संस्कृत श्लोक

प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः। चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत्॥

हिंदी अनुवाद

जब श्रीराम ने राज्य प्राप्त कर लिया, तब भगवान् ऋषि वाल्मीकि ने अद्भुत पदों और अर्थों से युक्त उनका सम्पूर्ण चरित रचा।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक बताता है कि वाल्मीकि ने राम के राज्याभिषेक के बाद उनका सम्पूर्ण चरित रचा।

टिप्पणी

यह श्लोक इस बात का प्रमाण है कि वाल्मीकि ने राम के राज्याभिषेक के उपरांत ही उनका चरित लिखा। इसमें ""विचित्रपदमर्थवत्"" विशेषण महत्वपूर्ण है - यह काव्य के अद्भुत शब्दों और गहरे अर्थों की ओर संकेत करता है। वाल्मीकि ने रामकथा को केवल घटनाक्रम के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे ग्रंथ के रूप में रचा जो धर्म, नीति और करुणा का सागर है। इस श्लोक से ज्ञात होता है कि रामायण की रचना का समय राम के राज्यकाल में ही था, जब वाल्मीकि ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से घटनाओं को जाना।

॥ श्री वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ४ – श्लोक १ ॥

प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः। चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत्॥
prāptarājyasya rāmasya vālmīkirbhagavānṛṣiḥ | cakāra caritaṃ kṛtsnaṃ vicitrapadamarthavat ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : जब श्रीराम ने राज्य प्राप्त कर लिया, तब भगवान् ऋषि वाल्मीकि ने अद्भुत पदों और अर्थों से युक्त उनका सम्पूर्ण चरित रचा।

🔹 English Translation : When Lord Rama obtained the kingdom, the divine sage Valmiki composed his entire biography, which is filled with wonderful words and profound meanings.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
प्राप्तराज्यस्यविशेषण, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचनराज्य प्राप्त किए हुए
रामस्यपुल्लिंग, षष्ठी एकवचनराम के
वाल्मीकिःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनवाल्मीकि
भगवान्पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनपूज्य
ऋषिःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनमुनि
चकारक्रिया, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचनकिया
चरितम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनचरित्र
कृत्स्नम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनसम्पूर्ण
विचित्रपदम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनअद्भुत पदों वाला
अर्थवत्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनअर्थपूर्ण

📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं साहित्यिक महत्व

यह श्लोक चतुर्थ सर्ग का प्रारम्भ है, जहाँ वाल्मीकि स्वयं अपने काव्य रचना के समय और उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं। ""प्राप्तराज्यस्य"" शब्द से संकेत मिलता है कि रामायण की रचना राम के राज्याभिषेक के बाद हुई। वाल्मीकि ने राम के जीवन को समग्रता से देखा और उसे ""विचित्रपद"" (अद्भुत शब्दों) तथा ""अर्थवत्"" (गहरे अर्थों) से सजाया। यह श्लोक रामायण के महाकाव्य होने की पुष्टि करता है, जो केवल घटनाओं का वर्णन नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन प्रस्तुत करता है।

वाल्मीकि ने इस श्लोक में यह भी बताया कि उन्होंने राम के चरित को ""कृत्स्नम्"" (सम्पूर्ण) रूप में लिखा – अर्थात् जन्म से लेकर राज्याभिषेक तक की सभी घटनाएँ सम्मिलित हैं। इस प्रकार यह श्लोक सम्पूर्ण रामायण के स्वरूप को परिभाषित करता है।

आगे के श्लोकों में वे इस ग्रंथ के आकार, गायन की शैली और उसे प्रचारित करने वाले शिष्यों (कुश-लव) का परिचय देंगे।