bholenath bhajan lyrics मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

तेरे दर्शन को जी करता है भजन इन हिंदी लिरिक्स

पढ़ें तेरे दर्शन को जी करता है भजन इन हिंदी लिरिक्स का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

"तेरे दर्शन को जी करता है" यह हृदयस्पर्शी भजन भगवान शिव के प्रति एक भक्त की अनन्य निष्ठा, व्याकुलता और उनके साक्षात दर्शन की तीव्र लालसा को व्यक्त करता है। सनातन धर्म में महादेव को 'आशुतोष' कहा गया है, जो अपने भक्तों की पुकार सुनकर तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। यह भजन न केवल एक संगीतमय रचना है, बल्कि यह जीवात्मा की उस तड़प का प्रतीक है जो संसार के मायाजाल से मुक्त होकर अपने आराध्य के चरणों में विश्राम पाना चाहती है। शिव भक्ति के इस पावन संकीर्तन को गाते समय साधक का मन एकाग्र होता है और वह स्वयं को कैलाशपति की शरण में अनुभव करता है। यह भजन विशेष रूप से सोमवार के व्रत, महाशिवरात्रि, श्रावण मास और शिव मंदिरों में आयोजित सत्संगों में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है। इसके सरल शब्द और मधुर धुन भक्त को ध्यान की गहराइयों में ले जाने में सक्षम हैं।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

तेरे दर्शन को जी करता है

तेरे दर्शन को जी करता है,
तुमसे मिलने को जी करता है,
तेरे चरणों में ध्यान लगता है,
तेरे दर्शन को जी करता है।

कोई कहता तुम्हें दुधाधारी है,
कोई कहता तुम्हें चिमटा धारी है,
तेरे दर्शन को जी करता है।

बाबा जिनको भी चाहे बुलाते है,
पल में भक्तों के दुखड़े मिटाते है,
बिन मांगे ही सब कुछ लुटाता है,
तेरे दर्शन को जी करता है।

कोई कहता तुम्हें डमरू वाला है,
कोई कहता तुम्हें विष पीने वाला है,
तेरे दर्शन को जी करता है।

गंगा जटा में विराजे तुम्हारे,
माथे पे चंदा चमके प्यारे,
गले में सर्पों की माला सुहाती है,
तेरे दर्शन को जी करता है।

भक्तों की नैया पार लगाते,
शरण में आए को गले से लगाते,
तेरी महिमा तो जग ये गाता है,
तेरे दर्शन को जी करता है।

तेरे दर्शन को जी करता है,
तुमसे मिलने को जी करता है,
तेरे चरणों में ध्यान लगता है,
तेरे दर्शन को जी करता है।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन भक्त और भगवान के बीच के अत्यंत सरल और आत्मीय संबंध को दर्शाता है। इसका मुख्य भाव 'विरह' और 'समर्पण' है। जीवात्मा जब संसार के भौतिक सुखों से थक जाती है, तब उसे केवल अपने परमपिता परमात्मा के दर्शन की अभिलाषा होती है। भजन की शुरुआत में ही भक्त अपनी व्याकुलता प्रकट करते हुए कहता है कि हे भोलेनाथ! अब मेरा मन केवल आपके दर्शन के लिए लालायित है। आपके पावन चरणों में ही मेरा ध्यान केंद्रित होता है।

भजन के अगले भाग में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन है। कोई उन्हें 'दुधाधारी' (दूध का आहार करने वाले या अत्यंत सौम्य) कहता है, तो कोई उन्हें 'चिमटा धारी' (वैरागी साधु रूप) कहता है। शिवजी के ये विविध रूप इस बात के प्रतीक हैं कि वे हर प्रकार के साधक के लिए सुलभ हैं। वे राजाओं के राजा भी हैं और श्मशान वासी अघोरी भी। वे अपने भक्तों को बिना मांगे ही सब कुछ प्रदान कर देते हैं। उनके दरबार में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है; वे जिसे चाहते हैं, उसे अपने पास बुला लेते हैं और पल भर में उसके सारे कष्टों का निवारण कर देते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह हमें सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी कठिन कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है, बल्कि केवल एक सच्चे और व्याकुल हृदय की पुकार ही पर्याप्त है।

  • अनन्य भक्ति का प्रकटीकरण: भजन में प्रयुक्त शब्द "जी करता है" भक्त की उस आंतरिक इच्छा को दर्शाते हैं जो किसी सांसारिक वस्तु के लिए नहीं, बल्कि केवल ईश्वर के सानिध्य के लिए है।
  • शिव के कृपालु स्वरूप का वर्णन: "बिन मांगे ही सब कुछ लुटाता है" यह पंक्ति दर्शाती है कि भगवान शिव 'औढरदानी' हैं। वे अपने भक्तों की झोली को बिना किसी संकोच के भर देते हैं।
  • ध्यान की एकाग्रता: इस भजन का निरंतर गान करने से मन शांत होता है और ध्यान स्वतः ही भगवान शिव के चरणों में लग जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान शिव की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर और विधियां बताई गई हैं जो साधक को अधिक लाभ पहुंचाती हैं:

  1. शुभ समय: सोमवार के दिन, विशेषकर संध्या काल (प्रदोष काल) में इस भजन का गायन अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, महाशिवरात्रि और सावन के महीने में इसका सामूहिक संकीर्तन किया जाना चाहिए।
  2. गायन की विधि: शांत चित्त होकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। अपने समक्ष भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित करें। एक दीपक प्रज्वलित करें और पूर्ण श्रद्धा के साथ तालियों या मंजीरे की थाप पर इस भजन का गान करें।
  3. मानसिक भाव: गाते समय अपने मन में यह भाव रखें कि आप साक्षात कैलाश पर्वत पर महादेव के सम्मुख बैठे हैं और उनसे अपनी व्यथा कह रहे हैं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन देवों के देव महादेव, भगवान शिव को समर्पित है। शिवजी को हिंदू धर्म में संहार का देवता माना गया है, परंतु वे कल्याणकारी और अत्यंत दयालु भी हैं। इस भजन में प्रयुक्त शब्दावली जैसे 'चिमटा धारी' और 'दुधाधारी' नाथ संप्रदाय के संतों और नागा साधुओं की परंपरा से प्रेरित प्रतीत होती है। नाथ संप्रदाय में शिव को आदिनाथ माना गया है, और उनके इसी वैरागी तथा लोक-कल्याणकारी रूप की पूजा की जाती है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह एक पारंपरिक लोक भजन है, जिसकी रचना किसी एक विशिष्ट कवि द्वारा नहीं की गई है, बल्कि यह सदियों से भक्तों के कंठ से प्रवाहित होता आ रहा है। भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में होने वाले कीर्तनों और जागरणों में इस भजन को बहुत चाव से गाया जाता है। समय के साथ इसके शब्दों में थोड़ा-बहुत परिवर्तन अवश्य हुआ है, परंतु इसकी मूल आत्मा और भगवान शिव के प्रति समर्पण का भाव आज भी वैसा ही बना हुआ है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और लोकप्रचलित हिंदी (खड़ी बोली) है। इसमें किसी भी प्रकार के कठिन संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है, जिससे यह समाज के हर वर्ग के लिए सुलभ और गाने योग्य बन जाता है। इसकी काव्य शैली 'पद' और 'गीत' के रूप में है, जिसमें लय और ताल का सुंदर समन्वय है। "जी करता है" की पुनरावृत्ति भजन में एक सुंदर संगीतमय प्रवाह उत्पन्न करती है, जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है जो हमारे दैनिक जीवन में अत्यंत उपयोगी हैं:

  • संतोष और विश्वास: भगवान शिव "बिन मांगे ही सब कुछ लुटाते हैं", इसलिए हमें अपनी इच्छाओं के पीछे भागने के बजाय ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए।
  • समानता का भाव: शिवजी के दरबार में अमीर-गरीब, राजा-रंक सभी समान हैं। वे सबको अपनी शरण में लेते हैं। हमें भी समाज में समानता का व्यवहार करना चाहिए।
  • वैराग्य और सादगी: शिवजी का 'चिमटा धारी' रूप हमें सिखाता है कि जीवन में सादगी और वैराग्य का होना आवश्यक है। भौतिक वस्तुएं क्षणभंगुर हैं, केवल ईश्वर का प्रेम ही शाश्वत है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ भजन के संदर्भ में महत्व
दुधाधारी दूध का आहार करने वाले / अत्यंत सौम्य भगवान शिव का वह रूप जो अत्यंत शांत और दुग्धाभिषेक से प्रसन्न होने वाला है।
चिमटा धारी हाथ में चिमटा धारण करने वाले साधु शिवजी का वैरागी और तपस्वी रूप, जो सांसारिक मोह-माया से परे है।
दुखड़े कष्ट, पीड़ा और समस्याएं भक्तों के जीवन के सभी शारीरिक, मानसिक और सांसारिक कष्ट।
नैया पार लगाना भवसागर से पार उतारना जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्रदान करना।
जी करता है तीव्र इच्छा होना / व्याकुलता भक्त के हृदय की वह तड़प जो केवल ईश्वर दर्शन के लिए है।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"तेरे दर्शन को जी करता है, तुमसे मिलने को जी करता है..."
इन पंक्तियों में भक्त अपनी आत्मा की गहरी पुकार को व्यक्त कर रहा है। वह कहता है कि हे प्रभु, मेरा मन अब इस संसार के प्रपंचों से थक चुका है और केवल आपके दिव्य दर्शन के लिए व्याकुल है।

"कोई कहता तुम्हें दुधाधारी है, कोई कहता तुम्हें चिमटा धारी है..."
भक्त कहता है कि लोग आपको अनेक रूपों में पूजते हैं। कोई आपको दूध अर्पित कर शांत रूप में देखता है, तो कोई आपको चिमटा धारण किए हुए एक तपस्वी के रूप में पूजता है। मेरे लिए आपके ये सभी रूप वंदनीय हैं।

"बाबा जिनको भी चाहे बुलाते है, पल में भक्तों के दुखड़े मिटाते है..."
महादेव की कृपा अपरंपार है। वे जिसे अपनी भक्ति का मार्ग दिखाना चाहते हैं, उसे स्वयं अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। वे अपने शरण में आए भक्तों के कष्टों को क्षण भर में दूर कर देते हैं।

"गंगा जटा में विराजे तुम्हारे, माथे पे चंदा चमके प्यारे..."
यहाँ शिवजी के मनमोहक स्वरूप का वर्णन है। उनकी जटाओं से मां गंगा की पावन धारा बहती है और उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है, जो शीतलता और शांति का प्रतीक है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के साथ भगवान शिव के इस परम कल्याणकारी मंत्र का जाप करने से साधना और भी फलदायी हो जाती है:

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

अर्थ: हम त्रि-नेत्रधारी भगवान शिव की पूजा करते हैं, जो सुगंधित हैं और हमारा पोषण करते हैं। जैसे फल शाखा के बंधन से मुक्त हो जाता है, वैसे ही वे हमें मृत्यु और नश्वरता से मुक्त करें।

इसके साथ ही, आप भगवान शिव की स्तुति के लिए शिव तांडव स्तोत्र या श्री शिव चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं, जो भक्त को शिवमय बना देता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम तेरे दर्शन को जी करता है
आराध्य देव भगवान शिव (भोलेनाथ)
भजन का प्रकार भक्ति गीत / संकीर्तन
मुख्य भाव समर्पण, विरह, दर्शन की अभिलाषा
उपयुक्त अवसर सोमवार व्रत, महाशिवरात्रि, सावन मास, प्रदोष व्रत
भाषा सरल हिंदी (लोक भाषा)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

"तेरे दर्शन को जी करता है" भजन किस देवता को समर्पित है?

यह भजन भगवान शिव (भोलेनाथ) को समर्पित है, जिसमें उनके दर्शन की तीव्र इच्छा व्यक्त की गई है।

इस भजन को गाने का सबसे उत्तम समय कौन सा है?

इस भजन को सोमवार के दिन, सावन के महीने में, या प्रतिदिन संध्या काल की आरती के समय गाना अत्यंत शुभ माना जाता है।

भजन में "चिमटा धारी" शब्द का क्या अर्थ है?

"चिमटा धारी" शब्द भगवान शिव के वैरागी, तपस्वी और नागा साधु रूप को दर्शाता है, जो हाथ में चिमटा धारण करते हैं।

क्या इस भजन का पाठ करने से मानसिक शांति मिलती है?

हां, इस भजन के सरल और मधुर शब्द मन को एकाग्र करते हैं, जिससे तनाव दूर होता है और मानसिक शांति का अनुभव होता है।

भगवान शिव को "दुधाधारी" क्यों कहा गया है?

शिवजी को दुग्ध (दूध) अत्यंत प्रिय है। उनका दुग्धाभिषेक करने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं, इसलिए उन्हें आदरपूर्वक दुधाधारी भी कहा जाता है।

इस भजन की मुख्य सीख क्या है?

यह भजन हमें सिखाता है कि ईश्वर के प्रति हमारा प्रेम निस्वार्थ होना चाहिए और हमें उनके हर रूप में विश्वास रखना चाहिए।

क्या इस भजन को महाशिवरात्रि पर गाया जा सकता है?

हां, महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर इस भजन का सामूहिक संकीर्तन करना अत्यंत फलदायी और आनंददायक होता है।

शिवजी को "आशुतोष" क्यों कहा जाता है?

"आशुतोष" का अर्थ है जो बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाए। शिवजी अपने भक्तों की थोड़ी सी भक्ति से भी प्रसन्न होकर मनचाहा वरदान दे देते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के बोल और भावार्थ को विभिन्न प्रामाणिक स्रोतों, शिव पुराण के प्रसंगों और पारंपरिक लोक भजनों के संग्रह से संकलित कर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और त्रुटिहीन सामग्री पहुंचाना है ताकि वे अपनी साधना को सही दिशा दे सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिव पुराण - कोटिरुद्र संहिता (शिव अवतार एवं महिमा प्रसंग)
  • पारंपरिक शिव भजन संग्रह एवं लोक संगीत परंपरा
  • श्रीमद्भगवद्गीता - भक्ति योग अध्याय

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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