मकर संक्रांति (Makar Sankranti / Pongal) २०२८

१५ जनवरी २०२८, शनिवार आराध्य: भगवान भास्कर (सूर्य देव) शीतकालीन महापर्व आगामी (४७४ दिन शेष)
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पूजन व ध्यान के समय पवित्र वातावरण निर्माण हेतु स्पर्श करें:

मकर संक्रांति का परिचय एवं महात्म्य

मकर संक्रांति सनातन धर्म का प्रमुख खगोलीय एवं आध्यात्मिक महापर्व है। इस दिन भगवान भुवन भास्कर दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर गमन करते हैं, जिसे देवताओं का दिन कहा जाता है। गंगा, यमुना और संगम में पावन स्नान, तिल-गुड़ का दान, और सूर्योपासना से मोक्ष व आरोग्य की प्राप्ति होती है।

मकर संक्रांति का पर्व सूर्य के राशि परिवर्तन का प्रतीक है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने तक ही शरशय्या पर प्राण त्याग की प्रतीक्षा की थी। इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर अपने पुत्र शनिदेव की मकर राशि में प्रवेश करते हैं। यह पिता-पुत्र के सौहार्द और अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का संदेश देता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल, असम में माघ बिहू, और उत्तर भारत में खिचड़ी पर्व के रूप में उल्लासपूर्वक मनाया जाता है।

शास्त्रोक्त तिथि: सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण काल (सौर गणना)
व्रत व साधना स्वरूप: दान-पुण्य, तीर्थ स्नान व सूर्योपासना (सात्विक खिचड़ी व फलाहार)

मकर संक्रांति २०२८: शास्त्रसम्मत शुभ मुहूर्त

द्रिक गणित पंचांग एवं सूर्य-सिद्धांत गणना के अनुसार वर्ष २०२८ (विक्रम संवत २०८५) में पूजन एवं अनुष्ठान के अत्यंत फलदायी मुहूर्त:

प्रातः शुभ पूजा मुहूर्त प्रातः ०६:१५ से पूर्वाह्न ०९:३० बजे तक
अभिजित मुहूर्त पूर्वाह्न ११:५० से दोपहर १२:४० बजे तक
प्रदोष काल मुहूर्त सायं ०६:२० से रात्रि ०८:४० बजे तक
पंचांग सम्मत सुझाव: स्थानीय सूर्योदय व सूर्यास्त के अनुसार विभिन्न शहरों में मुहूर्तों में कुछ मिनटों का अंतर संभावित हो सकता है।

संपूर्ण पूजा सामग्री सूची (Checklist)

शास्त्रोक्त पूजन हेतु आवश्यक समस्त सामग्रियों का संग्रह पूर्व में ही कर लें:

तांबे का लोटा व गंगाजल
लाल चंदन, रोली, अक्षत (बिना टूटे चावल)
लाल पुष्प (गुड़हल अथवा गुलाब)
काले व सफेद तिल, गुड़ की भेली
कच्ची खिचड़ी सामग्री (चावल, उड़द दाल, घी, नमक, हल्दी, मौसमी सब्जियां)
ऊनी वस्त्र व कंबल (दान हेतु)
धूप, दीप, कपूर व यज्ञोपवीत

चरणबद्ध एवं शास्त्रीय पूजा विधि

शास्त्रों में वर्णित प्रामाणिक विधि के अनुसार निम्नलिखित चरणों का पालन करें:

१
चरण १: प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदी अथवा घर में जल में गंगाजल व तिल मिलाकर स्नान करें।
२
चरण २: स्वच्छ लाल अथवा पीले वस्त्र धारण कर पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हों।
३
चरण ३: तांबे के पात्र में शुद्ध जल, अक्षत, रोली, लाल पुष्प व तिल डालकर सूर्य देव को "ॐ सूर्याय नमः" का जप करते हुए अर्घ्य दें।
४
चरण ४: गायत्री मंत्र अथवा आदित्य हृदय स्तोत्र का ३ बार भक्तिभाव से पाठ करें।
५
चरण ५: सूर्य देव के सम्मुख खड़े होकर ३ बार परिक्रमा करें और सर्वकल्याण की प्रार्थना करें।
६
चरण ६: ब्राह्मणों एवं जरूरतमंदों को तिल-गुड़ के लड्डू, कच्ची खिचड़ी, तिल का तेल, कंबल एवं दक्षिणा का दान करें।
७
चरण ७: परिवारजनों के साथ सात्विक खिचड़ी व तिल-गुड़ का प्रसाद ग्रहण करें।
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पौराणिक व्रत कथा एवं धार्मिक इतिहास

श्रीमद्भागवत एवं भविष्य पुराण के अनुसार, सूर्य देव का अपने पुत्र शनिदेव के प्रति पूर्व में कुछ मतभेद था। किंतु मकर संक्रांति के पावन दिन सूर्य देव स्वयं अपने पुत्र शनि की राशि मकर में पधारकर सारे द्वेष मिटा देते हैं। शनिदेव ने काले तिल से अपने पिता सूर्य देव का विधिवत सत्कार किया था, जिससे प्रसन्न होकर सूर्य देव ने वरदान दिया कि जो भी इस दिन तिल और गुड़ से पूजन-दान करेगा, उसे शनिदेव व सूर्य देव दोनों की कृपा प्राप्त होगी और उसके घर में धन-धान्य की कभी कमी नहीं होगी।

प्रमुख मंत्र, स्तुति व श्लोक

सूर्य गायत्री महामंत्र

ॐ भास्कराय विद्महे महाद्युतिकराय धीमहि। तन्नो सूर्यः प्रचोदयात्॥
भावार्थ: हम उन परम प्रकाशमान भगवान भास्कर का ध्यान करते हैं जो दिव्य तेज प्रदान करते हैं। वे सूर्य देव हमारी बुद्धि को सत्कर्मों में प्रेरित करें।

सूर्य अर्घ्य मंत्र

एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकंपय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
भावार्थ: हे सहस्र किरणों वाले, तेज के पुंज, संपूर्ण जगत् के स्वामी दिवाकर! आप मुझ भक्त पर कृपा करें और मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करें।

क्या करें और क्या न करें (नियम व सावधानियां)

क्या करें (करणीय कार्य)

  • प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठकर तिलयुक्त जल से स्नान करें।
  • सूर्य देव को अर्घ्य देते समय तांबे के पात्र का ही प्रयोग करें।
  • काले तिल, गुड़, खिचड़ी व गर्म वस्त्रों का यथाशक्ति दान अवश्य करें।
  • दिनभर ॐ सूर्याय नमः व गायत्री मंत्र का मानसिक जप करें।

क्या न करें (वर्जित कार्य)

  • संक्रांति के दिन तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज) का पूर्णतः त्याग रखें।
  • सूर्योदय के बाद देर तक सोने से बचें।
  • घर आए किसी भी भिक्षुक अथवा निर्धन को खाली हाथ न लौटाएं।
  • कटु वचन, क्रोध और पारिवारिक कलह से दूर रहें।

मकर संक्रांति संबंधित मुख्य प्रश्नोत्तर (FAQ)

चावल चंद्रमा का, उड़द दाल शनि का, हल्दी व सब्जियां गुरु-सूर्य का और घी सूर्य का प्रतीक माना जाता है। खिचड़ी दान से नवग्रह संतुलित होते हैं। तिल और गुड़ शीत ऋतु में शरीर को ऊर्जा और आरोग्य प्रदान करते हैं।

संक्रांति प्रवेश काल के कुछ घंटे पूर्व और पश्चात का समय पुण्य काल कहलाता है, जिसमें किए गए दान और स्नान का अनंत गुना फल मिलता है। प्रवेश के तुरंत बाद का अति-शुभ समय महापुण्य काल कहलाता है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ: यह सामग्री वैदिक पंचांग, पुराणों एवं प्रतिष्ठित सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा शोधपरक रूप से तैयार की गई है।

पर्व संक्षिप्त विवरण

पर्व का नाम: मकर संक्रांति
तारीख (२०२८): १५ जनवरी २०२८, शनिवार
आराध्य देव: भगवान भास्कर (सूर्य देव)
पर्व श्रेणी: शीतकालीन महापर्व
विक्रम संवत: २०८५
शक संवत: १९५०
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