महाकाव्य के गायन की ज़िम्मेदारी – श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
तस्य चिन्तयमानस्य महर्षेर्भावितात्मनः। अगृह्णीतां ततः पादौ मुनिवेषौ कुशीलवौ॥
हिंदी अनुवाद
उस प्रसन्नचित्त महर्षि के इस प्रकार विचार करते ही, मुनि के वेष में कुश और लव ने आकर उनके चरण पकड़ लिए।
अर्थ / व्याख्या
वाल्मीकि के विचार करते ही कुश और लव मुनिवेश में आकर उनके चरणों में गिरे।
टिप्पणी
यह श्लोक कुश और लव के प्रथम आगमन का वर्णन करता है। वे मुनि के वेष में थे, यानी साधारण वस्त्र धारण किए थे, फिर भी राजपुत्र थे। उन्होंने वाल्मीकि के चरण पकड़े – यह शिष्यत्व की स्वीकृति का प्रतीक है।
॥ श्री वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ४ – श्लोक ४ ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : उस प्रसन्नचित्त महर्षि के इस प्रकार विचार करते ही, मुनि के वेष में कुश और लव ने आकर उनके चरण पकड़ लिए।
🔹 English Translation : While that great sage with a purified mind was thus thinking, then two persons dressed as sages, Kusha and Lava, grasped his feet.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| तस्य | सर्वनाम, षष्ठी | उसके |
| चिन्तयमानस्य | कृदन्त, षष्ठी | विचार करते हुए |
| महर्षेः | संज्ञा, षष्ठी | महर्षि के |
| भावितात्मनः | विशेषण, षष्ठी | शुद्ध आत्मा वाले |
| अगृह्णीताम् | क्रिया, लङ्, द्विवचन | दोनों ने पकड़ा |
| ततः | अव्यय | तब |
| पादौ | संज्ञा, द्वितीया द्विवचन | दोनों पैर |
| मुनिवेषौ | विशेषण, प्रथमा द्विवचन | मुनि के वेष वाले |
| कुशीलवौ | संज्ञा, प्रथमा द्विवचन | कुश-लव |
📜 कुश-लव का आगमन
जिस समय वाल्मीकि यह सोच रहे थे कि उनके काव्य का प्रचार कौन करेगा, उसी सम्यक् क्षण पर कुश और लव प्रकट होते हैं। यह संयोग नहीं, बल्कि ईश्वरीय योजना है। वाल्मीकि ने उन्हें पहले भी देखा होगा, पर अब वे शिष्य बनने के लिए उपस्थित हुए। मुनिवेष में होना यह दर्शाता है कि वे सांसारिक राजपुत्र होते हुए भी साधु जैसा जीवन जी रहे थे। चरण पकड़ना गुरु-शिष्य परंपरा की आधारशिला है।