महाकाव्य के गायन की ज़िम्मेदारी – श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
प्रविश्य तावुभौ सुष्ठु भावं सम्यगगायताम्। सहितौ मधुरं रक्तं सम्पन्नं सर्वसम्पदा॥
हिंदी अनुवाद
भाव में प्रवेश करके उन दोनों ने साथ-साथ बहुत अच्छी तरह से, मधुर, रसयुक्त और सर्वसम्पदा से सम्पन्न गान किया।
अर्थ / व्याख्या
भाव में प्रवेश करके उन दोनों ने साथ-साथ बहुत अच्छी तरह से, मधुर, रसयुक्त और सर्वसम्पदा से सम्पन्न गान किया।
टिप्पणी
यह श्लोक गायन की गुणवत्ता का वर्णन करता है – भाव, माधुर्य, रस और सम्पूर्णता। यह एक आदर्श प्रस्तुति के लक्षण हैं।
॥ श्लोक १९ – भाव-विभोर गायन ॥
सहितौ मधुरं रक्तं सम्पन्नं सर्वसम्पदा॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : भाव में प्रवेश करके उन दोनों ने साथ-साथ बहुत अच्छी तरह से, मधुर, रसयुक्त और सर्वसम्पदा से सम्पन्न गान किया।
🔹 English Translation : Entering into the mood, both of them together sang very well, sweetly, with feeling, and endowed with all excellences.
🔍 शब्दार्थ तालिका
... (as above) ...📜 भाव-प्रवेश: कला की आत्मा
"प्रविश्य भावम्" – भाव में प्रवेश करना, अर्थात् केवल बाहरी गायन नहीं, बल्कि आन्तरिक रूप से उसी भाव को अनुभव करना। कुश-लव ने राम के चरित्र को इतना आत्मसात कर लिया था कि वे गाते समय स्वयं को उसी लोक में पाते थे।
"सहितौ" – दोनों ने मिलकर गाया, जो सामूहिक गायन की उत्कृष्टता को दर्शाता है। उनका ताल-मेल और स्वर-संगति अद्भुत थी।
🎼 गायन के चार गुण
इस श्लोक में गायन के चार विशेषण दिए गए हैं – मधुरम् (स्वरों की मिठास), रक्तम् (रस से ओत-प्रोत), सम्पन्नम् (सभी कलाओं से युक्त), और सर्वसम्पदा (समग्र सम्पत्ति – अर्थ, भाव, अलंकार आदि)। ये चारों मिलकर उत्तम गायन की परिभाषा गढ़ते हैं।
॥ जय श्री राम ॥