hari bhajan बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

महिमा मेरे शीश के दानी की भजन इन हिंदी लिरिक्स

पढ़ें महिमा मेरे शीश के दानी की भजन इन हिंदी लिरिक्स का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

"महिमा मेरे शीश के दानी की" भजन खाटू श्याम जी की असीम कृपा, उनके परम त्यागी स्वरूप और महाभारत कालीन महान गाथा को समर्पित एक अत्यंत हृदयस्पर्शी और लोकप्रिय रचना है। यह भजन न केवल बाबा श्याम के 'शीश के दानी' होने के गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराता है, बल्कि भक्त के हृदय में प्रभु के प्रति अटूट विश्वास, अनन्य भक्ति और पूर्ण शरणागति का भाव भी जागृत करता है। कलयुग में बाबा खाटू श्याम को 'हारे का सहारा' और 'लखदातारी' कहा गया है, और यह भजन उनके इसी करुणापूर्ण व्यक्तित्व का सजीव चित्रण करता है। इस भजन को गाते समय भक्त स्वयं को उस अद्भुत बलिदानी लीला के समक्ष पाता है, जहाँ वीर बर्बरीक ने धर्म की रक्षा और अपने पितामह श्रीकृष्ण के वचन को निभाने के लिए हंसते-हंसते अपने शीश का दान दे दिया था। यह संकीर्तन विशेष रूप से एकादशी, फाल्गुन मेले, और श्याम बाबा के कीर्तन के दौरान भक्तों द्वारा अत्यंत श्रद्धा और अश्रुपूर्ण नेत्रों से गाया जाता है। इस लेख में हम इस पावन भजन के लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और इससे जुड़ी पौराणिक कथाओं का गहन अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

है जग में महिमा भारी लखदातारी की,
गाऊं बार-बार महिमा मैं मेरे शीश के दानी की।
सांवरे... सांवरे... सांवरे...

माता का वचन निभाए, हारे का साथ दिए,
ज़रा भी ना घबराये, शीश का दान दिए।
अद्भुत बलिदानी देख, चकित बनवारी जी,
गाऊं बार-बार महिमा मैं मेरे शीश के दानी की।
सांवरे... सांवरे... सांवरे...

दर से जाए ना खाली, जगत कल्याण करे,
जो भी श्रद्धा से ध्याए, उसके भंडार भरे।
कलयुग के अवतारी, लीला है न्यारी जी,
गाऊं बार-बार महिमा मैं मेरे शीश के दानी की।
सांवरे... सांवरे... सांवरे...

खाटू में विराजे बाबा, मोरछड़ी लहराए,
भक्तों के संकट हरने, दौड़े-दौड़े आए।
शरण में जो भी आए, विपदा टल जाए जी,
गाऊं बार-बार महिमा मैं मेरे शीश के दानी की।
सांवरे... सांवरे... सांवरे...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस मधुर भजन का मूल भाव पूर्ण समर्पण और कृतज्ञता है। भजन की शुरुआत में ही भक्त उद्घोष करता है कि इस संपूर्ण संसार में 'लखदातारी' (लाखों का दान देने वाले) बाबा श्याम की महिमा अत्यंत विशाल और अपरंपार है। भक्त कहता है कि मैं बार-बार अपने उस आराध्य की महिमा का गान करता हूँ जिन्होंने धर्म की वेदी पर अपने मस्तक का दान दे दिया।

भजन के प्रथम अंतरे में वीर बर्बरीक (श्याम बाबा) के उस महान संकल्प का वर्णन है, जिसमें उन्होंने अपनी माता अहिलावती को वचन दिया था कि वे महाभारत के युद्ध में केवल उसी पक्ष की ओर से लड़ेंगे जो हार रहा होगा। जब भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उनसे दान में उनका शीश मांगा, तो वे तनिक भी विचलित नहीं हुए और सहर्ष अपना मस्तक काट कर प्रभु के चरणों में अर्पित कर दिया। इस अद्वितीय और निस्वार्थ बलिदान को देखकर स्वयं द्वारकाधीश श्रीकृष्ण (बनवारी) भी चकित रह गए और उन्होंने बर्बरीक को कलयुग में अपने नाम 'श्याम' से पूजे जाने का वरदान दिया।

द्वितीय और तृतीय अंतरे में बाबा श्याम की कलयुगी महिमा का गान है। भक्त विश्वास प्रकट करता है कि खाटू धाम के द्वार से कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटता। जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से उनका ध्यान करता है, उसके जीवन के सारे अभाव दूर हो जाते हैं और उसके भंडार भर जाते हैं। वे कलयुग के प्रत्यक्ष देव हैं जो अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए अपनी दिव्य मोरछड़ी से आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह श्रीमद्भागवत और महाभारत के महान सांस्कृतिक मूल्यों का संवाहक है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • त्याग और समर्पण की पराकाष्ठा: यह भजन सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए अहंकार और 'स्व' (शीश) का समर्पण आवश्यक है।
  • शरणागति का संदेश: 'हारे का सहारा' शब्द यह दर्शाता है कि जब संसार के सारे मार्ग बंद हो जाते हैं, तब श्याम बाबा की शरण ही एकमात्र संबल बनती है।
  • भक्त और भगवान का एकाकार: श्रीकृष्ण द्वारा बर्बरीक को अपना नाम देना यह सिद्ध करता है कि सच्चा भक्त अंततः भगवान का ही रूप बन जाता है।

इस भजन का नियमित श्रवण करने से साधक के भीतर विपरीत परिस्थितियों से लड़ने का साहस पैदा होता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि प्रभु की भक्ति के लिए कोई भी समय वर्जित नहीं है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर और विधियां अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:

  • एकादशी व्रत के दिन: खाटू श्याम जी की पूजा में एकादशी (विशेषकर देवउठनी एकादशी और फाल्गुन शुक्ल एकादशी) का अत्यधिक महत्व है। इस दिन इस भजन को गाने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।
  • संध्या आरती के समय: घर या मंदिर में संध्या काल के समय धूप-दीप जलाकर, परिवार के साथ बैठकर सामूहिक रूप से इस भजन का संकीर्तन करना चाहिए।
  • गायन की विधि: भजन गाते समय हाथों से ताली बजाकर और मन में बाबा श्याम की मोरछड़ी धारी छवि का ध्यान करते हुए 'सांवरे... सांवरे...' का आलाप लेना चाहिए। इससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री खाटू श्याम जी (वीर बर्बरीक) को समर्पित है, जिन्हें भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का ही कलयुगी अवतार माना जाता है। बर्बरीक भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। वे बचपन से ही अत्यंत वीर और अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण थे। उन्हें आदिशक्ति जगदम्बा से तीन अमोघ बाण प्राप्त हुए थे, जिसके कारण उन्हें 'तीन बाण धारी' भी कहा जाता है।

इस भजन के भावों में हमें मध्यकालीन संतों जैसे सूरदास, मीराबाई और रसखान की भक्ति पद्धति की झलक मिलती है, जहाँ भगवान को सखा, रक्षक और सर्वस्व मानकर पुकारा जाता है। आज के समय में कन्हैया मित्तल, लखबीर सिंह लख्खा और अंजली द्विवेदी जैसे प्रसिद्ध भजन गायकों ने इस भजन को जन-जन तक पहुँचाया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि महाभारत काल के उस ऐतिहासिक प्रसंग से जुड़ी है जब कुरुक्षेत्र का युद्ध निश्चित हो चुका था। बर्बरीक ने युद्ध देखने और उसमें भाग लेने की इच्छा से प्रस्थान किया। मार्ग में उनकी भेंट ब्राह्मण वेशधारी श्रीकृष्ण से हुई। श्रीकृष्ण ने उनकी वीरता की परीक्षा लेने के लिए उनसे एक ही बाण से पीपल के वृक्ष के सारे पत्तों को छेदने को कहा। बर्बरीक ने ऐसा कर दिखाया, यहाँ तक कि श्रीकृष्ण के पैर के नीचे दबे पत्ते को भी बाण ने भेद दिया।

श्रीकृष्ण समझ गए कि यदि बर्बरीक युद्ध में उतरे, तो वे अपनी माता को दिए वचन (हारे का साथ देने) के कारण कौरवों की ओर से लड़ेंगे, जिससे पांडवों की पराजय निश्चित हो जाएगी। अतः धर्म की स्थापना के लिए श्रीकृष्ण ने दान में बर्बरीक का शीश मांग लिया। बर्बरीक ने सहर्ष अपना शीश दान कर दिया, परंतु युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की। श्रीकृष्ण ने उनके शीश को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया, जहाँ से उन्होंने पूरा युद्ध देखा। युद्ध के अंत में बर्बरीक ने निर्णय दिया कि यह युद्ध केवल श्रीकृष्ण की कूटनीति और सुदर्शन चक्र के कारण जीता गया है। इस निष्पक्षता और महान त्याग से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें कलयुग में पूजे जाने का वरदान दिया।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और लोक-संस्कृति से जुड़ी हुई खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें राजस्थानी और ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर सम्मिश्रण है। 'लखदातारी', 'शीश का दानी', 'बनवारी', 'मोरछड़ी' जैसे शब्द लोकमानस में रचे-बसे हैं।

काव्य शैली की दृष्टि से यह एक 'पद' या 'गीत' है जिसमें गेयता (गाए जाने की योग्यता) का गुण कूट-कूट कर भरा है। इसमें प्रयुक्त अनुप्रास अलंकार और करुण रस भक्त के हृदय को द्रवित कर देते हैं। 'सांवरे... सांवरे...' की पुनरावृत्ति भजन में एक दिव्य नाद और ध्यान की स्थिति उत्पन्न करती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें केवल पौराणिक कथा नहीं सुनाता, बल्कि हमारे व्यावहारिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

  • वचनबद्धता (Commitment): बर्बरीक ने अपनी माता को दिए वचन को निभाने के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की। यह हमें अपने कर्तव्यों और वचनों के प्रति निष्ठावान रहना सिखाता है।
  • अहंकार का त्याग: शीश का दान वास्तव में हमारे 'अहंकार' और 'ममत्व' के विसर्जन का प्रतीक है। जब तक मनुष्य अपने अहंकार का दान नहीं करता, तब तक उसे परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती।
  • निर्बलों की सहायता: 'हारे का सहारा' बनने का संदेश हमें समाज के वंचित, कमजोर और पीड़ित लोगों की मदद करने की प्रेरणा देता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
लखदातारी लाखों का दान देने वाला बाबा श्याम जो अपने भक्तों को बिना मांगे ही सब कुछ दे देते हैं।
शीश का दानी मस्तक का दान करने वाला वीर बर्बरीक जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपना सिर दान कर दिया।
बनवारी भगवान श्रीकृष्ण वन में विहार करने वाले आनंदकंद प्रभु।
मोरछड़ी मोर के पंखों से बनी झाड़ू बाबा श्याम का वह दिव्य अस्त्र जिससे वे भक्तों के कष्ट और रोग दूर करते हैं।
विपदा संकट या विपत्ति सांसारिक जीवन के कष्ट और मानसिक तनाव।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. "है जग में महिमा भारी लखदातारी की..."
इस संसार में उस महान दाता की महिमा अत्यंत विशाल है जो अपने भक्तों पर कृपा की वर्षा करता है। मैं बार-बार उस परम त्यागी शीश के दानी का यशगान करता हूँ।

2. "माता का वचन निभाए, हारे का साथ दिए..."
उन्होंने अपनी माता को दिया हुआ वचन निभाया कि वे हमेशा हारने वाले का साथ देंगे। इस धर्म संकट में भी वे तनिक भी नहीं घबराए और हंसते हुए अपने शीश का दान दे दिया।

3. "अद्भुत बलिदानी देख, चकित बनवारी जी..."
बर्बरीक के इस अद्वितीय और निस्वार्थ बलिदान को देखकर स्वयं चतुर सुजान भगवान श्रीकृष्ण भी आश्चर्यचकित रह गए और नतमस्तक हो गए।

4. "दर से जाए ना खाली, जगत कल्याण करे..."
जो भी याचक खाटू धाम की चौखट पर आता है, वह कभी खाली हाथ वापस नहीं जाता। बाबा श्याम संपूर्ण जगत का कल्याण करते हैं और श्रद्धापूर्वक ध्यान करने वालों के भंडार भर देते हैं।

5. "खाटू में विराजे बाबा, मोरछड़ी लहराए..."
राजस्थान के पावन खाटू धाम में बाबा श्याम साक्षात विराजमान हैं। वे अपनी दिव्य मोरछड़ी लहराकर भक्तों के सारे कष्टों और पापों को हर लेते हैं और पुकारते ही दौड़े चले आते हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

खाटू श्याम जी की आराधना करते समय इस भजन के साथ निम्नलिखित मंत्रों का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:

॥ ॐ श्री श्याम देवाय नमः ॥

महोत्कटाय वीराय, बर्बरीकाय नमः।
हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा॥

यह मंत्र साधक के जीवन में सुख, समृद्धि और मानसिक शांति लाता है। इसके अतिरिक्त, भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति के लिए भगवद गीता श्लोक का पाठ भी किया जा सकता है, जो हमें निष्काम कर्म की शिक्षा देता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम महिमा मेरे शीश के दानी की
मुख्य आराध्य भगवान खाटू श्याम जी (वीर बर्बरीक / श्रीकृष्ण)
भक्ति का भाव समर्पण, कृतज्ञता, करुणा और शरणागति भाव
मुख्य भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी (ब्रज और राजस्थानी पुट के साथ)
उपयुक्त अवसर एकादशी, फाल्गुन मेला, श्याम कीर्तन, दैनिक संध्या आरती
मुख्य संदेश त्याग, वचनबद्धता और दीन-दुखियों की सहायता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

महाभारत युद्ध के समय वीर बर्बरीक ने भगवान श्रीकृष्ण के मांगने पर बिना किसी संकोच के अपने मस्तक (शीश) का दान दे दिया था ताकि धर्म की रक्षा हो सके और पांडवों की विजय सुनिश्चित हो सके। इसी महान त्याग के कारण उन्हें 'शीश का दानी' कहा जाता है।

बर्बरीक ने अपनी माता को वचन दिया था कि वे युद्ध में हारने वाले पक्ष का साथ देंगे। आज के संदर्भ में, जब कोई व्यक्ति जीवन की परिस्थितियों से पूरी तरह हार जाता है और निराश हो जाता है, तब बाबा श्याम उसकी रक्षा करते हैं और उसे संबल प्रदान करते हैं।

वैसे तो इस भजन को प्रतिदिन गाया जा सकता है, परंतु हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी और द्वादशी तिथि को इस भजन का गायन अत्यंत फलदायी और शुभ माना जाता है।

मोरछड़ी को बाबा श्याम का आशीर्वाद रूपी यंत्र माना जाता है। मान्यता है कि मोरछड़ी के झाड़े से भक्तों के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्ट दूर हो जाते हैं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।

हाँ, इस भजन में निहित सकारात्मक शब्द और समर्पण का भाव घर के वातावरण को शुद्ध करते हैं। इसके नियमित श्रवण और गायन से पारिवारिक कलह दूर होती है और सुख-समृद्धि का आगमन होता है।

बाबा खाटू श्याम जी का मुख्य और विश्व प्रसिद्ध मंदिर भारत के राजस्थान राज्य के सीकर जिले के 'खाटू' नामक कस्बे में स्थित है। यहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन मास में विशाल मेला आयोजित होता है।

बर्बरीक के पास देवी जगदम्बा द्वारा दिए गए तीन ऐसे अमोघ बाण थे, जिनसे वे संपूर्ण ब्रह्मांड के शत्रुओं का विनाश कर सकते थे। पहला बाण शत्रुओं को चिह्नित करता था, दूसरा रक्षकों को और तीसरा बाण उन सभी का संहार कर वापस तरकश में आ जाता था।

यह भजन हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थिति क्यों न आए, हमें अपने धर्म, माता-पिता के प्रति कर्तव्य और सत्य के मार्ग से कभी विचलित नहीं होना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और उसकी व्याख्या को तैयार करने के लिए महाभारत के उद्योग पर्व, स्कंद पुराण के कौमारिका खंड और खाटू धाम की स्थानीय लोक-परंपराओं का गहन अध्ययन किया गया है। हमारी संपादकीय टीम ने यह सुनिश्चित किया है कि भजन के शब्द प्रामाणिक हों और उनका भावार्थ सनातन धर्म की मूल चेतना के अनुरूप हो। यह सामग्री पाठकों को न केवल भक्ति रस से सराबोर करेगी, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति के गौरवशाली इतिहास से भी परिचित कराएगी।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • महाभारत (वेदव्यास): बर्बरीक और श्रीकृष्ण के संवाद का पौराणिक संदर्भ।
  • स्कंद पुराण: कौमारिका खंड में बर्बरीक के जन्म, तपस्या और शीश दान की विस्तृत कथा।
  • श्री खाटू श्याम मंदिर ट्रस्ट (सीकर, राजस्थान): मंदिर की परंपराएं, आरती और कीर्तन पद्धति।
  • सनातन भक्ति परंपरा: कलयुग में नाम संकीर्तन का महत्व और प्रभाव।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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