संस्कृत श्लोक

चतुर्विंशत्सहस्राणि श्लोकानामुक्तवानृषिः। तथा सर्गशतान् पञ्च षट्काण्डानि तथोत्तरम्॥

हिंदी अनुवाद

उस ऋषि ने चौबीस हजार श्लोक, पाँच सौ सर्ग और छः काण्ड तथा उत्तरकाण्ड (सातवाँ काण्ड) कहा।

अर्थ / व्याख्या

इस श्लोक में रामायण के विस्तार का वर्णन है: २४,००० श्लोक, ५०० सर्ग, ६ काण्ड और उत्तरकाण्ड।

टिप्पणी

यह श्लोक रामायण की संरचना का परिचय देता है। २४,००० श्लोकों की संख्या महत्वपूर्ण है – माना जाता है कि प्रत्येक अक्षर से एक हजार श्लोक प्रेरित हुए। पाँच सौ सर्ग और छः काण्ड (बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर, युद्ध) तथा सातवाँ उत्तरकाण्ड। यह संरचना बताती है कि वाल्मीकि ने अपने काव्य को अत्यंत व्यवस्थित रूप से रचा।

॥ श्री वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ४ – श्लोक २ ॥

चतुर्विंशत्सहस्राणि श्लोकानामुक्तवानृषिः। तथा सर्गशतान् पञ्च षट्काण्डानि तथोत्तरम्॥
caturviṃśatsahasrāṇi ślokānāmuktavānṛṣiḥ | tathā sargaśatān pañca ṣaṭkāṇḍāni tathottaram ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उस ऋषि ने चौबीस हजार श्लोक, पाँच सौ सर्ग और छः काण्ड तथा उत्तरकाण्ड (सातवाँ काण्ड) कहा।

🔹 English Translation : That sage spoke twenty-four thousand verses, five hundred chapters, and six sections (Kandas) along with the Uttara Kanda (the seventh).

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
चतुर्विंशत्संख्यावाचकचौबीस
सहस्राणिनपुंसकलिंग, द्वितीया बहुवचनहजार
श्लोकानाम्पुल्लिंग, षष्ठी बहुवचनश्लोकों के
उक्तवान्प्रथमपुरुष एकवचन, क्वसुबोला
ऋषिःपुल्लिंग, प्रथमाऋषि
तथाअव्ययइस प्रकार
सर्गशतान्पुल्लिंग, द्वितीया बहुवचनसौ-सौ सर्ग
पञ्चसंख्यापाँच
षट्काण्डानिनपुंसक, द्वितीया बहुवचनछः काण्ड
तथाअव्ययऔर
उत्तरम्नपुंसक, द्वितीया एकवचनउत्तरकाण्ड

📜 रामायण की संरचना

यह श्लोक रामायण की मात्रात्मक संरचना प्रस्तुत करता है। २४,००० श्लोकों की संख्या ब्रह्मा द्वारा वाल्मीकि को दिए गए आदेश से जुड़ी है – उन्होंने प्रत्येक अक्षर से एक हजार श्लोक रचने की प्रेरणा दी थी। पाँच सौ सर्गों में विभाजित यह महाकाव्य छः काण्डों (बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर, युद्ध) में बँटा है और सातवें उत्तरकाण्ड के साथ पूर्ण होता है। यह विभाजन आज भी उपलब्ध रामायण से मेल खाता है, हालाँकि कुछ विद्वान उत्तरकाण्ड को बाद में जोड़ा हुआ मानते हैं।

इस श्लोक से यह भी ज्ञात होता है कि वाल्मीकि ने अपनी रचना को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया था, जो एक महाकाव्य की पहचान है।