सनातन धर्म में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) का पर्व भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता का अनुपम उत्सव है। इस पावन अवसर पर गाए जाने वाले भजनों में "पूजा गोवर्धन की कर ले" (Pooja Goverdhan Ki Karle) का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। यह भजन न केवल ब्रज की पावन संस्कृति को जीवंत करता है, बल्कि जीवात्मा को परमात्मा के प्रति पूर्ण शरणागति और अनन्य भक्ति का मार्ग भी दिखाता है। उपासना मेहता, माया गोस्वामी एवं अन्य कलाकारों द्वारा गाए गए इस पारंपरिक भजन में संगीतकार बिन्नी नारंग के मधुर संगीत और देव तनेजा के कुशल संयोजन ने भक्ति रस को और अधिक सघन बना दिया है। इस विस्तृत लेख में हम इस भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, उसका गहरा आध्यात्मिक भावार्थ, शास्त्रीय संदर्भ और गोवर्धन पूजा के महत्व का सांगोपांग विवेचन करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ पूजा गोवर्धन की कर ले ॥
कोरस (मुखड़ा):
पूजा गोवर्धन की कर ले, मनवा पूजा गोवर्धन की कर ले।
गोवर्धन की पूजा करने से, बिगड़ी बात बन जाएगी तेरी,
पूजा गोवर्धन की कर ले, मनवा पूजा गोवर्धन की कर ले॥
अंतरा १:
गिरिराज धरण की महिमा भारी, पूजे इनको सब नर-नारी।
जो भी शरण में इनकी आए, खाली हाथ कभी न जाए।
मन की मुरादें पूरी कर ले, मनवा पूजा गोवर्धन की कर ले॥
अंतरा २:
इंद्र का मान घटाया जिसने, ब्रज का कष्ट मिटाया जिसने।
उंगली पे गिरिराज उठाया, लीलाधर ने खेल दिखाया।
चरणों में इनके तू ध्यान धर ले, मनवा पूजा गोवर्धन की कर ले॥
अंतरा ३:
छप्पन भोग सजे हैं सुंदर, अद्भुत झांकी सजी है भीतर।
दूध दही की नदियां बहतीं, सखियां मंगल गीत हैं गातीं।
भक्ति का रस तू भी चख ले, मनवा पूजा गोवर्धन की कर ले॥
अंतरा ४:
शरण पड़े की लाज बचाते, गिरिराज प्रभु सब कष्ट मिटाते।
'उपासना' मन में आस जगाए, 'माया' भी गुणगान सुनाए।
जीवन अपना सफल तू कर ले, मनवा पूजा गोवर्धन की कर ले॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह पावन भजन "पूजा गोवर्धन की कर ले" भक्त के मन को संबोधित करते हुए उसे सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर भगवान गिरिराज महाराज (गोवर्धन पर्वत) की शरण में जाने की प्रेरणा देता है। भजन का मुख्य संदेश यह है कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसकी सार्थकता केवल भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित होने में ही है।
भजन के प्रारंभ में भक्त अपने चंचल मन को समझाता है कि हे मन! तू व्यर्थ की चिंताओं और सांसारिक प्रपंचों को छोड़कर गिरिराज गोवर्धन की पूजा में लीन हो जा। गोवर्धन महाराज की कृपा से मनुष्य के जीवन के सभी बिगड़े हुए कार्य संवर जाते हैं और उसे परम शांति की प्राप्ति होती है। इसके बाद के अंतराओं में भगवान श्रीकृष्ण की उस अद्भुत बाल-लीला का स्मरण कराया गया है, जिसमें उन्होंने देवराज इंद्र के अहंकार को चूर-चूर कर दिया था और संपूर्ण ब्रजमंडल की रक्षा के लिए अपनी कनिष्ठिका उंगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत को धारण कर लिया था। यह घटना दर्शाती है कि जब संपूर्ण जगत हमारा साथ छोड़ देता है, तब केवल ईश्वर ही हमारी रक्षा करते हैं।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे सामान्य गीतों से अलग कर एक उच्च कोटि का आध्यात्मिक संकीर्तन बनाती हैं:
- शरणागति का संदेश: यह भजन जीव को सिखाता है कि भगवान की शरण में जाने के बाद किसी भी प्रकार का भय शेष नहीं रहता।
- प्रकृति और ईश्वर का एकात्म भाव: गोवर्धन पूजा वास्तव में प्रकृति की पूजा है। पर्वत, वृक्ष, गाय और जल के प्रति सम्मान व्यक्त करना ही इस भजन का अंतर्निहित संदेश है।
- अहंकार का मर्दन: इंद्र के मान-मर्दन की कथा के माध्यम से यह भजन मनुष्य को अपने भीतर के अहंकार को समाप्त करने की सीख देता है।
- सामुदायिक भक्ति: छप्पन भोग और मंगल गीतों का वर्णन ब्रज की सामूहिक उत्सवधर्मिता को दर्शाता है, जो समाज में समरसता फैलाती है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि भगवान के नाम का संकीर्तन किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर और विधियां शास्त्रों के अनुकूल मानी गई हैं:
- गोवर्धन पूजा (अन्नकूट पर्व): कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन सुबह या शाम के समय गोवर्धन महाराज की गोबर से बनी आकृति के समक्ष दीप जलाकर इस भजन को गाना अत्यंत फलदायी होता है।
- संध्या आरती के समय: दैनिक पूजा में भी इस भजन को गाया जा सकता है, जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- गायन की विधि: इस भजन को गाते समय हाथ में मंजीरा या करताल लेकर, सामूहिक रूप से ताली बजाते हुए गाना चाहिए। इससे मन एकाग्र होता है और कीर्तन का पूर्ण लाभ मिलता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण (गिरिराज धरण) को समर्पित है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, गोवर्धन पर्वत स्वयं श्रीकृष्ण का ही विग्रह रूप हैं। इसलिए गोवर्धन की पूजा साक्षात भगवान विष्णु की ही पूजा मानी जाती है। ब्रजमंडल के अष्टछाप कवियों जैसे संत सूरदास, कुंभनदास और रसखान ने भी गिरिराज महाराज की महिमा का गान किया है। यह भजन उसी महान संत परंपरा की आधुनिक और सुगम प्रस्तुति है जो जन-जन तक भक्ति रस पहुंचा रही है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की पृष्ठभूमि द्वापर युग की उस ऐतिहासिक घटना से जुड़ी है जब भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की रूढ़िवादी पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा करने के लिए प्रेरित किया था। इंद्र ने कुपित होकर ब्रज पर प्रलयंकारी वर्षा की, जिससे रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाए रखा। इस भजन में इसी अलौकिक लीला को अत्यंत सरल और सुरीले शब्दों में पिरोया गया है ताकि आधुनिक पीढ़ी भी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ सके।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
भजन की भाषा सरल, सुबोध और प्रवाहमयी खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा के मिठास भरे शब्दों का सुंदर सम्मिश्रण है। इसकी काव्य शैली "पद" और "संकीर्तन" विधा पर आधारित है। इसमें प्रयुक्त रूपक और उपमाएं (जैसे 'दूध दही की नदियां बहतीं') ब्रज के समृद्ध और आनंदमयी वातावरण का सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं। अंत्यानुप्रास अलंकारों के प्रयोग से यह भजन अत्यंत गेय और कर्णप्रिय बन पड़ा है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन केवल एक धार्मिक गीत नहीं है, बल्कि इसमें जीवन जीने के महत्वपूर्ण सूत्र छिपे हैं:
| जीवन सीख (Life Lesson) | आध्यात्मिक अर्थ (Spiritual Meaning) | दैनिक जीवन में उपयोगिता (Practical Application) |
|---|---|---|
| अहंकार का त्याग | इंद्र का गर्व भंग होना दर्शाता है कि ईश्वर के सामने अहंकार टिक नहीं सकता। | हमें अपनी शक्ति, धन या ज्ञान पर घमंड नहीं करना चाहिए। |
| प्रकृति संरक्षण | गोवर्धन पर्वत की पूजा पर्यावरण की रक्षा का प्रतीक है। | पेड़-पौधों, पर्वतों और जल स्रोतों का सम्मान व संरक्षण करना चाहिए। |
| सामूहिकता और एकता | सभी ब्रजवासियों ने मिलकर लाठियों का सहारा देकर पर्वत उठाने में सहयोग किया। | कठिन समय में समाज और परिवार को एकजुट होकर कार्य करना चाहिए। |
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| कठिन शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| गिरिराज धरण | पर्वतों के राजा (गोवर्धन) को धारण करने वाले (श्रीकृष्ण) | भगवान का वह रूप जो भक्तों की रक्षा के लिए कष्ट उठाता है। |
| मान घटाया | अहंकार को चूर करना / घमंड तोड़ना | इंद्र के झूठे अभिमान को नष्ट करने की लीला। |
| छप्पन भोग | 56 प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन | भगवान को अर्पित किया जाने वाला महाप्रसाद। |
| लीलाधर | अनेक अलौकिक लीलाएं करने वाले भगवान | श्रीकृष्ण का वह स्वरूप जो सृष्टि का संचालन खेल-खेल में करता है। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"पूजा गोवर्धन की कर ले, मनवा पूजा गोवर्धन की कर ले..."
हे मनुष्य! अपने चंचल मन को भगवान के चरणों में लगा और गोवर्धन महाराज की आराधना कर। इससे तेरे जीवन के सभी संकट दूर हो जाएंगे और बिगड़े काम बन जाएंगे।
"गिरिराज धरण की महिमा भारी, पूजे इनको सब नर-नारी..."
गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले प्रभु की महिमा अपरंपार है। उनकी शरण में आने वाले प्रत्येक भक्त की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है, कोई भी वहां से निराश नहीं लौटता।
"इंद्र का मान घटाया जिसने, ब्रज का कष्ट मिटाया जिसने..."
जब देवराज इंद्र ने अपने क्रोध से ब्रज को डुबाना चाहा, तब प्रभु ने अपनी उंगली पर पर्वत उठाकर सभी ब्रजवासियों और पशु-पक्षियों की रक्षा की और इंद्र के घमंड को नष्ट किया।
"छप्पन भोग सजे हैं सुंदर, अद्भुत झांकी सजी है भीतर..."
मंदिरों और घरों में भगवान के लिए छप्पन भोग सजाए गए हैं। चारों ओर आनंद का वातावरण है, सखियां मंगल गीत गा रही हैं। इस पावन अवसर पर तू भी भक्ति रस का आनंद ले।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
गोवर्धन पूजा के समय इस पावन श्लोक का उच्चारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है, जो इस भजन के भाव को और सुदृढ़ करता है:
"नमस्ते गिरिराजाय गोवर्धनधराय च।
नमो गोपालदेवाय जिमुतवाहनाय च॥"
अर्थ: पर्वतों के राजा गोवर्धन और उसे धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण को मेरा बारंबार नमस्कार है। गायों के रक्षक और मेघों के स्वामी भगवान गोपाल देव को मैं प्रणाम करता हूँ।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण (Field) | जानकारी (Details) |
|---|---|
| भजन का नाम | पूजा गोवर्धन की कर ले (Pooja Goverdhan Ki Karle) |
| मुख्य गायक | उपासना मेहता, माया गोस्वामी एवं अन्य |
| संगीतकार | बिन्नी नारंग |
| भाषा | हिंदी (ब्रज मिश्रित) |
| मुख्य विषय | गोवर्धन पूजा, श्रीकृष्ण लीला, शरणागति |
| उपयुक्त अवसर | गोवर्धन पूजा, अन्नकूट, कार्तिक मास, कृष्ण जन्मोत्सव |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। हमारी विद्वत मंडली और संपादकीय टीम ने श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और पारंपरिक ब्रज साहित्य के प्रामाणिक स्रोतों का अध्ययन कर इस भजन की व्याख्या और इसके आध्यात्मिक पहलुओं को आपके समक्ष प्रस्तुत किया है। इस भजन का मुख्य उद्देश्य सनातन धर्म के मानवीय और प्राकृतिक मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (गोवर्धन लीला प्रसंग)।
- विष्णु पुराण: पंचम अंश (इंद्र-कृष्ण संवाद)।
- ब्रज साहित्य: अष्टछाप कवियों के पारंपरिक पद और संकीर्तन संग्रह।
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