Punjabi Devi Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

सह नहीं पाईब माई तहरो बिदाई (Sah Nahi Payib Mai Taharo Bidai) - Khesari Lal Yadav Devi

खेसारी लाल यादव के भावपूर्ण देवी गीत 'सह नहीं पाईब माई तहरो बिदाई' के बोल और अर्थ जानें। नवरात्रि विसर्जन के समय भक्तों की श्रद्धा का अनूठा संगम।

शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर देवी दुर्गा की विदाई का क्षण हर भक्त के हृदय को झकझोर देने वाला होता है। भोजपुरी लोक संगीत और भक्ति परंपरा में प्रसिद्ध गायक खेसारी लाल यादव द्वारा गाया गया यह देवी गीत "सह नहीं पाईब माई तहरो बिदाई (Sah Nahi Payib Mai Taharo Bidai)" इसी विरह, करुणा और अगाध श्रद्धा की अभिव्यक्ति है। जब नौ दिनों की पूजा-अर्चना के बाद विजयादशमी के दिन माता दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है, तो भक्तों की आँखें नम हो जाती हैं। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं है, बल्कि यह एक पुत्र का अपनी ममतामयी माता के प्रति वह आर्तनाद है, जिसमें वह अपनी माँ को विदा करने की पीड़ा को सहन नहीं कर पा रहा है। सनातन धर्म में शक्ति की उपासना और फिर उनके विसर्जन की यह परंपरा आत्मा और परमात्मा के मिलन तथा प्रकृति के शाश्वत नियम को दर्शाती है। इस लेख में हम इस भावपूर्ण देवी गीत के बोल, उसका विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं का गहन विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

सह नहीं पाईब माई तहरो बिदाई

(मुखड़ा)
सह नहीं पाईब माई तहरो बिदाई हो,
रोवेले बालक तोहार हो माई...
कैसे विदा करीं तोहके ऐ जगजननी,
अँखिया से बहे लोर धार हो माई...
सह नहीं पाईब माई तहरो बिदाई हो...

(अंतरा - 1)
नौ दिन रखनी सजा के तोके अंगना,
गोदी में भर दऽ माई हमरो तू कंगना...
सूना लागेला अब तऽ घर-दुआर हो,
छोड़ के न जा माई हमार हो माई...
सह नहीं पाईब माई तहरो बिदाई हो...

(अंतरा - 2)
आँख से बहे लोर, मनवा बा उदास हो,
अगले बरस फिर अइहऽ माई हमरा पास हो...
तोहरे बिना जग लागे अंधकार हो,
करनीं पुकार बार-बार हो माई...
सह नहीं पाईब माई तहरो बिदाई हो,
रोवेले बालक तोहार हो माई...

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह देवी गीत अत्यंत कारुणिक और भक्ति रस से सराबोर है। इसके प्रत्येक अंतरे का भावार्थ नीचे विस्तार से समझाया गया है:

मुखड़े का भावार्थ:

गीत की शुरुआत में भक्त अपनी आराध्या, जगत जननी माँ दुर्गा से अत्यंत भावुक होकर कहता है कि "हे माता! मैं आपकी विदाई की इस पीड़ा को सहन नहीं कर पा रहा हूँ। आपका यह बालक आपके जाने के विचार मात्र से रो रहा है।" भक्त पूछता है कि "हे जगजननी! मैं आपको कैसे विदा करूँ? मेरी आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही है।" यहाँ भक्त और भगवान के बीच का संबंध एक छोटे बच्चे और उसकी माँ जैसा दिखाया गया है, जहाँ बच्चा अपनी माँ के आँचल को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।

प्रथम अंतरे का भावार्थ:

प्रथम अंतरे में भक्त कहता है कि "हे माँ! मैंने पूरे नौ दिनों तक अपने घर के आँगन को आपके स्वागत में सजाकर रखा। आपकी सेवा की, आपके नाम का संकीर्तन किया। अब जाते-जाते मेरी सूनी गोद को खुशियों से भर दीजिए। आपके जाने के बाद मेरा पूरा घर और आँगन सूना हो जाएगा। हे मेरी माँ! आप हमें छोड़कर मत जाइए।" यह पंक्तियाँ गृहस्थ जीवन में माता की कृपा और उनके जाने के बाद होने वाले सूनेपन को दर्शाती हैं।

द्वितीय अंतरे का भावार्थ:

दूसरे अंतरे में विदाई के अंतिम क्षणों का वर्णन है। भक्त कहता है कि "मेरी आँखों से लगातार आँसू बह रहे हैं और मेरा मन अत्यंत उदास है। हे माता! आपसे बस यही प्रार्थना है कि अगले वर्ष आप पुनः हमारे पास आइएगा। आपके बिना यह पूरा संसार अंधकारमय प्रतीत होता है। मैं बार-बार आपके चरणों में यही पुकार लगा रहा हूँ।" यह विसर्जन के समय की उस पारंपरिक प्रार्थना को दर्शाता है जिसमें भक्त माता से अगले वर्ष पुनः आने का वरदान मांगते हैं (अगले बरस तू जल्दी आ)।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत की मुख्य भावना 'करुण रस' और 'वात्सल्य भाव' है। भारतीय संस्कृति में देवी को केवल एक अमूर्त शक्ति नहीं, बल्कि साक्षात माता माना गया है। जब कोई बेटी या माता मायके से विदा होती है, तो जो पीड़ा परिवार को होती है, वही पीड़ा नवरात्रि के दसवें दिन भक्तों को माँ दुर्गा की विदाई के समय होती है।

यह गीत हमें यह संदेश देता है कि ईश्वर के प्रति हमारा संबंध केवल भय या याचना का नहीं होना चाहिए, बल्कि वह अत्यंत आत्मीय और प्रेमपूर्ण होना चाहिए। जब हम भगवान को अपने परिवार का सदस्य मान लेते हैं, तब उनकी विदाई पर ऐसा ही निश्छल प्रेम और अश्रुधारा प्रवाहित होती है। यह गीत भौतिक संसार की नश्वरता और आध्यात्मिक मिलन की निरंतरता को भी रेखांकित करता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण श्रेणी गीत की जानकारी (Song Details)
गीत का नाम सह नहीं पाईब माई तहरो बिदाई (Sah Nahi Payib Mai Taharo Bidai)
मुख्य गायक खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav)
गीत की श्रेणी भोजपुरी देवी गीत / विसर्जन भजन (Devi Geet / Visarjan Bhajan)
समर्पित देवता आदिशक्ति माँ दुर्गा (Goddess Durga)
मुख्य भाषा भोजपुरी (Bhojpuri)
मुख्य रस करुण रस, भक्ति रस (Karuna & Bhakti Rasa)
उपयुक्त अवसर नवरात्रि विसर्जन, विजयादशमी, देवी पूजा विदाई

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

यह गीत भोजपुरी फिल्म और संगीत उद्योग के शीर्ष कलाकार खेसारी लाल यादव द्वारा गाया गया है। खेसारी लाल यादव अपनी भावुक और उच्च स्वर-लहरी के लिए जाने जाते हैं। जब वे देवी गीतों को गाते हैं, तो उनकी आवाज में एक विशेष प्रकार की मिट्टी की सोंधी खुशबू और पारंपरिक भक्ति का पुट होता है। इस गीत के संगीतकार और गीतकार ने पारंपरिक भोजपुरी लोक धुनों का उपयोग किया है, जो सीधे श्रोताओं के हृदय को छूती हैं। ढोलक, मंजीरे और शहनाई की जुगलबंदी इस विदाई गीत को और अधिक मर्मस्पर्शी बना देती है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द (Bhojpuri Word) सरल हिंदी अर्थ (Hindi Meaning) संदर्भ / महत्व (Context)
पाईब पाऊँगा / सकूँगा असमर्थता व्यक्त करने के लिए
तहरो तुम्हारी / आपकी माता के प्रति आदरसूचक संबोधन
लोर आँसू (Tears) वियोग और विरह के अश्रु
अइहऽ आइयेगा अगले वर्ष पुनः आने का निमंत्रण
जगजननी जगत की माता (Mother of Universe) आदिशक्ति का एक नाम
दुआर द्वार / दरवाजा घर की चौखट जो माता के बिना सूनी है

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

सनातन धर्म में मूर्ति पूजा और विसर्जन का बहुत गहरा दार्शनिक महत्व है। हम मिट्टी से माता की प्रतिमा बनाते हैं, उसमें प्राण-प्रतिष्ठा के माध्यम से परमात्मा के चैतन्य रूप को आमंत्रित करते हैं, और नौ दिनों तक उनकी पूजा करते हैं। विजयादशमी के दिन, हम उस चैतन्य को पुनः अपने हृदय में स्थापित कर लेते हैं और मिट्टी की प्रतिमा को जल में विसर्जित कर देते हैं। यह प्रक्रिया हमें सिखाती है कि:

  • सृष्टि का चक्र: जो कुछ भी आकार लेता है, वह अंततः निराकार में विलीन हो जाता है।
  • अनासक्ति का पाठ: अत्यधिक प्रेम और सेवा करने के बाद भी, समय आने पर विदा करना ही पड़ता है। यह जीवन की नश्वरता और अनासक्ति का सबसे बड़ा पाठ है।
  • सांस्कृतिक एकता: भोजपुरी भाषी क्षेत्रों (बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड) में देवी विदाई के समय गाए जाने वाले ये गीत महिलाओं और पुरुषों को एक सामूहिक भावनात्मक सूत्र में बांधते हैं।

इस प्रकार के भजनों का श्रवण करने से मन शुद्ध होता है और सांसारिक दुखों से मुक्ति मिलती है। आप हमारी वेबसाइट पर देवी भजन संग्रह में ऐसे कई अन्य भावपूर्ण गीत भी सुन सकते हैं।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह देवी गीत हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:

  1. कृतज्ञता का भाव: माता ने हमें जो कुछ भी दिया है, उसके लिए उनके प्रति हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए।
  2. धैर्य और आशा: विदाई के समय दुःख अवश्य होता है, लेकिन यह आशा बनी रहती है कि माता अगले वर्ष पुनः आएँगी। इसी प्रकार जीवन के दुखों के बाद सुख का आगमन निश्चित है।
  3. निश्छल प्रेम: ईश्वर की साधना में चतुरता नहीं, बल्कि एक बच्चे जैसी निश्छलता होनी चाहिए।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यह गीत विशेष रूप से निम्नलिखित अवसरों पर गाया और सुना जाता है:

  • शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि के दसवें दिन (विजयादशमी): जब माता की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।
  • संध्या आरती के समय: नवरात्रि के दौरान घरों और पंडालों में विदाई की पूर्व संध्या पर।
  • पारिवारिक पूजा-अनुष्ठान: जब घर में सुख-शांति के लिए देवी जागरण या कीर्तन का आयोजन किया जाता है।

माता की आराधना के लिए आप नियमित रूप से श्री दुर्गा चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं, जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु संक्षिप्त विवरण
गीत का शीर्षक सह नहीं पाईब माई तहरो बिदाई
गायक खेसारी लाल यादव
मुख्य भाव वियोग, विदाई, करुणा, अगाध श्रद्धा
भाषा शैली सरल और कर्णप्रिय भोजपुरी लोक शैली
संबंधित देवी माँ दुर्गा, महालक्ष्मी, महासरस्वती
मुख्य संदेश माँ और पुत्र का अटूट संबंध

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस अत्यंत लोकप्रिय और भावुक देवी गीत के मुख्य गायक भोजपुरी फिल्म जगत के प्रसिद्ध अभिनेता और गायक खेसारी लाल यादव हैं।

यह गीत मुख्य रूप से नवरात्रि के अंतिम दिन यानी विजयादशमी (दशहरा) को माँ दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन और विदाई के समय बजाया और गाया जाता है।

इस गीत में मुख्य रूप से 'करुण रस' और 'भक्ति रस' की प्रधानता है। इसमें एक पुत्र का अपनी माता की विदाई पर होने वाला विरह और दुःख दर्शाया गया है।

देवी विसर्जन यह दर्शाता है कि ईश्वर निराकार से साकार रूप में हमारे बीच आते हैं और पुनः निराकार होकर हमारे हृदयों में बस जाते हैं। यह जीवन की नश्वरता का प्रतीक है।

हाँ, भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति के अनुसार इसे नवरात्रि के किसी भी दिन सुन सकते हैं, परंतु विसर्जन के दिन इसका महत्व और प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाता है।

भोजपुरी भाषा में 'लोर' का अर्थ 'आँसू' होता है। गीत में इसका उपयोग विदाई के समय बहने वाले अश्रुओं को दर्शाने के लिए किया गया है।

विदाई के समय माँ दुर्गा की आरती करनी चाहिए और उनसे जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।

इस गीत का संदेश है कि भगवान के प्रति हमारा प्रेम निश्छल और पारिवारिक होना चाहिए। माता हमेशा अपने बच्चों के साथ रहती हैं, विसर्जन केवल भौतिक रूप का होता है, उनकी कृपा सदैव बनी रहती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस समीक्षा का उद्देश्य भोजपुरी लोक भक्ति गीतों के माध्यम से सनातन धर्म की विसर्जन परंपरा और उसके दार्शनिक पक्ष को उजागर करना है। खेसारी लाल यादव का यह गीत लोक चेतना में रची-बसी उस मातृभक्ति को प्रदर्शित करता है जो हर सनातनी के हृदय में माँ दुर्गा के प्रति विद्यमान है। हमारी संपादकीय टीम ने इस गीत के बोलों की शुद्धता और उसके अर्थ की प्रामाणिकता को सुनिश्चित किया है ताकि पाठकों को सही और उच्च गुणवत्ता वाली जानकारी प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत पुराण - शक्ति उपासना और विसर्जन विधि।
  • पारंपरिक भोजपुरी लोक संगीत एवं नवरात्रि उत्सव परंपराएं।
  • भक्ति रस और भारतीय काव्यशास्त्र की विदाई परंपरा।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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