महाकाव्य के गायन की ज़िम्मेदारी – श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
ते प्रीतमनसः सर्वे मुनयो धर्मवत्सलाः। प्रशशंसुः प्रशस्तव्यौ गायमानौ कुशीलवौ॥
हिंदी अनुवाद
वे सभी धर्मवत्सल मुनि प्रसन्न मन से गाने वाले कुश और लव की प्रशंसा करने लगे।
अर्थ / व्याख्या
वे सभी धर्मवत्सल मुनि प्रसन्न मन से गाने वाले कुश और लव की प्रशंसा करने लगे।
टिप्पणी
यह श्लोक पिछले श्लोक की निरंतरता है – मुनि अब औपचारिक रूप से प्रशंसा करते हैं। "प्रशस्तव्यौ" बताता है कि वे प्रशंसा के पात्र थे।
॥ श्लोक १७ – मुनियों द्वारा औपचारिक प्रशंसा ॥
प्रशशंसुः प्रशस्तव्यौ गायमानौ कुशीलवौ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : वे सभी धर्मवत्सल मुनि प्रसन्न मन से गाने वाले कुश और लव की प्रशंसा करने लगे।
🔹 English Translation : All those sages, affectionate to dharma, with pleased minds, praised the singing Kusha and Lava who were worthy of praise.
🔍 शब्दार्थ तालिका
... (as above) ...📜 प्रशंसा का औचित्य
"प्रशस्तव्यौ" का अर्थ है जो प्रशंसा के योग्य हों। मुनि यहाँ यह प्रमाणित कर रहे हैं कि कुश-लव की कला वास्तव में स्तुत्य है। "धर्मवत्सलाः" विशेषण मुनियों के लिए प्रयुक्त है – धर्म से प्रेम करने वाले। ऐसे लोग किसी की भी प्रशंसा व्यर्थ नहीं करते।
यहाँ "गायमानौ" वर्तमान कालिक कृदन्त है, जो दर्शाता है कि वे उसी समय गा रहे थे और मुनि प्रशंसा कर रहे थे। यह एक जीवन्त दृश्य प्रस्तुत करता है।
🎤 कुशीलव नाम की व्युत्पत्ति
इस श्लोक में पहली बार "कुशीलवौ" शब्द आया है। कुश और लव दोनों का सम्मिलित नाम। यही नाम आगे चलकर "कुशीलव" के रूप में गायक-वाचकों के लिए प्रचलित हुआ।
॥ जय श्री राम ॥