संस्कृत श्लोक

ऋषीणां च द्विजातीनां साधूनां च समागमे। यथोपदेशं तत्त्वज्ञौ जगतुस्तौ समाहितौ॥

हिंदी अनुवाद

ऋषियों, द्विजों और साधुओं के समागम में उन तत्त्वज्ञों ने यथोपदेश (जैसा सिखाया गया था) एकाग्रचित्त होकर गाया।

अर्थ / व्याख्या

ऋषियों, द्विजों और साधुओं के समागम में उन तत्त्वज्ञों ने यथोपदेश (जैसा सिखाया गया था) एकाग्रचित्त होकर गाया।

टिप्पणी

यह श्लोक पहली बार गायन के श्रोताओं का परिचय देता है – ऋषि, द्विज और साधु। कुश-लव का समाहित (एकाग्र) होकर गाना उनकी साधना को दर्शाता है।

॥ श्लोक १३ – ऋषि-सभा में प्रथम गायन ॥

ऋषीणां च द्विजातीनां साधूनां च समागमे।
यथोपदेशं तत्त्वज्ञौ जगतुस्तौ समाहितौ॥
ṛṣīṇāṃ ca dvijātīnāṃ sādhūnāṃ ca samāgame | yathopadeśaṃ tattvajñau jagatus tau samāhitau ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : ऋषियों, द्विजों और साधुओं के समागम में उन तत्त्वज्ञों ने यथोपदेश (जैसा सिखाया गया था) एकाग्रचित्त होकर गाया।

🔹 English Translation : In the assembly of sages, brahmins and holy men, those two knowers of truth sang exactly as they had been taught, with complete concentration.

🔍 शब्दार्थ तालिका

... (as above) ...

📜 प्रथम श्रोता और गायन की पवित्रता

इस श्लोक में वर्णित श्रोता – ऋषि, द्विज और साधु – सभी उच्चकोटि के ज्ञानी एवं तपस्वी हैं। ऐसे विद्वानों के समक्ष गाना अपने आप में एक परीक्षा थी। किन्तु कुश-लव ने "यथोपदेशम्" – बिना किसी विकार के, ठीक वैसे ही गाया जैसे उन्हें सिखाया गया था। यह उनकी निष्ठा और स्मरणशक्ति का परिचायक है।

"तत्त्वज्ञौ" कहकर वाल्मीकि उन्हें केवल गायक नहीं, बल्कि रामकथा के तत्त्वद्रष्टा भी बताते हैं। "समाहितौ" का अर्थ है समाधि में लीन – उनका गाना केवल कण्ठ से नहीं, हृदय से निकल रहा था।

🎤 गायन की पद्धति

प्राचीन भारत में मन्त्रोच्चारण और काव्य-गायन की निश्चित पद्धतियाँ थीं। "यथोपदेशम्" शब्द यहाँ यह सुनिश्चित करता है कि कुश-लव ने उसी परम्परा का निर्वाह किया, जो वाल्मीकि ने उन्हें सिखाई थी। यह शिष्य-परम्परा की पवित्रता को रेखांकित करता है।

✨ विशेष: इस श्लोक में चार प्रकार के श्रोताओं का उल्लेख है – ऋषि (मन्त्रद्रष्टा), द्विज (वैदिक विद्वान), साधु (सन्यासी) और समागम (समूह)। यह रामायण की सार्वभौमिक स्वीकार्यता को दर्शाता है।

॥ जय श्री राम ॥