महाकाव्य के गायन की ज़िम्मेदारी – श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
कृत्वा तु तन्महाप्राज्ञः सभविष्यं सहोत्तरम्। चिन्तयामास को न्वेतत् प्रयुञ्जीयादिति प्रभुः॥
हिंदी अनुवाद
भविष्य (उत्तरकाण्ड) सहित इस ग्रंथ को रचकर वे महाप्राज्ञ प्रभु विचार करने लगे कि इसका प्रचार कौन करेगा।
अर्थ / व्याख्या
ग्रंथ रचना के बाद वाल्मीकि इसके प्रचारकर्ता को लेकर चिंतित हुए।
टिप्पणी
यह श्लोक वाल्मीकि के मनोभाव को दर्शाता है। महाकाव्य रचने के बाद भी वे इसके प्रचार-प्रसार के लिए उपयुक्त व्यक्ति की खोज में थे। 'सभविष्यं सहोत्तरम्' का अर्थ है उत्तरकाण्ड सहित, जिससे पता चलता है कि वाल्मीकि ने उत्तरकाण्ड को भी सम्मिलित किया था।
॥ श्री वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ४ – श्लोक ३ ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : भविष्य (उत्तरकाण्ड) सहित इस ग्रंथ को रचकर वे महाप्राज्ञ प्रभु विचार करने लगे कि इसका प्रचार कौन करेगा।
🔹 English Translation : Having composed this scripture along with the future (Uttara Kanda), that highly wise lord (Valmiki) began to think: who indeed will propagate this?
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| कृत्वा | क्त्वा प्रत्यय | करके |
| तु | अव्यय | फिर |
| तत् | सर्वनाम | उसको |
| महाप्राज्ञः | विशेषण | महाबुद्धिमान |
| सभविष्यम् | विशेषण | भविष्य (उत्तरकाण्ड) सहित |
| सहोत्तरम् | विशेषण | उत्तरकाण्ड सहित |
| चिन्तयामास | क्रिया | विचार किया |
| कः | सर्वनाम | कौन |
| नु | अव्यय | ही |
| एतत् | सर्वनाम | इसको |
| प्रयुञ्जीयात् | क्रिया, विधिलिङ् | प्रचारित करे |
| इति | अव्यय | इस प्रकार |
| प्रभुः | संज्ञा | स्वामी |
📜 वाल्मीकि की चिंता
महाकाव्य की रचना के बाद वाल्मीकि यह सोचते हैं कि इसे जन-जन तक पहुँचाने के लिए कोई सक्षम प्रचारक चाहिए। यह चिंता एक कवि की स्वाभाविक चिंता है – उसकी रचना यदि पढ़ी न जाए तो वह निष्प्राण है। वाल्मीकि चाहते थे कि उनका काव्य गाया जाए, सुना जाए और समाज में व्याप्त हो। इसी चिंता का समाधान अगले श्लोकों में कुश-लव के रूप में आता है।
यहाँ ""सभविष्यं सहोत्तरम्"" से स्पष्ट है कि वाल्मीकि ने उत्तरकाण्ड को भी उसी समय रचा था, न कि बाद में जोड़ा गया।