के बीच के उस द्वंद्व को दिखाता है जहां पूजा की शुद्धता सर्वोपरि है।
उगा हो सुरुज देव भइल भिनसार का भावार्थ
यह सुबह के अर्घ्य का गीत है। रात भर जागकर नदी के घाट पर ठंडे पानी में खड़े भक्त सूर्य देव से प्रार्थना करते हैं कि हे दिवाकर! अब उदित होइए, सुबह हो चुकी है और आपके अर्घ्य का समय हो गया है। छठी मैया और आपके भक्त आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। नारियल और केले से सजी दउरी (बांस का सूप) आपके स्वागत के लिए तैयार है।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
इन गीतों की मुख्य भावना समर्पण, शुद्धता और कृतज्ञता है। छठ पूजा एकमात्र ऐसा पर्व है जहां डूबते हुए सूर्य और उगते हुए सूर्य दोनों की पूजा की जाती है। यह जीवन के चक्र को दर्शाता है कि जो अस्त हुआ है, उसका उदय निश्चित है। 'देवी' की आवाज में गाए गए ये गीत भक्तों के मन में करुणा और असीम शांति का संचार करते हैं। इन गीतों का संदेश है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी आडंबर की आवश्यकता नहीं है, बल्कि मिट्टी के चूल्हे, बांस के सूप और शुद्ध अंतःकरण से भी परमेश्वर को प्रसन्न किया जा सकता है।
गीत की जानकारी | Song Information
| विवरण बिंदु | महत्वपूर्ण जानकारी |
|---|---|
| गीत संग्रह का नाम | Bhojpuri Chhath Pooja Geet (Best Collection) |
| मुख्य गायिका | देवी (DEVI) |
| भाषा | भोजपुरी (Bhojpuri) |
| रिलीज वर्ष | 2017 |
| मुख्य देव/देवी | छठी मैया (षष्ठी देवी) एवं भगवान सूर्य देव |
| संगीत शैली | पारंपरिक भोजपुरी लोक संगीत (Folk Devotional) |
| मुख्य वाद्य यंत्र | ढोलक, मंजीरा, बांसुरी, हारमोनियम |
गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators
भोजपुरी लोकगायिका देवी (DEVI) अपनी खनकती और पारंपरिक आवाज के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने इस संग्रह में सदियों से गाए जा रहे पारंपरिक छठ गीतों को एक नया जीवन दिया है। इन गीतों के मूल रचनाकार अज्ञात हैं, क्योंकि ये लोकगीत मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहे हैं। संगीत संयोजन में आधुनिकता और पारंपरिक लोक धुनों का ऐसा मिश्रण किया गया है जो सीधे हृदय को छूता है।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| कठिन शब्द | सरल हिंदी अर्थ | सांस्कृतिक संदर्भ |
|---|---|---|
| बहंगिया (बहंगी) | बांस का बना हुआ कांवड़ | छठ का प्रसाद घाट तक ले जाने का साधन |
| बटोहिया | राहगीर या यात्री | संसार के साधारण मनुष्य का प्रतीक |
| भिनसार | भोर या सुबह का समय | उषा काल जब सूर्य देव उदित होने वाले होते हैं |
| अरघ (अर्घ्य) | जल या दूध अर्पित करना | सूर्य देव को दिया जाने वाला अर्पण |
| दउरवा (दउरी) | बांस की बड़ी टोकरी | जिसमें पूजा का सारा प्रसाद रखा जाता है |
| सुगवा (सुगा) | तोता | प्रकृति के जीवों का प्रतिनिधित्व |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
छठ पूजा के इन गीतों का आध्यात्मिक महत्व बहुत गहरा है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, षष्ठी देवी (छठी मैया) भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री और बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं। वहीं सूर्य देव प्रत्यक्ष देवता हैं जो संपूर्ण जगत को ऊर्जा प्रदान करते हैं। जब हम देवी भजन और छठ गीतों का श्रवण करते हैं, तो यह हमारे भीतर रजोगुण और तमोगुण का नाश कर सतोगुण का विकास करता है।
सांस्कृतिक रूप से, ये गीत भोजपुरी भाषी समाज की पहचान हैं। चाहे कोई व्यक्ति देश में हो या विदेश में, कार्तिक मास आते ही इन गीतों की गूंज उसे अपनी मिट्टी की याद दिला देती है। यह पर्व सामाजिक समरसता का भी संदेश देता है, क्योंकि इसमें अमीर-गरीब सभी एक ही घाट पर, एक जैसे सूप और दउरी के साथ बिना किसी भेदभाव के पूजा करते हैं।
गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons
- प्रकृति का संरक्षण: छठ पूजा में नदी, तालाब, सूर्य, बांस, केले और मिट्टी का उपयोग होता है, जो हमें प्रकृति के करीब लाता है।
- शुद्धता और अनुशासन: यह पर्व और इसके गीत हमें जीवन में शारीरिक और मानसिक स्वच्छता बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं।
- धैर्य और प्रतीक्षा: 'उगा हो सुरुज देव' गीत हमें सिखाता है कि अंधकार चाहे कितना भी घना हो, सुबह की नई किरण का इंतजार धैर्यपूर्वक करना चाहिए।
- सरलता: छठ पूजा में किसी पुरोहित या महंगे अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती। यह दिखाता है कि ईश्वर सरल हृदय और सच्ची भक्ति से प्रसन्न होते हैं।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
यद्यपि इन गीतों को कभी भी सुना जा सकता है, लेकिन इनका वास्तविक आनंद और महत्व छठ पूजा के चार दिवसीय अनुष्ठान के दौरान होता है:
- नहाय-खाय (प्रथम दिन): इस दिन से ही घरों में इन गीतों की गूंज शुरू हो जाती है।
- खरना (द्वितीय दिन): शाम को प्रसाद बनते समय शांत और भक्तिमय माहौल में ये गीत गाए जाते हैं।
- संध्या अर्घ्य (तृतीय दिन): घाट पर जाते समय और डूबते सूर्य को अर्घ्य देते समय सामूहिक रूप से इन गीतों का गायन होता है।
- उषा अर्घ्य (चतुर्थ दिन): सुबह के समय सूर्य देव के स्वागत में 'उगा हो सुरुज देव' गीत गाया जाता है।
एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance
| मुख्य विशेषता | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| संग्रह का नाम | Bhojpuri Chhath Pooja Geet I DEVI |
| मुख्य विषय | छठी मैया की महिमा और सूर्य देव की आराधना |
| काव्य शैली | भोजपुरी लोकगीत (पारंपरिक टेर और लय) |
| उपयुक्त अवसर | कार्तिक एवं चैती छठ महापर्व |
| दार्शनिक संदेश | प्रकृति पूजा, समानता और अटूट विश्वास |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस संग्रह के गीतों का संकलन और उनकी व्याख्या पारंपरिक भोजपुरी लोक संस्कृति, वृद्धजनों के अनुभवों और प्रामाणिक लोक साहित्य के आधार पर की गई है। गायिका 'देवी' के इस एल्बम ने भोजपुरी लोक संगीत को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई है। इस सामग्री का उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध लोक विरासत और आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़े रखना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- भोजपुरी लोक साहित्य एवं पारंपरिक छठ गीत संग्रह।
- देवीभागवत पुराण - षष्ठी देवी उपख्यान।
- बिहार एवं पूर्वांचल की लोक सांस्कृतिक परंपराएं।
- सुप्रसिद्ध गायिका 'देवी' (DEVI) का आधिकारिक संगीत एल्बम (2017)।
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