प्रमुख हिंदू त्योहार • वर्ष २०२६

धनतेरस 2026: कुबेर लक्ष्मी पूजन, खरीदारी का शुभ मुहूर्त और यम दीपदान विधि

धनतेरस 2026 का पावन पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाएगा। इस विशेष दिन पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देवता की पूजा के साथ सोना-चांदी, बर्तन व वाहन की खरीदारी का विशेष विधान है। जानिए संपूर्ण शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, यम दीपदान और व्रत कथा।

८ नवंबर २०२६, रविवार तिथि व दिनांक
प्रमुख हिंदू त्योहार धार्मिक श्रेणी
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७ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: धनतेरस 2026 का पावन पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाएगा। इस विशेष दिन पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर देवता की पूजा के साथ सोना-चांदी, बर्तन व वाहन की खरीदारी का विशेष विधान है। जानिए संपूर्ण शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, यम दीपदान और व्रत कथा।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
प्रारंभ / मुख्य तिथि: ८ नवंबर २०२६, रविवार
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत

धनतेरस 2026: आरोग्य, ऐश्वर्य और समृद्धि का महा पर्व

सनातन हिंदू धर्म में धनतेरस (Dhanteras 2026) का पर्व दीपावली के पांच दिवसीय महापर्व का प्रथम और अत्यंत महत्वपूर्ण उत्सव है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाए जाने वाले इस पावन पर्व को 'धनत्रयोदशी' या 'धन्वंतरि जयन्ती' के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इन्हें औषधीय और चिकित्सा विज्ञान का देवता माना जाता है। इसके साथ ही इस दिन माता लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की उपासना करने से साधक के घर में सुख, शांति, वैभव और ऐश्वर्य का स्थायी वास होता है।

धनतेरस 2026 की खगोलीय एवं पंचांग स्थिति

पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि का आरंभ और समापन विशेष नक्षत्रों तथा योगों के संयोग में हो रहा है। इस दिन स्थिर लग्न में की गई खरीदारी और पूजन अत्यंत फलदायी माना जाता है।

पर्व विवरण तिथि एवं समय विवरण
पर्व का नाम धनतेरस / धनत्रयोदशी 2026
मास एवं पक्ष कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ वर्ष 2026 के नियत पंचांगानुसार प्रदोष काल व्यापिनी
पूजा का मुख्य समय (प्रदोष काल) सायंकाल 05:45 बजे से 08:15 बजे तक
वृषभ लग्न (स्थिर लग्न) खरीदारी और लक्ष्मी-कुबेर पूजन के लिए सर्वोत्तम अवधि

धनतेरस पर खरीदारी के शुभ मुहूर्त और चौघड़िया

धनतेरस के दिन नई वस्तुएं खरीदना, विशेषकर आभूषण (सोना-चांदी), बर्तन, झाड़ू और इलेक्ट्रॉनिक सामान अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तु में तेरह गुना वृद्धि होती है।

  • चर चौघड़िया (सुबह का समय): लाभ और उन्नति के लिए।
  • लाभ एवं अमृत चौघड़िया (दोपहर से सायंकाल): व्यापारिक और घरेलू खरीदारी के लिए अति उत्तम।
  • प्रदोष काल एवं वृषभ लग्न (संध्या बेला): यह समय स्थिर लक्ष्मी प्राप्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस दौरान स्वर्ण, चांदी या बर्तन खरीदना और घर लाना माता लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक है।

भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर पूजन की विधि

धनतेरस के दिन संध्याकाल में प्रदोष बेला में विधि-विधान से पूजा करने से रोग-शोक का नाश होता है और धन की प्राप्ति होती है।

  1. शुद्धिकरण एवं मंडप स्थापना: स्नान आदि से निवृत्त होकर ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में एक चौकी रखें और उसपर लाल वस्त्र बिछाएं।
  2. कलश स्थापना: चौकी पर अक्षत की ढेरी बनाकर तांबे या पीतल का कलश स्थापित करें, जिसमें गंगाजल, आम के पत्ते और सुपारी रखें।
  3. विग्रह स्थापना: कलश के पास भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर जी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। यदि चांदी का सिक्का या नई वस्तु खरीदी है, तो उसे भी पूजन स्थल पर रखें।
  4. षोडशोपचार पूजन: रोली, अक्षत, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। माता लक्ष्मी को खीर या मखाने का भोग लगाएं तथा भगवान धन्वंतरि को औषधीय गुणों से युक्त वस्तुएं या मिष्ठान अर्पित करें।
  5. मंत्र जाप: कुबेर मंत्र और महालक्ष्मी मंत्र का कम से कम एक माला जाप करें।

कुबेर मंत्र: 'ॐ कुबेराय नमः'

महालक्ष्मी मंत्र: 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः'

यम दीपदान का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व

धनतेरस की संध्या को केवल लक्ष्मी पूजन ही नहीं, बल्कि अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति पाने के लिए 'यम दीपदान' भी किया जाता है। घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आटे का एक चौमुखी दीपक जलाया जाता है, जिसमें तिल का तेल डाला जाता है। यह दीपक यमराज को समर्पित होता है ताकि परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु से रक्षा हो सके।

पौराणिक कथा एवं व्रत कथा

प्रसिद्ध पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीनकाल में राजा हेम के पुत्र के जन्म पर ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि विवाह के चौथे दिन ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। राजकुमार का विवाह हुआ, किंतु उसकी पत्नी ने चौथे दिन उसे सोने नहीं दिया। उसने अपने पति के शयन कक्ष के द्वार पर सोने-चांदी के आभूषणों और सिक्कों का ढेर लगा दिया और चारों तरफ दीप जला दिए। जब यमराज राजकुमार के प्राण लेने के लिए सर्प के रूप में आए, तो उस अपार प्रकाश और रत्नों की चमक से उनकी आंखें चौंधिया गईं। वे नाग रूप छोड़कर संगीत सुनने लगे और सुबह होते ही बिना प्राण लिए वापस लौट गए। इस प्रकार राजकुमार की रक्षा हुई। तभी से धनतेरस के दिन दीप जलाने और यमराज की पूजा करने की परंपरा शुरू हुई।

क्षेत्रीय परंपराएं और पारंपरिक व्यंजन

भारत के विभिन्न राज्यों में धनतेरस को अलग-अलग उल्लास के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में जहां नए बर्तन और सर्राफा बाजार में खरीदारी की धूम रहती है, वहीं दक्षिण भारत में इसे 'धनत्रयोदशी' के रूप में विशेष अनुष्ठानों के साथ मनाया जाता है। इस दिन घरों में पारंपरिक मिठाइयां जैसे खीर, बेसन के लड्डू और धनिए की पंजीरी का भोग लगाया जाता है। साथ ही नई झाड़ू खरीदना दरिद्रता का नाश करने का प्रतीक माना जाता है।

धनतेरस पर क्या करें और क्या न करें (Dos and Don'ts)

  • क्या करें: घर की साफ-सफाई रखें, संध्या समय मुख्य द्वार पर दीपक जलाएं, जरूरतमंदों को अन्न-धन का दान करें और स्थिर लग्न में खरीदारी करें।
  • क्या न करें: इस दिन कांच की टूटी हुई वस्तुएं, लोहे के धारदार हथियार या काले रंग की वस्तुएं उपहार में लेने या घर लाने से बचें। उधार लेन-देन से भी इस दिन परहेज करना चाहिए।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

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