प्रमुख हिंदू त्योहार • वर्ष २०२६

छठ पूजा 2026: नहाय-खाय, खरना, अर्घ्य समय और संपूर्ण विधि

छठ पूजा महापर्व सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का सबसे कठिन और पवित्र व्रत है। चार दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में नहाय-खाय से लेकर उगते सूर्य को अर्घ्य देने तक की प्रक्रिया अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा के साथ संपन्न की जाती है।

१७ नवंबर २०२६, मंगलवार तिथि व दिनांक
प्रमुख हिंदू त्योहार धार्मिक श्रेणी
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४ मिनट पठन अवधि
महत्वपूर्ण सारांश: छठ पूजा महापर्व सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का सबसे कठिन और पवित्र व्रत है। चार दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में नहाय-खाय से लेकर उगते सूर्य को अर्घ्य देने तक की प्रक्रिया अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा के साथ संपन्न की जाती है।
पावन पर्व तिथि एवं समय निर्धारण
प्रारंभ / मुख्य तिथि: १७ नवंबर २०२६, मंगलवार
समाप्ति / पारण तिथि: २० नवंबर २०२६, शुक्रवार
विशेष उत्सव क्षेत्र: संपूर्ण भारत

छठ पूजा 2026: सूर्योपासना का महापर्व

छठ पूजा, जिसे 'डाला छठ' या 'सूर्य षष्ठी' के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय संस्कृति में प्रकृति, जल और सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे बड़ा पर्व है। यह व्रत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है। 2026 में यह महापर्व अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा।

पंचांग और तिथियां (2026)

दिन तिथि महत्व
17 नवंबर 2026 कार्तिक चतुर्थी नहाय-खाय
18 नवंबर 2026 कार्तिक पंचमी खरना
19 नवंबर 2026 कार्तिक षष्ठी संध्या अर्घ्य
20 नवंबर 2026 कार्तिक सप्तमी उषा अर्घ्य व पारण

नहाय-खाय (प्रथम दिवस)

व्रती स्नान के बाद शुद्ध सात्विक भोजन (कद्दू-भात) ग्रहण करते हैं। यह मन और शरीर की शुद्धि का प्रतीक है।

खरना (द्वितीय दिवस)

दिन भर उपवास के बाद शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाया जाता है। इसे ग्रहण करने के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत प्रारंभ होता है।

संध्या अर्घ्य (तृतीय दिवस)

अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। बांस के सूप में ठेकुआ, फल और गन्ने को सजाकर नदी या तालाब के तट पर पूजा की जाती है।

उषा अर्घ्य (चतुर्थ दिवस)

उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है। इसे 'पारण' कहते हैं।

पूजा विधि और सामग्री

पूजा में बांस के सूप, मिट्टी के दीये, गन्ना, नारियल, ठेकुआ, मौसमी फल और शुद्ध घी का विशेष महत्व है।

ॐ सूर्याय नमः

इस मंत्र का जाप करते हुए अर्घ्य अर्पित करना चाहिए।

पौराणिक महत्व

स्कंद पुराण के अनुसार, छठी मैया ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं। मान्यता है कि राजा प्रियव्रत ने जब संतान प्राप्ति के लिए कठिन तप किया, तब देवी षष्ठी ने उन्हें पुत्र रत्न का आशीर्वाद दिया। तब से यह व्रत संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है।

क्षेत्रीय परंपराएं

बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में यह पर्व लोक-आस्था का केंद्र है। अब यह पूरे विश्व में भारतीय प्रवासियों द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु व सनातन पंचांग परंपराओं के संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा संकलित किया गया है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा

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