महाकाव्य के गायन की ज़िम्मेदारी – श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
असीनां ब्रह्मर्षिसभे परं विस्मयमागताः। ततः समीपस्थौ ताविदं काव्यमगायताम्॥
हिंदी अनुवाद
...ब्रह्मर्षियों की सभा में उपस्थित थे। तब उनके समीप बैठकर उन दोनों ने इस काव्य को गाया, जिसे सुनकर सभी परम विस्मय को प्राप्त हुए।
अर्थ / व्याख्या
...ब्रह्मर्षियों की सभा में उपस्थित थे। तब उनके समीप बैठकर उन दोनों ने इस काव्य को गाया, जिसे सुनकर सभी परम विस्मय को प्राप्त हुए।
टिप्पणी
यह श्लोक गायन के प्रभाव को दर्शाता है – सुनने वाले ऋषि भी विस्मय में आ गये। यह कुश-लव की कला की सर्वोच्च सफलता है।
॥ श्लोक १५ – गायन से ऋषियों का विस्मय ॥
ततः समीपस्थौ ताविदं काव्यमगायताम्॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : ...ब्रह्मर्षियों की सभा में उपस्थित थे। तब उनके समीप बैठकर उन दोनों ने इस काव्य को गाया, जिसे सुनकर सभी परम विस्मय को प्राप्त हुए।
🔹 English Translation : ...they were seated in the assembly of Brahmarshis. Then, sitting near them, those two sang this poem, and (the sages) were filled with great wonder.
🔍 शब्दार्थ तालिका
... (as above) ...📜 गायन का प्रभाव: ऋषियों का विस्मय
ब्रह्मर्षि वे ऋषि होते हैं जो ब्रह्म (परमात्मा) का साक्षात्कार कर चुके हैं। उनके लिए सांसारिक किसी भी वस्तु में आश्चर्य नहीं होता। किन्तु कुश-लव के गायन ने उन्हें भी "परं विस्मय" – परम आश्चर्य से भर दिया। इसका अर्थ है कि गायन अलौकिक था, मानो साक्षात् ब्रह्म का गान हो।
"इदं काव्यम्" – यह काव्य, अर्थात् रामायण। कुश-लव ने उसे यथावत् प्रस्तुत किया। "समीपस्थौ" कहना यह दर्शाता है कि वे ऋषियों के निकट बैठकर गा रहे थे – यह आत्मीयता और सान्निध्य का भाव है।
🌟 कला की सर्वोच्च उपलब्धि
किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़ी प्रशंसा यही है कि उसकी कला से ज्ञानीजन भी विस्मित हो जाएँ। यहाँ ऋषियों का विस्मय कुश-लव की सिद्धि को प्रमाणित करता है। साथ ही, यह भी संकेत है कि रामायण केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक दिव्य अनुभव है।
॥ जय श्री राम ॥