महाकाव्य के गायन की ज़िम्मेदारी – श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ। वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः॥
हिंदी अनुवाद
उन्हें बुद्धिमान और वेदों में पारंगत देखकर प्रभु (वाल्मीकि) ने वेदों के अर्थ के विस्तार के लिए उन दोनों को (यह काव्य) ग्रहण कराया।
अर्थ / व्याख्या
वाल्मीकि ने कुश-लव को वेदों के अर्थ के विस्तार के लिए रामायण का उपदेश दिया।
टिप्पणी
यह श्लोक रामायण के उद्देश्य को स्पष्ट करता है – यह वेदों के अर्थ का विस्तार है। वाल्मीकि ने कुश-लव को केवल काव्य नहीं, बल्कि वेदों की व्याख्या के रूप में यह ग्रंथ सिखाया।
॥ श्री वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ४ – श्लोक ६ ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : उन्हें बुद्धिमान और वेदों में पारंगत देखकर प्रभु (वाल्मीकि) ने वेदों के अर्थ के विस्तार के लिए उन दोनों को (यह काव्य) ग्रहण कराया।
🔹 English Translation : Seeing them to be intelligent and proficient in the Vedas, the lord (Valmiki) made them learn (this epic) for the purpose of elaborating the meaning of the Vedas.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| सः | प्रथमा एकवचन | वह |
| तु | अव्यय | तो |
| मेधाविनौ | द्वितीया द्विवचन | बुद्धिमान दोनों को |
| दृष्ट्वा | क्त्वा | देखकर |
| वेदेषु | सप्तमी बहुवचन | वेदों में |
| परिनिष्ठितौ | द्वितीया द्विवचन | पारंगत |
| वेदोपबृंहणार्थाय | चतुर्थी एकवचन | वेदों के विस्तार के लिए |
| तौ | द्वितीया द्विवचन | उनको |
| अग्राहयत | लङ्, प्रेरणार्थक | सिखाया |
| प्रभुः | प्रथमा एकवचन | प्रभु |
📜 रामायण : वेदों का विस्तार
यहाँ रामायण को वेदों का ""उपबृंहण"" (विस्तार) कहा गया है। वेदों के कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड को रामायण ने आख्यान के माध्यम से सरल और रोचक बना दिया। कुश-लव पहले से ही वेदों में निष्णात थे, अतः वे रामायण के गूढ़ अर्थों को समझ सकते थे और उन्हें जनता तक पहुँचा सकते थे।