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डगमग डोले माझी पान्या वारी नाव रे लिरिक्स (Dag Mag Dole Majhi Panyawari Nav Re Lyrics in Hindi) - by Govatsa Radhakrishnji Marathi Bhajan

डगमग डोले माझी पान्या वारी नाव रे मराठी भजन के संपूर्ण लिरिक्स, हिंदी भावार्थ और आध्यात्मिक महत्व पढ़ें। गोवत्स राधाकृष्णजी द्वारा रचित सुंदर रचना।

भक्ति और समर्पण की अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता यह सुंदर मराठी भजन 'डगमग डोले माझी पान्या वारी नाव रे' (Dag Mag Dole Majhi Panyawari Nav Re) गोवत्स राधाकृष्णजी द्वारा रचित एवं स्वरबद्ध एक अत्यंत भावुक और आर्त पुकार है। जीवन रूपी भवसागर के बीच जब भक्त की श्रद्धा रूपी नाव संकटों के भंवर में डगमगाने लगती है, तब भगवान पंढरपुर के विट्ठल (पांडुरंगा) को याद करते हुए भक्त अपनी रक्षा की गुहार लगाता है। विरक्ति, प्रेम और करुणा के इस अद्वितीय संगम में संत परंपरा का स्मरण करते हुए भक्त प्रह्लाद, गोरा कुम्भार, संत एकनाथ और संत तुकड़्या महाराज के प्रसंगों के माध्यम से भगवान की लीलाओं का गुणगान किया गया है। यह मार्गदर्शक भजन साधक के मन में अटूट विश्वास जगाता है और भगवान के प्रति अनन्य समर्पण का भाव उत्पन्न करता है। आइए इस पवित्र भजन के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ और आध्यात्मिक महत्व को समझें।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:


टिकाऊ मुखड़ा:

डगमग डोले माझी पान्या वारी नाव रे
पंढरपुरच्या पांडुरंगा बिगी बिगी धाव रे ॥

चरण १:

तुला पाहन्यासी देवा जीव हा भूकेला
धीर नही वाटे देवा माझ्या मनाला
काय सांगू आता देवा दूर तुझे गाव रे
पंढरपुरच्या पांडुरंगा बिगी बिगी धाव रे ॥

चरण २:

तुझ्या चरनासी वाहे भीमा चंद्रभागा
नही देव पावलो मी झालो अभागा
आता तरी देवा मला एक वेळा पाव रे
पंढरपुरच्या पांडुरंगा बिगी बिगी धाव रे ॥

चरण ३:

प्रल्हादा कारने नरसिंह झाला
दृष्ट मारण्याला देवा भक्त तारण्याला
भक्त उद्धरिसी देवा जगी तुझे नाव रे
पंढरपुरच्या पांडुरंगा बिगी बिगी धाव रे ॥

चरण ४:

गोर्ह्या कुंभाराची ऐकून विनावणी
भक्त एकनाथा घरी वाहतो पाणी
म्हने दास तुकड्या देवा रूप तुझे दाव रे
पंढरपुरच्या पांडुरंगा बिगी बिगी धाव रे ॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस सुंदर मराठी भजन में भक्त और भगवान के बीच के अटूट रिश्ते और भक्त की विरह वेदना को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। भजन की शुरुआती पंक्तियों में भक्त कहता है कि संसार रूपी जल राशि (अथाह पानी) में मेरी जीवन-नाव डगमगा रही है, हे पंढरपुर के पांडुरंगा! तुम शीघ्र अतिशीघ्र (बिगी बिगी) मेरी रक्षा के लिए दौड़ पड़ो। जीवन की इस अनिश्चितता में भगवान का स्मरण ही एकमात्र सहारा है।

आगे भक्त अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहता है कि हे देवा! मेरे इस मन को धीरज नहीं बंध रहा है, क्योंकि मेरा यह प्राण तुम्हें देखने के लिए भूखा और व्याकुल हो उठा है। तुम्हारा धाम मुझसे बहुत दूर है और यह दूरी भक्त के हृदय में विरह की अग्नि को और प्रज्वलित कर देती है। पंढरपुर की पवित्र भीमा और चंद्रभागा नदियाँ भगवान के चरणों को धोती हैं, लेकिन भक्त स्वयं को अभागा मानकर प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! कम से कम एक बार तो मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि डालो और दर्शन दो.

भजन के उत्तरार्ध में भक्त भगवान के ऐतिहासिक और पौराणिक चरित्रों का स्मरण करता है। वह याद दिलाता है कि हे प्रभु! आपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार लिया था, दुष्टों का संहार किया और अपने भक्तों का उद्धार किया। जगत में आपका नाम ही 'भक्तवत्सल' और 'भक्तोद्धारक' के रूप में प्रसिद्ध है। संत गोरा कुम्भार की पुकार सुनकर उनकी सहायता करने वाले और संत एकनाथजी के यहाँ स्वयं पानी ढोने वाले पांडुरंगा, आज मेरे संकट के समय भी प्रकट हो जाओ। अंत में भजनकार तुकड्या दास प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! अब अपनी माया समेटकर मुझे अपने अलौकिक रूप के दर्शन कराओ।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन वारकरी संप्रदाय और विट्ठल भक्ति की महान परंपरा का एक जीवंत प्रतीक है। इसकी मुख्य विशेषताओं में निम्नलिखित बिंदु सम्मिलित हैं:

  • विट्ठल भक्ति का केंद्र: यह भजन भगवान विट्ठल (पांडुरंगा) को समर्पित है, जो महाराष्ट्र के आराध्य देव हैं।
  • भक्त और भगवान का संवाद: इसमें भक्त की आर्त पुकार और भगवान की करुणा का सजीव चित्रण मिलता है।
  • ऐतिहासिक संतों का स्मरण: प्रह्लाद, गोरा कुम्भार और संत एकनाथ के प्रसंगों के माध्यम से भगवान की भक्त-परायणता को रेखांकित किया गया है।
  • आत्मसमर्पण का भाव: यह साधक को सिखाता है कि संकट के समय सांसारिक उपायों से अधिक ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए।
  • मराठी लोक संस्कृति और भक्ति संगीत का यह उत्कृष्ट समन्वय साधकों को आत्मीय शांति प्रदान करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस पवित्र भजन का गान और श्रवण करने के लिए कोई कठोर नियम नहीं है, फिर भी इसे निम्नलिखित अवसरों पर पूरी श्रद्धा के साथ गाया जा सकता है:

  • नित्य पूजा के समय: प्रातःकाल या संध्याकालीन वंदना के दौरान भगवान राधा कृष्ण भजन और विट्ठल स्तुति के साथ इसका गान किया जा सकता है।
  • एकादशी और वारी के अवसर: आषाढ़ी एकादशी, कार्तिकी एकादशी या पंढरपुर की पावन वारी के दौरान यह भजन विशेष रूप से गाया जाता है।
  • कीर्तन और सत्संग: वारकरी संप्रदाय के सत्संग, भजन संध्या और सामूहिक संकीर्तन में यह बहुत लोकप्रिय है।
  • मानसिक अशांति के समय: जब जीवन में कठिनाइयां आएं और मन विचलित हो, तब इस भजन का श्रवण करने से असीम शांति और आत्मबल प्राप्त होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में भगवान विट्ठल (पांडुरंगा) और रुक्मिणी हैं, जिन्हें भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। विट्ठल संप्रदाय महाराष्ट्र की आध्यात्मिक रीढ़ है जहाँ जात-पात के भेद को मिटाकर केवल भगवत भक्ति को सर्वोपरि माना गया है। इसके साथ ही भजन में संत प्रह्लाद (सत्य और भक्ति के प्रतीक), संत गोरा कुम्भार (समर्पण और कुम्हार संत), संत एकनाथ (भक्ति और सामाजिक समरसता के प्रतीक) तथा संत तुकड़्या महाराज की परंपरा का स्मरण किया गया है। इन संतों के जीवन चरित्र यह प्रमाणित करते हैं कि भगवान हमेशा अपने सच्चे भक्तों की पुकार सुनने के लिए दौड़े चले आते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

गोवatsa राधाकृष्णजी द्वारा रचित यह भजन पारंपरिक मराठी अभंग शैली और लोक धुनों से प्रेरित है। महाराष्ट्र की संत परंपरा में 'अभंग' वह रचना है जो कभी भंग नहीं होती यानी अमर होती है। इस भजन की पृष्ठभूमि में एक साधारण भक्त की वह मनःस्थिति है जो सांसारिक दुखों से घिर जाने पर भगवान को ही अपना एकमात्र खिवैया (नाविक) मानता है। रचनाकार ने मराठी भाषा की सरलता और मार्मिकता का ऐसा प्रयोग किया है कि श्रोता सीधे भगवान के चरणों से जुड़ जाता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन सरल ग्रामीण मराठी और सुबोध हिंदी-मराठी मिश्रित लोक शैली में रचित है। इसमें रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है—जीवन को 'नाव' और संसार को 'पानी' (अथाह जल) बताया गया है। भाषा की सरलता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है, जिससे यह अनपढ़ से लेकर विद्वान तक सभी के हृदय को आसानी से छू लेता है। शब्दों का चयन इतना भावपूर्ण है कि गाते समय नेत्रों से अश्रुधारा स्वतः बहने लगती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन सीख देता है:

  • अटूट विश्वास: जीवन की आंधी और कठिनाइयों में कभी भी अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए।
  • शरणागति: अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए पूर्णतः परमात्मा की शरण में जाना ही सच्ची मुक्ति है।
  • संतों का स्मरण: पूर्ववर्ती संतों के जीवन चरित्र से प्रेरणा लेकर अपने मार्ग को प्रशस्त करना चाहिए।
  • नियमित स्मरण: 'बिगी बिगी धाव रे' इस बात का प्रतीक है कि भगवान अपने भक्त की पुकार पर तुरंत विलंब किए बिना आते हैं।
  • आप इस प्रकार के अन्य पवित्र भावों के लिए राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का भी अध्ययन कर सकते हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ
डगमग डोले अस्थिर होना या डोलना जीवन के संकटों में मन या जीवन-नाव का विचलित होना
पान्या वारी नाव पानी पर तैरती हुई नाव संसार रूपी सागर में तैरता हुआ नश्वर शरीर
बिगी बिगी शीघ्रता से, जल्दी-जल्दी भक्त की व्याकुलता और भगवान से त्वरित सहायता की मांग
भीमा चंद्रभागा पंढरपुर के पास बहने वाली नदियाँ भगवान विट्ठल के चरणों को पखारने वाली पवित्र नदियाँ
अभागा भाग्यहीन ईश्वर के दर्शन से वंचित रहने पर स्वयं को माना गया हीन भाव
दृष्ट मारण्याला दुष्टों का संहार करने वाले अधर्म और बुराई का नाश करने वाली ईश्वरीय शक्ति

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

मुखड़ा: डगमग डोले माझी पान्या वारी नाव रे, पंढरपुरच्या पांडुरंगा बिगी बिगी धाव रे।
भावार्थ: भक्त कहता है कि संसार के इस अथाह जल में मेरी जीवन-रूपी नाव संकटों के कारण डगमगा रही है। हे पंढरपुर के स्वामी पांडुरंग! बिना किसी देरी के मेरी रक्षा के लिए जल्दी से दौड़ पड़ो।

चरण 1: तुला पाहन्यासी देवा जीव हा भूकेला, धीर नही वाटे देवा माझ्या मनाला।
भावार्थ: हे देवा! मेरा यह प्राण केवल और केवल आपके दर्शन के लिए भूखा और प्यासा है। मेरे इस चंचल मन को अब और धीरज नहीं बंध रहा है, विरह की पीड़ा असहनीय हो गई है।

चरण 2: तुझ्या चरनासी वाहे भीमा चंद्रभागा, नही देव पावलो मी झालो अभागा।
भावार्थ: आपके चरणों का अभिषेक करने के लिए पवित्र भीमा और चंद्रभागा नदियाँ बह रही हैं, परंतु मैं अभागा ही अभी तक आपके दर्शन और कृपा से वंचित हूँ।

चरण 3: प्रल्हादा कारने नरसिंह झाला, दृष्ट मारन्यला देवा भक्त तारन्यला।
भावार्थ: आपने ही भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार लिया था। दुष्टों का नाश करने वाले और भक्तों का उद्धार करने वाले प्रभु, आप ही इस जगत में एकमात्र तारणहार हैं।

चरण 4: गोर्ह्या कुम्भाराची आइकून विनावनी, भक्त एकनाथा घरी वाहतो पानी।
भावार्थ: हे प्रभु! आपने गोरा कुम्भाजी की प्रार्थना सुनी और संत एकनाथजी के घर स्वयं पानी ढोने का कार्य किया। हे दास तुकड्या के स्वामी! अब आप भी मुझे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराओ।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

भगवान विट्ठल और श्री कृष्ण की आराधना के समय निम्नलिखित मंत्रों का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:

  • महामंत्र: हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
  • विट्ठल ध्यान मंत्र: करामध्ये कर ठेवुनिया कटी वरी, पांडुरंग उभा भीमा तीरी।
  • आप ध्यान और एकाग्रता के लिए राधा कृष्ण स्टेटस और वंदना के वचनों का भी अनुसरण कर सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण तथ्य
भजन का नाम डगमग डोले माझी पान्या वारी नाव रे (Dag Mag Dole)
रचनाकार / स्वर गोवत्स राधाकृष्णजी
आराध्य देव भगवान विट्ठल (पांडुरंग) / पंढरपुर नाथ
भाषा मराठी एवं लोक भाषा
भक्ति भाव विरह, समर्पण, आर्त पुकार और शरणागति
प्रमुख परंपरा वारकरी संप्रदाय और भक्ति संगीत
उपयुक्त अवसर एकादशी, वारी, सत्संग, नित्य पूजा और भजन संध्या

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह सुंदर भजन गोवatsa राधाकृष्णजी द्वारा रचित एवं प्रस्तुत किया गया है, जो विट्ठल भक्ति और मराठी संप्रदाय की भावनाओं से ओतप्रोत है।

इस भजन में महाराष्ट्र के आराध्य देव पंढरपुर के पांडुरंग (भगवान विट्ठल) की महिमा और उनके प्रति भक्त की आर्त पुकार का गुणगान किया गया है।

इस भजन में भक्त प्रह्लाद, संत गोरा कुम्भार, संत एकनाथ और संत तुकड़्या महाराज का उल्लेख करते हुए भगवान की भक्त-वत्सलता को दर्शाया गया है।

'बिगी बिगी धाव रे' का अर्थ है—"शीघ्र अतिशीघ्र दौड़ पड़ो।" भक्त संकट के समय भगवान से बिना किसी विलंब के अपनी रक्षा करने की प्रार्थना करता है।

यह भजन आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी, पंढरपुर की वारी यात्रा, वारकरी संप्रदाय के सत्संगों और दैनिक भजन संध्या के समय विशेष रूप से गाया जाता है।

इसका आध्यात्मिक संकेत यह है कि संसार के दुखों, मोह-माया और कठिनाइयों के बीच जब मनुष्य का मन विचलित होने लगता है, तब भगवान का स्मरण ही उसे पार लगाता है।

भीमा और चंद्रभागा वे पवित्र नदियाँ हैं जो पंढरपुर में बहती हैं और भगवान विट्ठल के चरणों का स्पर्श करती हैं, जिन्हें वारकरी अत्यंत श्रद्धा से पूजते हैं।

हाँ, इस भजन को घर पर प्रातःकालीन या संध्याकालीन पूजा के समय, एकादशी के उपवास के दिन पूरी पवित्रता और भक्ति भाव के साथ गाया जा सकता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) पर प्रस्तुत यह आलेख पारंपरिक मराठी वारकरी साहित्य, संत वचनों और लोक परंपराओं के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध लिरिक्स, प्रामाणिक भावार्थ और उच्च कोटि की आध्यात्मिक सामग्री प्रदान करना है। यह सामग्री पूरी तरह से लोक-कल्याण और भक्ति प्रसार को समर्पित है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत सभी तथ्यों को पूरी निष्ठा के साथ संकलित किया गया है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • वारकरी संप्रदाय की पारंपरिक भजन पुस्तिकाएं एवं संकीर्तन संग्रह।
  • संत महिमा एवं पंढरपुर विट्ठल दर्शन ग्रंथ।
  • लोक संस्कृति और मराठी भक्ति संगीत के पारंपरिक संकलन।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 14 Oct 2026

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