बाल काण्ड अध्याय 4 | 25 श्लोक

महाकाव्य के गायन की ज़िम्मेदारी

बाल काण्ड का चतुर्थ सर्ग रामायण महाकाव्य के गायन और उसके प्रचार-प्रसार की अद्भुत कथा प्रस्तुत करता है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना के पश्चात् अपने शिष्यों लव और कुश को यह महाकाव्य सुनाया और उन्हें इसे गाने की जिम्मेदारी सौंपी। लव-कुश ने इस पवित्र काव्य को अयोध्या में तथा विभिन्न सभाओं में गाया, जिससे राम के चरित्र की महिमा सर्वत्र फैली।

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प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः। चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत्॥

“जब श्रीराम ने राज्य प्राप्त कर लिया, तब भगवान् ऋषि वाल्मीकि ने अद्भुत पदों और अर्थों से युक्त उनका सम्पूर्ण चरित रचा।”

अर्थ: यह श्लोक बताता है कि वाल्मीकि ने राम के राज्याभिषेक के बाद उनका सम्पूर्ण चरित रचा।

टिप्पणी: यह श्लोक इस बात का प्रमाण है कि वाल्मीकि ने राम के राज्याभिषेक के उपरांत ही उनका चरित लिखा। इसमें ""विचित्रपदमर्थवत्"" विशेषण महत्वपूर्ण है - यह काव्य के अद्भुत शब्दों और गहरे अर्थों की ओर संकेत करता है। वाल्मीकि ने रामकथा को केवल घटनाक्रम के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे ग्रंथ के रूप में रचा जो धर्म, नीति और करुणा का सागर है। इस श्लोक से ज्ञात होता है कि रामायण की रचना का समय राम के राज्यकाल में ही था, जब वाल्मीकि ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से घटनाओं को जाना।

चतुर्विंशत्सहस्राणि श्लोकानामुक्तवानृषिः। तथा सर्गशतान् पञ्च षट्काण्डानि तथोत्तरम्॥

“उस ऋषि ने चौबीस हजार श्लोक, पाँच सौ सर्ग और छः काण्ड तथा उत्तरकाण्ड (सातवाँ काण्ड) कहा।”

अर्थ: इस श्लोक में रामायण के विस्तार का वर्णन है: २४,००० श्लोक, ५०० सर्ग, ६ काण्ड और उत्तरकाण्ड।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण की संरचना का परिचय देता है। २४,००० श्लोकों की संख्या महत्वपूर्ण है – माना जाता है कि प्रत्येक अक्षर से एक हजार श्लोक प्रेरित हुए। पाँच सौ सर्ग और छः काण्ड (बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर, युद्ध) तथा सातवाँ उत्तरकाण्ड। यह संरचना बताती है कि वाल्मीकि ने अपने काव्य को अत्यंत व्यवस्थित रूप से रचा।

कृत्वा तु तन्महाप्राज्ञः सभविष्यं सहोत्तरम्। चिन्तयामास को न्वेतत् प्रयुञ्जीयादिति प्रभुः॥

“भविष्य (उत्तरकाण्ड) सहित इस ग्रंथ को रचकर वे महाप्राज्ञ प्रभु विचार करने लगे कि इसका प्रचार कौन करेगा।”

अर्थ: ग्रंथ रचना के बाद वाल्मीकि इसके प्रचारकर्ता को लेकर चिंतित हुए।

टिप्पणी: यह श्लोक वाल्मीकि के मनोभाव को दर्शाता है। महाकाव्य रचने के बाद भी वे इसके प्रचार-प्रसार के लिए उपयुक्त व्यक्ति की खोज में थे। 'सभविष्यं सहोत्तरम्' का अर्थ है उत्तरकाण्ड सहित, जिससे पता चलता है कि वाल्मीकि ने उत्तरकाण्ड को भी सम्मिलित किया था।

तस्य चिन्तयमानस्य महर्षेर्भावितात्मनः। अगृह्णीतां ततः पादौ मुनिवेषौ कुशीलवौ॥

“उस प्रसन्नचित्त महर्षि के इस प्रकार विचार करते ही, मुनि के वेष में कुश और लव ने आकर उनके चरण पकड़ लिए।”

अर्थ: वाल्मीकि के विचार करते ही कुश और लव मुनिवेश में आकर उनके चरणों में गिरे।

टिप्पणी: यह श्लोक कुश और लव के प्रथम आगमन का वर्णन करता है। वे मुनि के वेष में थे, यानी साधारण वस्त्र धारण किए थे, फिर भी राजपुत्र थे। उन्होंने वाल्मीकि के चरण पकड़े – यह शिष्यत्व की स्वीकृति का प्रतीक है।

कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ। भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ॥

“(वाल्मीकि ने) धर्मज्ञ, यशस्वी, सुन्दर स्वर से युक्त, आश्रमवासी उन दोनों राजपुत्र भाइयों (कुश और लव) को देखा।”

अर्थ: वाल्मीकि ने कुश-लव के गुणों का वर्णन किया: धर्मज्ञ, यशस्वी, मधुर स्वर वाले।

टिप्पणी: यह श्लोक कुश और लव के व्यक्तित्व का चित्रण करता है। वे धर्म के ज्ञाता, यशस्वी, मधुर कंठ के धनी और आश्रमवासी थे। ये गुण उन्हें रामकथा के गायन के लिए सर्वथा उपयुक्त बनाते हैं।

स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ। वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः॥

“उन्हें बुद्धिमान और वेदों में पारंगत देखकर प्रभु (वाल्मीकि) ने वेदों के अर्थ के विस्तार के लिए उन दोनों को (यह काव्य) ग्रहण कराया।”

अर्थ: वाल्मीकि ने कुश-लव को वेदों के अर्थ के विस्तार के लिए रामायण का उपदेश दिया।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के उद्देश्य को स्पष्ट करता है – यह वेदों के अर्थ का विस्तार है। वाल्मीकि ने कुश-लव को केवल काव्य नहीं, बल्कि वेदों की व्याख्या के रूप में यह ग्रंथ सिखाया।

काव्यं रामायणं कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत्। पौलस्त्यवधमित्येवं चकार चरितव्रतः॥

“व्रतनिष्ठ ऋषि ने इस सम्पूर्ण काव्य को 'रामायण', 'सीताजी का महान चरित' और 'पौलस्त्य (रावण) का वध' – इन नामों से रचा।”

अर्थ: वाल्मीकि ने रामायण को तीन नाम दिए: रामायण, सीताचरित, पौलस्त्यवध।

टिप्पणी: यह श्लोक बताता है कि रामायण के तीन प्रमुख नाम हैं, जो इसके तीन मुख्य विषयों को उजागर करते हैं: राम का चरित, सीता का जीवन, और रावण का वध।

पाठ्ये गेये च मधुरं प्रमाणैस्त्रिभिरन्वितम्। जातिभिः सप्तभिर्बद्धं तन्त्रीलयसमन्वितम्॥

“यह काव्य पढ़ने और गाने में मधुर है, तीन प्रमाणों (गति- द्रुत, मध्य, विलम्बित) से युक्त है, सात स्वरों (षड्ज आदि) से बद्ध है तथा वीणा और ताल के साथ समन्वित है।”

अर्थ: रामायण के गायन की संगीतात्मक विशेषताएँ: तीन लय, सात स्वर, वीणा और ताल।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण के गायन शैली का वर्णन करता है। यह केवल पाठ्य नहीं, गेय भी है। तीन प्रमाण – द्रुत, मध्य, विलम्बित लय। सात स्वर – षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद। तन्त्री – वीणा और लय – ताल के साथ गाया जाता था।

रसैः शृङ्गारकारुण्यहास्यवीरभयानकैः। रौद्रादिभिश्च संयुक्तं काव्यमेतदगायताम्॥

“शृंगार, करुण, हास्य, वीर, भयानक, रौद्र आदि रसों से युक्त इस काव्य को उन दोनों ने गाया।”

अर्थ: रामायण में अनेक रसों का समावेश है, जिन्हें कुश-लव ने गाया।

टिप्पणी: यह श्लोक रामायण में निहित रसों की सूची देता है: शृंगार (राम-सीता का प्रेम), करुण (सीता हरण, राम का विलाप), हास्य (हास्य प्रसंग), वीर (युद्ध), भयानक (राक्षसों का भय), रौद्र (राम का क्रोध)।

श्लोक 10

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तौ तु गान्धर्वतत्त्वज्ञौ मूर्छनास्थानकोविदौ। भ्रातरौ सर्वसम्पन्नौ गन्धर्वाविव रूपिणौ॥

“वे दोनों भाई गान्धर्व (संगीत) के तत्त्वज्ञ, मूर्छना और स्थान के कोविद तथा रूप में गन्धर्वों के समान सम्पन्न थे।”

अर्थ: कुश-लव की संगीत में निपुणता और रूप-सौन्दर्य का वर्णन।

टिप्पणी: यह श्लोक कुश-लव की संगीत कला का बखान करता है। वे गान्धर्व (संगीत शास्त्र) के ज्ञाता थे, मूर्छनाओं (स्वरों की आरोह-अवरोह पद्धति) और स्थानों (गाने के आधार स्थान) में प्रवीण थे, और रूप में गन्धर्वों के समान सुन्दर थे।

श्लोक 11

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रूपलक्षणसम्पन्नौ मधुरस्वरभाषिणौ। बिम्बादिवोद्धृतौ बिम्बौ रामदेहात्तथापरौ॥

“वे रूप और लक्षणों से सम्पन्न तथा मधुर स्वर में बोलने वाले थे। जैसे बिम्ब से प्रतिबिम्ब उद्धृत होता है, वैसे ही ये दोनों राम के शरीर से उद्धृत (प्रकट) दूसरे प्रतिबिम्ब के समान थे।”

अर्थ: वे रूप और लक्षणों से सम्पन्न तथा मधुर स्वर में बोलने वाले थे। जैसे बिम्ब से प्रतिबिम्ब उद्धृत होता है, वैसे ही ये दोनों राम के शरीर से उद्धृत (प्रकट) दूसरे प्रतिबिम्ब के समान थे।

टिप्पणी: यह श्लोक कुश-लव की शारीरिक एवं आध्यात्मिक समानता को राम के साथ दर्शाता है। वे केवल पुत्र नहीं, बल्कि राम के गुणों के प्रत्यक्ष प्रतिबिम्ब थे। "बिम्ब-प्रतिबिम्ब" का उपमान अद्वैत भाव को व्यक्त करता है।

श्लोक 12

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तौ राजपुत्रौ कार्त्स्न्येन धर्म्यमाख्यानमुत्तमम्। वचोविधेयं तत्सर्वं कृत्वा काव्यमनिन्दितौ॥

“उन अनिन्दनीय राजपुत्रों ने सम्पूर्ण रूप से उस उत्तम धर्म्य आख्यान को और वचनों की विधेयता (गायन विधान) को सीखकर उस काव्य को (गाने योग्य बना लिया)।”

अर्थ: उन अनिन्दनीय राजपुत्रों ने सम्पूर्ण रूप से उस उत्तम धर्म्य आख्यान को और वचनों की विधेयता (गायन विधान) को सीखकर उस काव्य को (गाने योग्य बना लिया)।

टिप्पणी: यह श्लोक बताता है कि कुश-लव ने केवल कथा को याद नहीं किया, बल्कि गायन की कला (वचोविधेय) को भी सीखा और उसे एक गेय काव्य के रूप में प्रस्तुत किया।

श्लोक 13

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ऋषीणां च द्विजातीनां साधूनां च समागमे। यथोपदेशं तत्त्वज्ञौ जगतुस्तौ समाहितौ॥

“ऋषियों, द्विजों और साधुओं के समागम में उन तत्त्वज्ञों ने यथोपदेश (जैसा सिखाया गया था) एकाग्रचित्त होकर गाया।”

अर्थ: ऋषियों, द्विजों और साधुओं के समागम में उन तत्त्वज्ञों ने यथोपदेश (जैसा सिखाया गया था) एकाग्रचित्त होकर गाया।

टिप्पणी: यह श्लोक पहली बार गायन के श्रोताओं का परिचय देता है – ऋषि, द्विज और साधु। कुश-लव का समाहित (एकाग्र) होकर गाना उनकी साधना को दर्शाता है।

श्लोक 14

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महात्मनौ महाभागौ सर्वलक्षणलक्षितौ। तौ कदाचित्समेतानामृषीणां भावितात्मनाम्॥

“एक बार वे महात्मा, महाभाग और सर्वलक्षणों से युक्त दोनों भाई, एकत्रित हुए भावितात्मा (शुद्ध अन्तःकरण) ऋषियों के बीच...”

अर्थ: एक बार वे महात्मा, महाभाग और सर्वलक्षणों से युक्त दोनों भाई, एकत्रित हुए भावितात्मा (शुद्ध अन्तःकरण) ऋषियों के बीच...

टिप्पणी: यह श्लोक कुश-लव के व्यक्तित्व का गुणगान करता है – महात्मा, महाभाग और लक्षणसम्पन्न। साथ ही श्रोता ऋषियों की पवित्रता (भावितात्मनाम्) पर प्रकाश डालता है।

श्लोक 15

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असीनां ब्रह्मर्षिसभे परं विस्मयमागताः। ततः समीपस्थौ ताविदं काव्यमगायताम्॥

“...ब्रह्मर्षियों की सभा में उपस्थित थे। तब उनके समीप बैठकर उन दोनों ने इस काव्य को गाया, जिसे सुनकर सभी परम विस्मय को प्राप्त हुए।”

अर्थ: ...ब्रह्मर्षियों की सभा में उपस्थित थे। तब उनके समीप बैठकर उन दोनों ने इस काव्य को गाया, जिसे सुनकर सभी परम विस्मय को प्राप्त हुए।

टिप्पणी: यह श्लोक गायन के प्रभाव को दर्शाता है – सुनने वाले ऋषि भी विस्मय में आ गये। यह कुश-लव की कला की सर्वोच्च सफलता है।

श्लोक 16

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तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे बाष्पपर्याकुलेक्षणाः। साधु साध्विति तावूचुः परं विस्मयमागताः॥

“उसे सुनकर सभी मुनियों के नेत्र आनन्दाश्रुओं से व्याकुल हो गए और वे परम विस्मय में आकर उन दोनों से "साधु, साधु" कहने लगे।”

अर्थ: उसे सुनकर सभी मुनियों के नेत्र आनन्दाश्रुओं से व्याकुल हो गए और वे परम विस्मय में आकर उन दोनों से "साधु, साधु" कहने लगे।

टिप्पणी: यह श्लोक गायन के प्रति श्रोताओं की हार्दिक प्रतिक्रिया दर्शाता है। आनन्द के आँसू और "साधु साधु" का उद्घोष कला की सार्थकता है।

श्लोक 17

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ते प्रीतमनसः सर्वे मुनयो धर्मवत्सलाः। प्रशशंसुः प्रशस्तव्यौ गायमानौ कुशीलवौ॥

“वे सभी धर्मवत्सल मुनि प्रसन्न मन से गाने वाले कुश और लव की प्रशंसा करने लगे।”

अर्थ: वे सभी धर्मवत्सल मुनि प्रसन्न मन से गाने वाले कुश और लव की प्रशंसा करने लगे।

टिप्पणी: यह श्लोक पिछले श्लोक की निरंतरता है – मुनि अब औपचारिक रूप से प्रशंसा करते हैं। "प्रशस्तव्यौ" बताता है कि वे प्रशंसा के पात्र थे।

श्लोक 18

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अहो गीतस्य माधुर्यं श्लोकानां च विशेषतः। चिरनिर्वृत्तमप्येतत्प्रत्यक्षमिव दर्शितम्॥

“(मुनि बोले) अहो! गीत का माधुर्य और विशेष रूप से श्लोकों का माधुर्य! बहुत पहले बीत चुकी यह घटना भी प्रत्यक्ष की भाँति दिखाई गई।”

अर्थ: (मुनि बोले) अहो! गीत का माधुर्य और विशेष रूप से श्लोकों का माधुर्य! बहुत पहले बीत चुकी यह घटना भी प्रत्यक्ष की भाँति दिखाई गई।

टिप्पणी: यह श्लोक गायन की उस शक्ति को रेखांकित करता है जो अतीत की घटनाओं को जीवन्त कर देती है। यह कला की सार्थकता है।

श्लोक 19

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प्रविश्य तावुभौ सुष्ठु भावं सम्यगगायताम्। सहितौ मधुरं रक्तं सम्पन्नं सर्वसम्पदा॥

“भाव में प्रवेश करके उन दोनों ने साथ-साथ बहुत अच्छी तरह से, मधुर, रसयुक्त और सर्वसम्पदा से सम्पन्न गान किया।”

अर्थ: भाव में प्रवेश करके उन दोनों ने साथ-साथ बहुत अच्छी तरह से, मधुर, रसयुक्त और सर्वसम्पदा से सम्पन्न गान किया।

टिप्पणी: यह श्लोक गायन की गुणवत्ता का वर्णन करता है – भाव, माधुर्य, रस और सम्पूर्णता। यह एक आदर्श प्रस्तुति के लक्षण हैं।

श्लोक 20

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एवं प्रशस्यमानौ तु तपःश्लाघ्यैर्महात्मभिः। संरक्ततरमत्यर्थं मधुरं तावगायताम्॥

“इस प्रकार तप से प्रशंसनीय महात्माओं द्वारा प्रशंसित होते हुए उन दोनों ने अत्यन्त अनुरक्त होकर और भी अधिक मधुर गाया।”

अर्थ: इस प्रकार तप से प्रशंसनीय महात्माओं द्वारा प्रशंसित होते हुए उन दोनों ने अत्यन्त अनुरक्त होकर और भी अधिक मधुर गाया।

टिप्पणी: यह श्लोक दर्शाता है कि प्रशंसा कलाकार को और उत्साहित करती है। कुश-लव की प्रतिभा प्रशंसा से और निखर गई।