दैनिक विशेष विषय • वर्ष २०२६

उत्पन्ना एकादशी व्रत 2026: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा एवं महात्म्य

उत्पन्ना एकादशी सभी एकादशियों में अत्यंत विशिष्ट और आद्य मानी जाती है। मान्यता है कि इसी पावन तिथि पर भगवान विष्णु के शरीर से एकादशी देवी प्रकट हुई थीं, जिन्होंने मुर नामक असुर का संहार किया था। जानिए उत्पन्ना एकादशी 2026 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, संपूर्ण पूजा विधि, व्रत कथा और पारण के नियम।

२५ नवंबर २०२६, बुधवार तिथि व दिनांक
दैनिक विशेष विषय धार्मिक श्रेणी
१६ कुल पाठक संख्या
८ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: उत्पन्ना एकादशी सभी एकादशियों में अत्यंत विशिष्ट और आद्य मानी जाती है। मान्यता है कि इसी पावन तिथि पर भगवान विष्णु के शरीर से एकादशी देवी प्रकट हुई थीं, जिन्होंने मुर नामक असुर का संहार किया था। जानिए उत्पन्ना एकादशी 2026 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, संपूर्ण पूजा विधि, व्रत कथा और पारण के नियम।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
पावन तिथि: मार्गशीर्ष मास, कृष्ण पक्ष एकादशी
प्रारंभ / मुख्य तिथि: २५ नवंबर २०२६, बुधवार
शुभ मुहूर्त / समय: ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 05:08 से 06:02 बजे तक / अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:48 से 12:30 बजे तक
समाप्ति / पारण तिथि: २६ नवंबर २०२६, गुरुवार
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत
पावन सिद्ध मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

उत्पन्ना एकादशी 2026: सनातन धर्म में इसका आद्य एवं ऐतिहासिक महत्व

मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को 'उत्पन्ना एकादशी' के नाम से जाना जाता है। हिंदू पंचांग और सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत सभी एकादशियों का मूल और आरंभ माना गया है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण और निर्णयसिंधु जैसे ग्रंथों में उत्पन्ना एकादशी के महात्म्य का अत्यंत विस्तार से वर्णन मिलता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।

धर्मशास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर को उत्पन्ना एकादशी के महत्व को समझाते हुए कहा था कि जो मनुष्य विधि-विधान पूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ और दान-पुण्य से भी अनंत गुना अधिक पुण्य फल की प्राप्ति होती है। यह व्रत साधक के जीवन में संयम, भक्ति और मानसिक शांति का संचार करता है।

उत्पन्ना एकादशी व्रत का पौराणिक प्राकट्य इतिहास और कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, सत्ययुग में 'मुर' नामक एक अत्यंत बलशाली और क्रूर दैत्य था। उसने अपनी महाशक्ति से देवराज इंद्र सहित सभी देवताओं को परास्त कर स्वर्ग लोक पर अधिकार कर लिया था और देवताओं को उनके पदों से बेदखल कर दिया था। भयभीत होकर सभी देवता जगत के पालनहार भगवान विष्णु की शरण में क्षीरसागर पहुँचे। देवताओं की करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु ने असुर मुर से भीषण युद्ध आरंभ किया।

यह युद्ध कई वर्षों तक चलता रहा। भगवान विष्णु जब मुर नामक राक्षस से थककर बद्रिकाश्रम की एक गुफा में विश्राम करने के लिए गए, तो क्रूर मुर उस गुफा में भी भगवान का वध करने के लिए आ गया। उस समय भगवान विष्णु के शरीर से एक अत्यंत तेजोमय और दिव्य कन्या प्रकट हुई। उस देवी ने अपनी हुंकार मात्र से ही उस महाबली असुर मुर का क्षण भर में संहार कर डाला।

जब भगवान विष्णु की निद्रा टूटी और उन्होंने मुर असुर का कटा हुआ शरीर देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। भगवान ने उस दिव्य कन्या से पूछा कि हे देवी! इस शक्तिशाली असुर का वध किसने किया? तब उस कन्या ने हाथ जोड़कर कहा कि हे प्रभु! आपका ही यह शरीर ही मेरी उत्पत्ति का स्रोत है, इसलिए मेरा नाम 'एकादशी' है और मैंने ही इस पावन तिथि पर उत्पन्न होकर इस राक्षस का अंत किया है। तब प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि जो भी मनुष्य इस तिथि पर मेरा और तुम्हारा व्रत करेगा, उसके समस्त पापों का नाश होगा और वह अंत में मेरे परम धाम को प्राप्त होगा।

उत्पन्ना एकादशी 2026: विस्तृत पंचांग एवं शुभ मुहूर्त सारिणी

पंचांग विवरणसमय एवं तिथि
मास एवं पक्षमार्गशीर्ष मास, कृष्ण पक्ष
एकादशी तिथि प्रारंभवर्ष 2026 के निर्धारित पंचांग अनुसार (नियमित समयानुसार)
एकादशी तिथि समाप्तवर्ष 2026 के निर्धारित पंचांग अनुसार (नियमित समयानुसार)
व्रतः पारण समय (अगले दिन)प्रातः सूर्योदय के पश्चात द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व
ब्रह्म मुहूर्तप्रातः 05:08 बजे से 06:02 बजे तक
अभिजित मुहूर्तदोपहर 11:48 बजे से 12:30 बजे तक
विजय मुहूर्तदोपहर 01:54 बजे से 02:36 बजे तक
अमृत कालसायंकाल 04:15 बजे से 05:48 बजे तक
राहुकाल (वर्जित समय)प्रातः 07:30 बजे से 09:00 बजे तक

संपूर्ण पूजा विधि और षोडशोपचार अनुष्ठान

उत्पन्ना एकादशी के व्रत की शुरुआत दशमी तिथि की रात्रि से ही हो जाती है, जिसमें भक्तों को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। एकादशी के दिन की पूजा विधि निम्नलिखित चरणों में संपन्न की जाती है:

  1. प्रातःकालीन स्नान एवं संकल्प: एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदियों या घर में ही गंगाजल मिले जल से स्नान करें। इसके पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु का ध्यान करें और मन में व्रत का संकल्प लें।
  2. वेदी या चौकी स्थापना: पूजा घर में एक साफ चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान श्री विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
  3. षोडशोपचार पूजन: भगवान को रोली, अक्षत (अटूटे चावल), पीले पुष्प, गंध, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। एकादशी व्रत में तुलसी दल का विशेष महत्व है, अतः भगवान विष्णु के भोग में तुलसी पत्र अवश्य शामिल करें।
  4. व्रत कथा का श्रवण: पूजा के दौरान भगवान विष्णु की आरती करें, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और उत्पन्ना एकादशी की पावन कथा का वाचन या श्रवण करें।
  5. संध्याकालीन आराधना: संध्या के समय पुनः दीप प्रज्वलित कर भगवान का स्मरण करें और रात्रि जागरण का विधान करें।

आवश्यक पूजा सामग्री सूची

  • भगवान श्री विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र
  • पीला वस्त्र, कलावा (मौली), जनेऊ
  • रोली, कुमकुम, अक्षत, हल्दी, चंदन
  • पीले एवं ताजे फूल, माला
  • धूपबत्ती, शुद्ध घी का दीपक, कपूर
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शर्करा का मिश्रण)
  • ऋतुफल, केला, पंचमेवा, नारियल
  • विशेष भोग (खीर या सूजी का हलवा) एवं तुलसी दल

शासकीय एवं पौराणिक मंत्र

ध्यान मंत्र:
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभांगम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनेत्रं योगिभिर्ध्यानगम्यम्,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

महामंत्र:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

व्रत के नियम, खान-पान एवं दोस और डोंट्स (Dos and Don'ts)

उत्पन्ना एकादशी के व्रत में खान-पान और दिनचर्या से जुड़े कड़े नियमों का पालन करना होता है:

  • क्या करें (Dos): व्रत के दिन सात्विकता बनाए रखें। मन में ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध का त्याग करें। द्वादशी तिथि के दिन सूर्योदय के पश्चात ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान-दक्षिणा देने के बाद ही अन्न ग्रहण करें।
  • क्या न करें (Don'ts): इस दिन चावल का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाने से जीव रेंगने वाले जीवों की योनि में जन्म लेता है। इसके अलावा मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज और तामसिक भोजन का पूर्णतः त्याग करें। बाल और नाखून काटने से भी बचें।

क्षेत्रीय परंपराएं एवं सांस्कृतिक उत्सव

भारत के विभिन्न राज्यों में उत्पन्ना एकादशी को अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में जहाँ इसे वैष्णव परंपरा के अनुसार मंदिरों में विशेष झांकियों और विष्णु सहस्रनाम पाठ के साथ मनाया जाता है, वहीं दक्षिण भारत में तिरुपति बालाजी और अन्य विष्णु मंदिरों में विशेष उत्सव आयोजित किए जाते हैं। इस दिन घरों में सात्विक पकवान जैसे सिंघाड़े के आटे की पूरी, आलू की सब्जी और मखाने की खीर बनाई जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

वर्ष 2026 में मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के नियमानुसार उत्पन्ना एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा।

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 05:08 से 06:02 बजे तक) और अभिजित मुहूर्त (दोपहर 11:48 से 12:30 बजे तक) पूजा के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माने गए हैं।

व्रत का पारण द्वादशी तिथि के दिन सूर्योदय के पश्चात और द्वादशी समाप्त होने से पहले किया जाता है। पारण के समय तुलसी दल और सात्विक जल ग्रहण करके व्रत खोला जाता है।

इस पावन दिन भगवान विष्णु के महामंत्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।

हाँ, सामर्थ्य के अनुसार साधक निर्जला, फलाहारी या केवल एक समय दुग्धाहार लेकर भी इस व्रत का पालन कर सकते हैं। स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए ही व्रत के नियम चुनें।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

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