देवादिदेव महादेव और आदि शक्ति माता पार्वती (माँ गौरा) के पावन दांपत्य एवं विरह-मिलन के भावों को अभिव्यक्त करने वाला भजन "आ लौट के आजा भोलेनाथ तुझे माँ गौरा बुलाती है" शिव भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। यह भजन मुख्य रूप से 'करुणा भाव' और 'समर्पण रस' से ओतप्रोत है, जिसमें माता पार्वती भगवान शिव के वैराग्य रूप को छोड़कर पुनः गृहस्थ जीवन और कैलाश पर लौटने की मनुहार कर रही हैं। शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव जब ध्यानमग्न या समाधिस्थ होकर एकांतवास में चले जाते हैं, तब संपूर्ण सृष्टि उनके स्पंदन के लिए व्याकुल हो उठती है। यह भजन उसी व्याकुलता, अनन्य प्रेम और भक्ति का संगीतमय प्रकटीकरण है। सावन के पवित्र महीने, महाशिवरात्रि और सोमवार के व्रत के अवसरों पर इस भजन का गायन भक्तों के हृदय में शिव-पार्वती के प्रति अगाध श्रद्धा का संचार करता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ आ लौट के आजा भोलेनाथ तुझे माँ गौरा बुलाती है ॥
(कोरस / मुखड़ा)
आ लौट के आजा भोलेनाथ, तुझे माँ गौरा बुलाती है।
तुझे माँ गौरा बुलाती है, तुझे माँ गौरा बुलाती है।
आ लौट के आजा भोलेनाथ, तुझे माँ गौरा बुलाती है॥
(अंतरा - १)
भांग रगड़ कर थक गई गौरा, तेरी राह तकत थक गई गौरा।
अब तो दरस दिखाओ नाथ, तुझे माँ गौरा बुलाती है।
आ लौट के आजा भोलेनाथ, तुझे माँ गौरा बुलाती है॥
(अंतरा - २)
भस्म रमाने वाले आजा, डमरू बजाने वाले आजा।
गंगा को जटा में धरने वाले, तुझे माँ गौरा बुलाती है।
आ लौट के आजा भोलेनाथ, तुझे माँ गौरा बुलाती है॥
(अंतरा - ३)
नंदी की सवारी करने वाले, विष का प्याला पीने वाले।
नीलकंठ महाकाल प्यारे, तुझे माँ गौरा बुलाती है।
आ लौट के आजा भोलेनाथ, तुझे माँ गौरा बुलाती है॥
(अंतरा - ४)
बाघंबर ओढ़ने वाले आजा, सर्पों की माला वाले आजा।
कैलाश के राजा आ जाओ, तुझे माँ गौरा बुलाती है।
आ लौट के आजा भोलेनाथ, तुझे माँ गौरा बुलाती है॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का केंद्रीय भाव अत्यंत दिव्य और आध्यात्मिक है। यहाँ "माँ गौरा" केवल एक पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि आदि शक्ति के रूप में शिव (परम पुरुष) को पुकार रही हैं। जब शिव समाधि में लीन होकर बाह्य जगत से विमुख हो जाते हैं, तब प्रकृति (गौरा) पुरुष (शिव) के बिना अधूरी हो जाती है।
भजन के प्रथम भाग में माता पार्वती द्वारा शिव जी के प्रिय नैवेद्य 'भांग' को तैयार करने और उनके आगमन की प्रतीक्षा करने का वर्णन है। यह प्रतीक्षा जीव की परमात्मा के लिए तड़प को दर्शाती है। दूसरे भाग में शिव के अलौकिक स्वरूप—जैसे भस्म रमाना, डमरू बजाना और जटा में गंगा धारण करना—का स्मरण किया गया है। यह स्मरण साधक को याद दिलाता है कि शिव ही इस सृष्टि के नियंत्रक और संहारक हैं। तीसरे और चौथे भाग में शिव के परोपकारी रूप (नीलकंठ) और उनके त्यागमय स्वरूप (बाघंबर और सर्प धारण करना) की वंदना की गई है। संपूर्ण भावार्थ यही है कि हे प्रभु! अपनी समाधि से जागो और अपनी इस सृष्टि व भक्तों को दर्शन देकर कृतार्थ करो।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- शिव-शक्ति का अभेद संबंध: यह भजन दर्शाता है कि शिव और शक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं। शक्ति के बिना शिव 'शव' समान हैं और शिव के बिना शक्ति का अस्तित्व अधूरा है।
- वैराग्य और गृहस्थ का संतुलन: जहाँ शिव परम वैरागी हैं, वहीं माता पार्वती उन्हें गृहस्थ धर्म की ओर आकर्षित करती हैं। यह भजन इन दोनों विपरीत छोरों के सुंदर मिलन का प्रतीक है।
- भक्ति मार्ग में प्रतीक्षा का महत्व: "राह तकत थक गई गौरा" पंक्ति दर्शाती है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए धैर्य और निरंतर प्रतीक्षा (साधना) अनिवार्य है।
- सांस्कृतिक धरोहर: यह भजन उत्तर भारत के लोक-भजनों में अत्यंत लोकप्रिय है और पारंपरिक कीर्तन मंडलियों का मुख्य हिस्सा है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस मधुर भजन का गायन और श्रवण वैसे तो किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु कुछ विशेष अवसरों पर इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है:
- सोमवार व्रत एवं पूजा: सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है। इस दिन सुबह या शाम की आरती के बाद इस भजन को गाने से मानसिक शांति मिलती है।
- सावन मास (श्रावण): सावन के महीने में शिव-पार्वती की संयुक्त आराधना की जाती है। इस समय सामूहिक कीर्तन में इस भजन का गायन अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- महाशिवरात्रि उत्सव: महाशिवरात्रि की रात्रि जागरण के समय इस भजन को गाकर भक्तगण शिव-पार्वती के विवाह और उनके पुनर्मिलन के उत्सव को मनाते हैं।
- गायन विधि: इस भजन को शांत चित्त होकर, डमरू और मंजीरे की थाप पर मध्यम लय में गाना चाहिए। गाते समय हृदय में माता पार्वती की व्याकुलता और शिव जी की सौम्यता का ध्यान करना चाहिए।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान शिव (भोलेनाथ) और माता पार्वती (माँ गौरा) को समर्पित है। सनातन परंपरा में शिव को 'कल्याण' और पार्वती को 'ऊर्जा' या 'प्रकृति' माना गया है। इस भजन के रचयिता के रूप में किसी एक विशिष्ट प्राचीन संत का नाम तो नहीं मिलता, परंतु यह लोक-परंपरा और जन-मानस के कंठ से उपजा एक अत्यंत लोकप्रिय लोक-भजन है, जिसे समय-समय पर विभिन्न आधुनिक गायकों ने अपनी मधुर आवाज देकर और अधिक समृद्ध किया है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की पृष्ठभूमि शिव पुराण की उस कथा से प्रेरित प्रतीत होती है, जहाँ सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव घोर तपस्या और समाधि में चले जाते हैं। तत्पश्चात, माता सती ही पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लेती हैं और शिव को पुनः प्राप्त करने के लिए कठिन तप करती हैं। जब शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करते हैं, तब भी वे समय-समय पर लोक-कल्याण हेतु समाधिस्थ हो जाते हैं। माता पार्वती का उन्हें समाधि से जगाने और कैलाश पर वापस बुलाने का यह मनुहार गीत इसी दिव्य पृष्ठभूमि पर आधारित है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और लोक-भाषा (खड़ी बोली और अवधी का मिश्रण) है। इसमें प्रयुक्त शब्द इतने सरल हैं कि कोई भी साधारण व्यक्ति इसे आसानी से समझ और गा सकता है। काव्य शैली की बात करें तो इसमें 'पुकार शैली' (Call and Response) का प्रयोग हुआ है, जहाँ भक्त माता पार्वती के स्वर में स्वर मिलाकर भोलेनाथ को पुकारता है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का सुंदर समावेश है, जैसे "भस्म रमाने वाले" और "गंगा को जटा में धरने वाले"।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन केवल एक पारंपरिक गीत नहीं है, बल्कि इसमें गहरे जीवन संदेश छिपे हैं:
- धैर्य और निष्ठा: माता पार्वती की प्रतीक्षा हमें सिखाती है कि जीवन में जब कठिन परिस्थितियां आएं या ईश्वर की कृपा मिलने में देरी हो, तो हमें अपना धैर्य और निष्ठा नहीं खोनी चाहिए।
- सरलता ही शिवत्व है: शिव को "भोलेनाथ" कहा गया है क्योंकि वे बहुत सरल हैं। वे सोने-चांदी से नहीं, बल्कि भांग, धतूरा, बेलपत्र और सच्ची पुकार से प्रसन्न हो जाते हैं। हमें भी अपने जीवन में सादगी अपनानी चाहिए।
- विषपान की क्षमता (सहनशीलता): "विष का प्याला पीने वाले" पंक्ति हमें सिखाती है कि समाज और परिवार में शांति बनाए रखने के लिए कभी-कभी हमें कड़वी बातों (विष) को अपने कंठ में ही रोक लेना चाहिए, उसे बाहर फैलाकर दूसरों को आहत नहीं करना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| भोलेनाथ | अत्यंत सीधे और दयालु स्वामी | भगवान शिव का वह रूप जो भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होता है। |
| राह तकत | रास्ता देखते हुए / प्रतीक्षा करते हुए | साधक की ईश्वर से मिलन की तीव्र व्याकुलता। |
| भस्म रमाने वाले | शरीर पर राख लगाने वाले | संसार की नश्वरता और वैराग्य का प्रतीक। |
| बाघंबर | बाघ की खाल के वस्त्र | प्रकृति और पशु जगत पर नियंत्रण का प्रतीक। |
| नीलकंठ | नीले कंठ वाले | संसार की रक्षा के लिए हलाहल विष पीने वाले परोपकारी देव। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
१. "आ लौट के आजा भोलेनाथ, तुझे माँ गौरा बुलाती है..."
हे देवादिदेव! अपनी समाधि का परित्याग कर पुनः कैलाश पर्वत पर लौट आइए। आपकी अर्धांगिनी, आदि शक्ति माँ पार्वती आपको अत्यंत आदर और प्रेमपूर्वक पुकार रही हैं।
२. "भांग रगड़ कर थक गई गौरा, तेरी राह तकत थक गई गौरा..."
माता पार्वती ने आपके प्रिय प्रसाद (भांग) को तैयार कर लिया है। वे बहुत समय से आपके आगमन के मार्ग को निहार रही हैं और अब उनकी प्रतीक्षा की सीमा समाप्त हो रही है। कृपया आकर उन्हें दर्शन दें।
३. "भस्म रमाने वाले आजा, डमरू बजाने वाले आजा..."
हे श्मशान की भस्म को अपने दिव्य शरीर पर धारण करने वाले और अपने डमरू की नाद से संपूर्ण ब्रह्मांड में स्पंदन उत्पन्न करने वाले प्रभु! शीघ्र पधारिए।
४. "नंदी की सवारी करने वाले, विष का प्याला पीने वाले..."
हे अपने परम भक्त नंदी बैल पर सवारी करने वाले और समुद्र मंथन से निकले भयंकर विष को पीकर सृष्टि की रक्षा करने वाले दयालु नीलकंठ! आपकी जय हो, लौट आइए।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के गायन के पूर्व या पश्चात भगवान शिव और माता पार्वती के इस कल्याणकारी मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है:
"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थ: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, इस संसार के सार हैं और सर्पों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी (गौरा) सहित मेरे हृदय कमल में सदा निवास करें। उन्हें मैं नमन करता हूँ।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण बिंदु | महत्वपूर्ण जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | आ लौट के आजा भोलेनाथ तुझे माँ गौरा बुलाती है |
| मुख्य देवी-देवता | भगवान शिव (महादेव) एवं माता पार्वती (गौरा) |
| भजन का मुख्य भाव | करुणा, विरह, समर्पण और भक्ति भाव |
| उपयुक्त अवसर | सावन सोमवार, महाशिवरात्रि, शिव आराधना, संध्या आरती |
| काव्य भाषा | सरल हिंदी (लोक-भाषा) |
| मुख्य वाद्य यंत्र | डमरू, मंजीरा, ढोलक, हारमोनियम |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को तैयार करने में पारंपरिक शिव पुराण की कथाओं, सनातन मान्यताओं और प्रामाणिक लोक-साहित्य का संदर्भ लिया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, त्रुटिहीन और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध सामग्री पहुंचाना है ताकि वे अपनी साधना और भक्ति मार्ग में आगे बढ़ सकें।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- शिव महापुराण: रुद्र संहिता (सती और पार्वती चरित्र खंड)।
- श्रीमद्भागवत महापुराण: शिव-पार्वती विवाह प्रसंग।
- पारंपरिक लोक भजन संग्रह: उत्तर भारतीय लोक-साहित्य एवं कीर्तन परंपरा।
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