संस्कृत श्लोक

तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे बाष्पपर्याकुलेक्षणाः। साधु साध्विति तावूचुः परं विस्मयमागताः॥

हिंदी अनुवाद

उसे सुनकर सभी मुनियों के नेत्र आनन्दाश्रुओं से व्याकुल हो गए और वे परम विस्मय में आकर उन दोनों से "साधु, साधु" कहने लगे।

अर्थ / व्याख्या

उसे सुनकर सभी मुनियों के नेत्र आनन्दाश्रुओं से व्याकुल हो गए और वे परम विस्मय में आकर उन दोनों से "साधु, साधु" कहने लगे।

टिप्पणी

यह श्लोक गायन के प्रति श्रोताओं की हार्दिक प्रतिक्रिया दर्शाता है। आनन्द के आँसू और "साधु साधु" का उद्घोष कला की सार्थकता है।

॥ श्लोक १६ – आनन्दाश्रु और साधु-साधु ॥

तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे बाष्पपर्याकुलेक्षणाः।
साधु साध्विति तावूचुः परं विस्मयमागताः॥
tac chrutvā munayaḥ sarve bāṣpaparyākulekṣaṇāḥ | sādhu sādhv iti tāv ūcuḥ paraṃ vismayamāgatāḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उसे सुनकर सभी मुनियों के नेत्र आनन्दाश्रुओं से व्याकुल हो गए और वे परम विस्मय में आकर उन दोनों से "साधु, साधु" कहने लगे।

🔹 English Translation : Hearing that, all the sages had their eyes filled with tears of joy, and filled with great wonder, they said to them "Bravo! Bravo!"

🔍 शब्दार्थ तालिका

... (as above) ...

📜 श्रोता की हार्दिक प्रतिक्रिया

यह श्लोक कुश-लव के गायन की सफलता का चरम बिन्दु है। मुनि लोग तपस्या द्वारा जितेन्द्रिय होते हैं, उनके नेत्र सामान्यतः स्थिर रहते हैं। किन्तु यहाँ वे "बाष्पपर्याकुलेक्षणाः" हो गए – आँसुओं से व्याकुल। यह अत्यधिक भावुकता का प्रतीक है, जो करुण रस के उद्रेक से उत्पन्न हुई।

"साधु साधु" दो बार कहना अत्यन्त प्रशंसा का सूचक है। यह आज भी भारतीय संस्कृति में किसी उत्कृष्ट प्रस्तुति की सराहना का पारम्परिक ढंग है।

🧘 भाव-विभोर मुनि

यहाँ "विस्मय" का अर्थ केवल आश्चर्य नहीं, बल्कि चमत्कार का भाव है। मुनियों को लगा कि वे स्वयं उस घटना के साक्षी हैं जिसका वर्णन हो रहा है। यह कुश-लव की गायन-शैली की यथार्थता और जीवन्तता को दर्शाता है।

✨ विशेष: "बाष्प" शब्द का प्रयोग यहाँ हर्ष के आँसुओं के लिए हुआ है। सामान्यतः शोक में भी आँसू आते हैं, पर यहाँ आनन्द के आँसू हैं, जो उत्कृष्ट कला के दर्शकों में उत्पन्न होते हैं।

॥ जय श्री राम ॥