🙏 फागुन के दिन चार होरी खेल मना रे – होली भजन
(Phagun Ke Din Char Hori Khel Mana Re) – Nirguni Holi Bhajan
📝 भजन विवरण
📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)
॥ स्थायी ॥
फागुन के दिन चार होरी खेल मना रे।
॥ अंतरा १ ॥
बिन करताल पखावज बाजे, अनहद की झंकार रे।
॥ अंतरा २ ॥
बिन सुर राग छतीसूं गावे, रोम रोम रंगसार रे।
॥ अंतरा ३ ॥
उड़त गुलाल लाल भए बादल, बरसत रंग अपार रे।
॥ अंतरा ४ ॥
घट के पट सब खोल दिए हैं, लोकलाज है डार रे।
॥ अंतरा ५ ॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल बलिहार रे।
🎵 निर्गुण होली भजन | मीरा भजन परंपरा
🙏 भजन का अर्थ और संदेश
यह निर्गुण कोटि का होली भजन है जो फागुन के इन चार दिनों को आध्यात्मिक होली के रूप में मनाने का संदेश देता है। "फागुन के दिन चार होरी खेल मना रे" – फागुन के ये चार दिन हैं, होली खेलकर मना ले।
"बिन करताल पखावज बाजे, अनहद की झंकार रे" – बिना करताल और पखावज के (बिना बाहरी वाद्यों के) अनहद (अनाहत) नाद की झंकार बज रही है। यह आंतरिक ध्वनि का प्रतीक है।
"बिन सुर राग छतीसूं गावे, रोम रोम रंगसार रे" – बिना सुर-राग के भी छत्तीसों राग गा रहे हैं और रोम-रोम रंग से सराबोर है।
"उड़त गुलाल लाल भए बादल, बरसत रंग अपार रे" – गुलाल उड़ रहा है, बादल लाल हो गए हैं, और अपार रंग बरस रहा है।
"घट के पट सब खोल दिए हैं, लोकलाज है डार रे" – हृदय (घट) के सारे पट (परदे) खोल दिए हैं, लोक लाज त्याग दी है। यह आत्मसमर्पण का भाव है।
"मीरा के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल बलिहार रे" – मीरा के प्रभु गिरधर नागर (कृष्ण) के चरण कमलों पर बलिहार है। यह मीरा की भक्ति परंपरा का स्मरण कराता है।
यह भजन बाहरी रंग-गुलाल से हटकर आंतरिक रंग, अनहद नाद और आत्मसमर्पण की होली का वर्णन करता है।
📖 निर्गुण भजन परंपरा
निर्गुण भजन वे भजन हैं जो निर्गुण ब्रह्म (बिना आकार-गुण वाले परमात्मा) की उपासना करते हैं। ये भजन प्रायः सूफी और संत परंपरा से जुड़े हैं। कबीर, नानक, रैदास, मीरा आदि ने ऐसे भजन रचे हैं।
इस भजन में वर्णित अनहद की झंकार उस आंतरिक ध्वनि का प्रतीक है जो योग-साधना से सुनी जा सकती है। घट के पट खोलना का अर्थ है हृदय के परदे हटाकर परमात्मा के दर्शन करना।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर का उल्लेख इस भजन को मीरा की भक्ति परंपरा से भी जोड़ता है। मीरा ने भी गिरधर गोपाल के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था।
🔍 भजन का विशेष महत्त्व
🔊 अनहद नाद
यह भजन हमें बाहरी वाद्यों से हटकर भीतर बजने वाली अनहद ध्वनि को सुनने की प्रेरणा देता है। सच्ची होली उस अनहद नाद में डूबकर मनाने की है।
🎨 रोम-रोम रंगसार
जब भक्त परमात्मा के रंग में रंग जाता है, तो उसका रोम-रोम रंग से सराबोर हो जाता है। यह आध्यात्मिक रंग बाहरी गुलाल से कहीं गहरा है।
🎯 संदेश : फागुन के ये चार दिन केवल बाहरी होली के नहीं हैं, बल्कि आंतरिक रंग में रंगने के हैं। जब हृदय के सारे पट खुल जाते हैं और लोकलाज त्याग दी जाती है, तब सच्ची होली खेली जाती है। मीरा के प्रभु गिरधर नागर के चरणों में बलिहारी जाने का यही अवसर है।