सनातन धर्म की समृद्ध संगीत और भजन परंपरा में आदिशक्ति मां भगवती की स्तुति का विशेष स्थान है। "गुण गाऊं तेरे जगजननी" (Gun Gaaun Tere Jagjanani) एक ऐसा ही अत्यंत भावपूर्ण, मधुर और हृदयस्पर्शी देवी गीत है, जो भक्त के हृदय में करुणा, समर्पण और अगाध श्रद्धा का संचार करता है। डॉ. सतीश चंद्र द्वारा रचित यह भजन जगत जननी मां दुर्गा के ममतामयी, कल्याणकारी और दुष्टनाशिनी स्वरूप को समर्पित है। इस भजन का मुख्य स्वर पूर्ण शरणागति और विनय का है, जहां एक साधक अपनी समस्त चिंताओं, विकारों और अहंकार को देवी मां के चरणों में अर्पित कर देता है। नवरात्रि के पावन दिनों, माता की चौकी, जगराता और दैनिक पूजा-अर्चना के समय इस भजन का गायन और श्रवण साधक को परम शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है। इस लेख में हम इस भजन के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और शास्त्रीय संदर्भों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
गुण गाऊं तेरे जगजननी
(स्थायी)
गुण गाऊं तेरे जगजननी, गुण गाऊं तेरे जगजननी।
जब तक सांस रहे इस तन में, महिमा गाऊं तेरी जननी॥
गुण गाऊं तेरे जगजननी...
(अंतरा - 1)
तू ही दुर्गा, तू ही काली, तू ही है शेरोंवाली।
तेरे दर से कोई न जाए, कभी भी खाली-खाली॥
झोली भर दे सबकी मैया, तू है संकट हरनी।
गुण गाऊं तेरे जगजननी...
(अंतरा - 2)
महिमा तेरी अपरम्पार है, तू ही जग का आधार है।
तेरे चरणों में जो आए, उसका बेड़ा पार है॥
भवसागर से पार उतारे, तू ही मंगल करनी।
गुण गाऊं तेरे जगजननी...
(अंतरा - 3)
भक्त जनों की रक्षा करती, दुष्टों का संहार करे।
अंधकार को दूर भगाकर, जीवन में प्रकाश भरे॥
ज्ञान और भक्ति का वर दे, हे दुष्टों की दलनी।
गुण गाऊं तेरे जगजननी...
(अंतरा - 4)
डॉ. सतीश शरण में आया, चरणों में शीश झुकाया।
अपनी दया की छाया कर दे, जिसने तुझको ध्याया॥
तेरी सेवा में जीवन बीते, हे ममता की धरनी।
गुण गाऊं तेरे जगजननी...
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन भक्त और भगवान के बीच के अनन्य संबंध को दर्शाता है। "गुण गाऊं तेरे जगजननी" का मुख्य भाव यह है कि जब तक इस नश्वर शरीर में प्राण हैं, तब तक भक्त की वाणी केवल और केवल मां भगवती की महिमा का गान करती रहे। हिंदू दर्शन में वाणी का सर्वोत्तम उपयोग ईश्वर की स्तुति माना गया है।
भजन के प्रथम भाग में भक्त मां से प्रार्थना करता है कि उसके जीवन का अंतिम क्षण भी मां की आराधना में ही व्यतीत हो। दूसरे भाग में मां के विभिन्न रूपों जैसे दुर्गा, काली और शेरोंवाली का स्मरण किया गया है। मां का दरबार ऐसा पावन स्थल है जहां से कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटता। मां अपनी असीम करुणा से सभी की झोलियां भर देती हैं और उनके कष्टों का निवारण करती हैं।
अंतिम चरणों में, भजनकार मां से भवसागर से पार उतारने की याचना करता है। संसार को एक विशाल और कठिन सागर माना गया है, जिसे पार करना केवल मां की कृपा से ही संभव है। यह भजन हमें सिखाता है कि सांसारिक सुखों की लालसा के बजाय हमें मां के चरणों में अनन्य भक्ति और ज्ञान की याचना करनी चाहिए।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस देवी गीत की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे अन्य भजनों से विशिष्ट और लोकप्रिय बनाती हैं:
- समर्पण भाव (शरणागति): यह भजन पूरी तरह से शरणागति के सिद्धांत पर आधारित है। भक्त अपने अस्तित्व को मां के चरणों में विलीन कर देता है।
- सरलता और मधुरता: डॉ. सतीश चंद्र ने बहुत ही सरल और सुबोध शब्दों का प्रयोग किया है, जिससे आम जनमानस भी इसे आसानी से गा और समझ सकता है।
- त्रिदेवी का समन्वय: यद्यपि यह मां दुर्गा को संबोधित है, परंतु इसमें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती तीनों के तेज का अनुभव होता है।
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार: इस भजन के नियमित श्रवण से मन के नकारात्मक विचार दूर होते हैं और घर में सुख-शांति का वातावरण बनता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि मां की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत फलदायी मानी गई है:
शुभ समय:
- नवरात्रि पर्व: चैत्र और शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में इस भजन का गायन विशेष फलदायी होता है।
- ब्रह्ममुहूर्त या संध्याकाल: सुबह 4 से 6 बजे के बीच या शाम को आरती के समय इसका पाठ करने से मानसिक शांति मिलती है।
- मंगलवार और शुक्रवार: ये दोनों दिन देवी साधना के लिए समर्पित हैं, अतः इन दिनों इस भजन का विशेष रूप से कीर्तन करना चाहिए।
गायन की विधि:
सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख घी का दीपक और धूप जलाएं। लाल रंग के आसन पर बैठकर पूर्ण एकाग्रता और श्रद्धा के साथ इस भजन का सस्वर गायन करें। गायन के समय मन में मां के ममतामयी रूप का ध्यान होना चाहिए।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन साक्षात् आदिशक्ति जगदम्बा को समर्पित है। देवीभागवत पुराण के अनुसार, आदिशक्ति ही इस ब्रह्मांड की आदि कारण हैं। वे ही सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करती हैं। इस भजन के रचयिता डॉ. सतीश चंद्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से मां के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा को व्यक्त किया है। उनकी रचनाओं में भक्ति रस की प्रधानता होती है, जो श्रोता को सीधे ईश्वर से जोड़ती है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
डॉ. सतीश चंद्र द्वारा रचित यह भजन आधुनिक काल की एक उत्कृष्ट भक्ति रचना है। इसकी पृष्ठभूमि उत्तर भारतीय लोक संगीत और शास्त्रीय सुगम संगीत के मिश्रण पर आधारित है। पंजाब और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में देवी जागरणों और चौकियों में इस भजन को अत्यंत चाव से गाया जाता है। इसकी लय और ताल ऐसी है कि यह सहज ही भक्तों को नृत्य करने और ताली बजाकर मां की महिमा गाने के लिए प्रेरित करती है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें कहीं-कहीं पंजाबी और ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर पुट देखने को मिलता है। इसकी काव्य शैली "पद" शैली है, जिसमें एक स्थायी और कई अंतरे होते हैं। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकार का सहज प्रयोग हुआ है। "संकट हरनी", "मंगल करनी", "दुष्टों की दलनी" जैसे विशेषण मां के विभिन्न कल्याणकारी रूपों को बहुत ही सुंदर ढंग से परिभाषित करते हैं।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि इसमें जीवन के गहरे आध्यात्मिक संदेश छिपे हैं:
- जीवन की नश्वरता का बोध: "जब तक सांस रहे इस तन में" पंक्ति हमें याद दिलाती है कि हमारा जीवन क्षणभंगुर है। इसलिए, जब तक हमारे पास समय है, हमें ईश्वर की भक्ति में लीन रहना चाहिए।
- अहंकार का त्याग: मां के चरणों में शीश झुकाना इस बात का प्रतीक है कि हमें अपने ज्ञान, धन और शक्ति के अहंकार को त्यागकर विनम्र बनना चाहिए।
- समानता का संदेश: "तेरे दर से कोई न जाए खाली" यह दर्शाता है कि मां की नजरों में अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं है। वे सभी पर समान रूप से कृपा करती हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| जगजननी | जगत को जन्म देने वाली माता | आदिशक्ति, जो संपूर्ण ब्रह्मांड की जननी हैं। |
| संकट हरनी | कष्टों को दूर करने वाली | भक्तों के जीवन के सभी विघ्न-बाधाओं को नष्ट करने वाली। |
| भवसागर | संसार रूपी समुद्र | जन्म और मृत्यु का चक्र, जिससे पार पाना कठिन है। |
| दुष्टों की दलनी | बुराइयों और राक्षसों का नाश करने वाली | मन के भीतर के काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों को समाप्त करने वाली। |
| ममता की धरनी | करुणा और प्रेम की देवी | वह माता जो अपने बच्चों को बिना किसी शर्त के प्रेम करती है। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"गुण गाऊं तेरे जगजननी, जब तक सांस रहे इस तन में..."
हे संपूर्ण जगत को उत्पन्न करने वाली माता! मैं जीवन के अंतिम क्षण तक केवल आपकी ही महिमा का गान करता रहूं। मेरी वाणी सदा आपके नाम से पवित्र होती रहे।
"तू ही दुर्गा, तू ही काली, तू ही है शेरोंवाली..."
आप ही दुष्टों का नाश करने वाली मां दुर्गा हैं, आप ही संहार की देवी महाकाली हैं और आप ही सिंह पर सवार होकर भक्तों को अभय प्रदान करने वाली शेरोंवाली माता हैं।
"तेरे दर से कोई न जाए, कभी भी खाली-खाली..."
जो भी भक्त आपके द्वार पर सच्ची श्रद्धा लेकर आता है, आप उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। आपके दरबार से कोई भी निराश होकर नहीं लौटता।
"महिमा तेरी अपरम्पार है, तू ही जग का आधार है..."
हे मां! आपकी महिमा का वर्णन करना किसी भी मनुष्य या देवता के लिए संभव नहीं है। आप ही इस संपूर्ण चराचर जगत का मुख्य आधार और शक्ति हैं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के गायन से पूर्व या पश्चात निम्नलिखित देवी मंत्रों का जाप करने से साधना का फल कई गुना बढ़ जाता है:
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥
अर्थ: हे नारायणी! आप सभी मंगलों में मंगल करने वाली हैं, कल्याणकारिणी हैं, पुरुषार्थ को सिद्ध करने वाली हैं और शरण में आए हुए भक्तों की रक्षा करने वाली हैं। आपको बारंबार नमस्कार है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | गुण गाऊं तेरे जगजननी (Gun Gaaun Tere Jagjanani) |
| समर्पित देवता | मां दुर्गा / आदिशक्ति जगदम्बा |
| रचयिता / कवि | डॉ. सतीश चंद्र |
| भाषा | सरल हिंदी (खड़ी बोली) |
| भक्ति का भाव | विनय, समर्पण और शरणागति भाव |
| उपयुक्त अवसर | नवरात्रि, दुर्गा पूजा, माता की चौकी, जगराता, दैनिक संध्या आरती |
| मुख्य संदेश | अहंकार का त्याग कर मां की शरण में जाना ही मोक्ष का मार्ग है। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और अर्थ को विभिन्न प्रामाणिक स्रोतों, पारंपरिक गायकों के उच्चारण और डॉ. सतीश चंद्र की मूल रचनाओं से मिलान करके तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक पूरी तरह से शुद्ध और त्रुटिहीन सामग्री पहुंचाना है ताकि उनकी साधना निर्विघ्न रूप से संपन्न हो सके।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्देवीभागवत पुराण - स्कंध १ से ९ (आदिशक्ति की महिमा और स्वरूप)
- पारंपरिक उत्तर भारतीय भजन संग्रह एवं लोक संगीत संकलन
- डॉ. सतीश चंद्र के मूल काव्य संग्रह और प्रकाशित भजन ग्रंथ
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