भक्ति और उल्लास के पावन पर्व होली के अवसर पर गाए जाने वाले पारंपरिक और मधुर भजनों में होली भजन 'सांवरिया नंदकिशोर मेरी साड़ी पे रंग डाल गयो' का एक विशेष और अद्वितीय स्थान है। निकुंज कामरा (Nikunj Kamra) द्वारा प्रस्तुत और लोकप्रिय किया गया यह भजन ब्रज की अनूठी और अलौकिक होली की जीवंत झांकी प्रस्तुत करता है। इस भजन का मुख्य भाव भगवान श्रीकृष्ण (नंदकिशोर, चित्तचोर, मदन मुरारी) और भक्तों या ब्रज की गोपियों के बीच के उस प्रेमपूर्ण, नटखट और सखेय भाव (मधुर सखा-भाव) को दर्शाता है, जहाँ प्रभु भक्तों के साथ फाग खेलते हुए उनके जीवन को अपने प्रेम के विविध रंगों से सराबोर कर देते हैं। ब्रजमंडल के कण-कण में रची-बसी होली की मस्ती, वृंदावन, बरसाना, गोवर्धन, मानसी गंगा, यमुना तट, राधावल्लभ और राधारमण की कुंजों में गूंजने वाले फाग के गीतों की यह रचना साधकों और संगीत प्रेमियों के हृदय को तुरंत आकर्षित कर लेती है। इस विस्तृत लेख में हम इस भजन के सम्पूर्ण बोल (Lyrics), सरल हिंदी अर्थ, भावार्थ, गायन की विधि, सांस्कृतिक महत्व और इससे जुड़े विभिन्न आध्यात्मिक पक्षों का गहन अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:
मुखाड़ा (Refrain):
सावरिया नन्द किशोर हाँ किशोर मेरी साड़ी पे रंग डाल गायों वाह वाह रे रसिया वाह वाह रे छैला
मैंने बोहत कहा एक न माना बर जोरी करत रहा कन्हा
मोहे रंग गयों वो चित्तचोर हाँ चोर मेरी साड़ी पे रंग डाल गया
सांवरिया नंदकिशोर...
अंतरा 1 (First Stanza):
हरा लाल रंग नीला डाला केसरिया पीला मतवाला
बड़ा मैंने लगया ज़ोर हाँ ज़ोर मेरी साड़ी पे रंग डाल गया
सांवरिया नंदकिशोर...
अंतरा 2 (Second Stanza):
होरी का बड़ा खिलाडी है मन मोहन मदन मुरारी है
हुई श्याम से खेलत घोर मेरी साड़ी पे रंग डाल गया
सांवरिया नंदकिशोर...
अंतरा 3 (Third Stanza - Braj Dhaam Chaupai / Refrain):
वृन्दावन में होरी है, बरसाने में होरी है
गोवर्धन होरी है, मानसीगंगा होरी है
यामुना तात पे होरी है, राधावल्लभ होरी है
राधारमन में होरी है, हो हो हो हो होरी है!
सांवरिया नंदकिशोर मेरी साड़ी पे रंग डाल गयो...
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन केवल रंगों के पर्व का एक साधारण गीत नहीं है, बल्कि यह जीव (आत्मा) और परमात्मा (कृष्ण) के मध्य के अद्वैत और सख्य भाव का अत्यंत सुंदर काव्यात्मक रूप है। जब नायिका (भक्त) भगवान श्रीकृष्ण को उलाहना देती है कि 'सांवरिया नंदकिशोर मेरी साड़ी पे रंग डाल गयो', तो यहाँ 'साड़ी' जीव के भौतिक शरीर या मन का प्रतीक है, और 'रंग' divine love (दिव्य प्रेम) या भक्ति के उस पक्के रंग का प्रतीक है जो एक बार चढ़ जाए तो कभी नहीं उतरता।
भक्त कहती है कि उसने बहुत मना किया, कई प्रकार की तर्क-वितर्क और विनय की, परंतु कन्हाई ने एक न मानी और जबरदस्ती अपने प्रेम के रंगों से ओत-प्रोत कर दिया। चित्तचोर श्रीकृष्ण ने भक्त के मन को चुराकर उसे अपने ही रंग में रंग लिया है। भजन में हरे, लाल, नीले, केसरिया और पीले जैसे विविध रंगों का उल्लेख जीवन के विभिन्न अनुभवों और रंगों का प्रतीक है, जिसे भगवान अपनी लीला के माध्यम से आनंदमय बना देते हैं। अंत में ब्रज के विभिन्न पवित्र स्थलों जैसे वृंदावन, बरसाना, गोवर्धन, मानसी गंगा और यमुना तट का स्मरण करते हुए यह स्पष्ट किया जाता है कि होली केवल एक स्थान का उत्सव नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रजमंडल और ब्रह्मांड में व्याप्त दिव्य आनंद की अनुभूति है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता, लयबद्धता और ब्रज संस्कृति के साथ इसका गहरा जुड़ाव है। निकुंज कामरा द्वारा गाए गए इस भजन में पारंपरिक लोक धुनों का आधुनिक संगीत संयोजन के साथ ऐसा मिश्रण मिलता है जो हर उम्र के श्रोता को झूमने पर मजबूर कर देता है।
- दिव्य आनंद (आनंद रस): यह भजन भगवान श्रीकृष्ण की माधुर्य भक्ति और लीलाओं का स्मरण कराता है।
- सांस्कृतिक एकता: इसमें ब्रज के प्रमुख तीर्थ स्थलों (वृंदावन, बरसाने, गोवर्धन आदि) का सामूहिक उल्लेख है, जो तीर्थों की महिमा को बढ़ाता है।
- भक्ति का पक्का रंग: सांसारिक रंगों के फीके पड़ने के विपरीत, श्याम सुंदर का डाला हुआ रंग शाश्वत और अचल होता है।
- उत्सव प्रियता: यह सनातन संस्कृति में पर्वों को ईश्वर की आराधना के साथ जोड़ने की सुंदर परंपरा का प्रतीक है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को मुख्य रूप से होली के पावन पर्व, फाल्गुन मास के उत्सवों, राधा-कृष्ण के मंदिरों में होने वाले समाज गायन, और घरों में होने वाले संकीर्तन के दौरान गाया जाता है।
- उत्सव का समय: फाल्गुन शुक्ल पक्ष से लेकर पूर्णिमा (होलिका दहन) और धुलंडी के दिन इसे विशेष रूप से गाया जाता है।
- सांसारिक एवं आध्यात्मिक मिलन: सत्संग, भजन संध्या, और पारिवारिक उत्सवों में जब इसे ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम के साथ गाया जाता है, तो पूरा वातावरण वृंदावनमय हो जाता है।
- ध्यान एवं मानसिक शांति: भगवान श्रीकृष्ण के बाल और युवा स्वरूप का स्मरण करते हुए एकांत में इसका मानसिक पाठ करने से मन के सारे विकार दूर होते हैं।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के आराध्य देव स्वयं ब्रजेंद्रनंदन भगवान श्रीकृष्ण (नंदकिशोर, मनमोहन, मदन मुरारी) हैं, जो प्रेम, सौंदर्य और आनंद के अवतार हैं। इसके साथ ही राधारानी, राधावल्लभ और राधारमण जी का स्मरण इस भजन को पुष्टि मार्ग और गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की भावनाओं के निकट ले जाता है। आधुनिक समय में गायक निकुंज कामरा ने अपनी मधुर वाणी से इस पारंपरिक रचना को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन ब्रज के पारंपरिक लोकगीतों और फाग परंपरा की नींव पर आधारित है। ब्रज में सदियों से होली के अवसर पर रसिया गाने की परंपरा रही है। लोक कवियों और संतों द्वारा रचे गए इन पदों में भगवान कृष्ण के साथ गोपियों की छेड़छाड़ और प्रेम क्रीड़ाओं का वर्णन मिलता है। समय के साथ इन पारंपरिक गीतों को विभिन्न कलाकारों ने अपने संगीत से सजाया है, जिसमें निकुंज कामरा की प्रस्तुति अत्यधिक लोकप्रिय हुई है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा ब्रजभाषा मिश्रित सरल हिंदी (खड़ी बोली) है, जो उत्तर भारत के आम जनमानस के हृदय को सीधे स्पर्श करती है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। 'वाह वाह रे रसिया, वाह वाह रे छैला' जैसी पंक्तियाँ लोकगीत की शैली को जीवंत करती हैं, जो श्रोताओं को गायन में सहभागिता करने के लिए प्रेरित करती हैं.
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें सिखाता है कि:
- ईश्वर के प्रेम का रंग सबसे गहरा और स्थायी होता है।
- भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता; जब भगवान प्रेम का रंग डालते हैं, तो भक्त अपने सारे तर्क-कुतर्क छोड़कर उसमें तल्लीन हो जाता है।
- जीवन एक उत्सव है, और इसे भगवान की आराधना, प्रेम और सद्भाव के साथ जीना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक / संदर्भगत अर्थ |
|---|---|---|
| सांवरिया नंदकिशोर | नंद बाबा के पुत्र श्री कृष्ण | भक्तों के संकट हरने वाले और चित्त को आकर्षित करने वाले प्रभु |
| बर जोरी | जबरदस्ती | ईश्वर की अहैतुकी कृपा जो बिना मांगे और कभी-कभी जीव की इच्छा के विरुद्ध भी उसे अपने रंग में रंग लेती है |
| चित्तचोर | मन चुराने वाला | वह परमात्मा जो भक्त के मन और उसकी समस्त वृत्तियों को अपने मेंलीन कर लेता है |
| मदन मुरारी | कामदेव के भी सौंदर्य को मुग्ध करने वाले | समस्त ब्रह्मांड के सबसे आकर्षक और प्रियतम |
| रसिया | प्रेम रस में सराबोर व्यक्ति | भगवान श्रीकृष्ण जो प्रेम रस के सागर हैं |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"सावरिया नन्द किशोर हाँ किशोर मेरी साड़ी पे रंग डाल गायों..."
यहाँ भक्त बड़े ही प्रेमभरे उलाहने के साथ कह रही है कि हे नंदकुमार! तुमने मेरी साड़ी परी ऐसा रंग डाला है कि अब यह सामान्य नहीं रही।
"मैंने बोहत कहा एक न माना, बर जोरी करत रहा कन्हा..."
भक्त तर्क देती है कि मैंने उन्हें बहुत रोका, बार-बार निवेदन किया कि ऐसा मत करो, परंतु कान्हा ने एक न सुनी और अपनी हठ व प्रेम के वशीभूत होकर जबरन रंग डाल दिया।
"हरा लाल रंग नीला डाला, केसरिया पीला मतवाला..."
यह संसार विभिन्न रंगों (माया और गुणों) से भरा है, और प्रभु ने मेरे जीवन रूपी वस्त्र पर सभी प्रकार के दिव्य और मतवाले रंग डालकर इसे अलौकिक बना दिया है।
"वृन्दावन में होरी है, बरसाने में होरी है..."
होली का यह उत्सव केवल एक स्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्रज के हर कोने—वृंदावन, बरसाना, गोवर्धन, मानसी गंगा, यमुना तट और सभी मंदिरों में उमंग के साथ मनाया जा रहा है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के संदर्भ में श्रीमद्भागवत महापुराण और ब्रज की गोपियों के प्रेम प्रसंगों का स्मरण किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के होली प्रसंग पर यह प्रसिद्ध श्लोक ध्यान में रखना प्रासंगिक है:
सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)
"वेणुं क्वणतं अरविंददलायताक्षं बर्हावतंसमसिताम्बुदसुंदरांगम्।
कंदर्पकोटिलावण्यं विश्र्वं सुंदरंदराम्सं तं कृष्णमखिलात्मकमर्थयेऽहम् ॥
"
श्रीकृष्ण स्तुति / भागवत परंपरा
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | सांवरिया नंदकिशोर मेरी साड़ी पे रंग डाल गयो (Saavariya Nand Kishor Lyrics) |
|---|---|
| गायक / कलाकार | निकुंज कामरा (Nikunj Kamra) एवं अन्य पारंपरिक कलाकार |
| भाषा | ब्रजभाषा मिश्रित हिंदी |
| विषय / थीम | होली भजन, ब्रज की होली, कृष्ण भक्ति |
| मुख्य भाव | मधुर सख्य भाव, प्रेम, उल्लास और उत्सव |
| उपयुक्त अवसर | होली पर्व, फाल्गुन मास, संकीर्तन, भजन संध्या |
| संबंधित क्षेत्र | ब्रजमंडल (वृंदावन, बरसाना, गोवर्धन आदि) |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1: 'सांवरिया नंदकिशोर मेरी साड़ी पे रंग डाल गयो' भजन के मुख्य गायक कौन हैं?
इस भजन को आधुनिक संगीत और युवा शैली में लोकप्रिय बनाने का श्रेय युवा भजन गायक निकुंज कामरा (Nikunj Kamra) को जाता है, हालांकि यह पारंपरिक ब्रज लोकगीतों का ही एक उन्नत स्वरूप है।
Q2: इस भजन में ब्रज के किन-किन प्रमुख स्थलों का उल्लेख किया गया है?
इस भजन में वृंदावन, बरसाना, गोवर्धन, मानसी गंगा, यमुना तट, राधावल्लभ और राधारमण जैसे पवित्र धार्मिक स्थलों का उल्लेख किया गया है।
Q3: इस भजन को किस अवसर पर सबसे अधिक गाया जाता है?
यह भजन मुख्य रूप से होली के पावन पर्व, फाल्गुन मास के मेलों, और राधा-कृष्ण के मंदिरों में होने वाले सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों पर गाया जाता है।
Q4: इस भजन का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
आध्यात्मिक रूप से यह भजन जीव और परमात्मा के बीच के अनन्य प्रेम का प्रतीक है, जहां भगवान भक्त के जीवन को अपने दिव्य प्रेम के रंगों से सराबोर कर देते हैं।
Q5: क्या यह एक पारंपरिक भजन है?
हाँ, यह ब्रज की प्राचीन होली और रसिया गायन परंपरा पर आधारित एक पारंपरिक भावगीत है जिसे समय-समय पर विभिन्न कलाकारों ने अपनी शैली में गाया है।
Q6: इस भजन को गाते समय किन वाद्यों का प्रयोग किया जाता है?
इस भजन को ढोलक, मंजीरे, हारमोनियम, ढोल और छपेली जैसे पारंपरिक लोक वाद्यों के साथ बहुत आनंद के साथ गाया जाता है।
Q7: होली के भजनों का सनातन संस्कृति में क्या महत्व है?
होली के भजन समाज में प्रेम, भाईचारा, आनंद और उत्सव की भावना को जागृत करते हैं और हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हैं।
Q8: क्या इस भजन को घर पर परिवार के साथ गाया जा सकता है?
निश्चित रूप से, होली मिलन समारोहों, पारिवारिक सत्संगों और उत्सवों में इस भजन को सामूहिक रूप से गाना अत्यंत आनंददायक और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाला होता है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
भक्तिलोक (Bhaktilok.in) पर प्रकाशित यह सामग्री सनातन संस्कृति, ब्रज की लोक परंपराओं और श्री कृष्ण भक्ति साहित्य के गहन अध्ययन पर आधारित है। पाठकों की धार्मिक और सांस्कृतिक जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए इस लेख को प्रामाणिक तथ्यों और भक्ति रस के साथ तैयार किया गया है। यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रमाणित है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीकृष्ण लीला एवं ब्रज संस्कृति लोक साहित्य संग्रह
- श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध - रासलीला एवं होली प्रसंग)
- पारंपरिक ब्रज रसिया एवं फाग गीत संकलन
- निकुंज कामरा भजन प्रस्तुति एवं लोक संगीत परंपरा
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