"माटी के मुर्तिया बोल देहिन" (Maati Ke Murtiya Bol Deehin) देवी भक्ति का एक अत्यंत भावुक और मर्मस्पर्शी भजन है, जिसे सुप्रसिद्ध गायक रविंदर सिंह ज्योति जी ने अपनी मधुर और भक्तिपूर्ण आवाज में गाया है। यह भजन मुख्य रूप से देवी दुर्गा (मां भगवती) की आराधना और उनके प्रति अटूट श्रद्धा को समर्पित है। इस भजन का मुख्य भाव 'वात्सल्य' और 'समर्पण' है, जिसमें एक निष्कपट भक्त अपनी मां से यह गुहार लगाता है कि काश मिट्टी की यह प्रतिमा जीवंत होकर बोल उठती। भारतीय सनातन परंपरा में 'साकार उपासना' का विशेष महत्व है, जहां मिट्टी, पत्थर या धातु की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा कर साक्षात ईश्वर का दर्शन किया जाता है। यह भजन इसी दार्शनिक और आध्यात्मिक अनुभूति को अत्यंत सरल और लोक-भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। नवरात्रि, देवी जागरण और माता की चौकी जैसे पावन अवसरों पर इस भजन का श्रवण और गायन भक्तों को एक अलौकिक शांति और मां के सामीप्य का अनुभव कराता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ माटी के मुर्तिया बोल देहिन ॥
माटी के मुर्तिया बोल देहिन,
माटी के मुर्तिया बोल देहिन,
मैं तेरे संग जी लेती हर एक पल...
मैया मोरी बोल देहिन, माटी के मुर्तिया बोल देहिन।
सोने के मुकुट मैया तोरे सिर सोहे,
लाल-लाल चुनरी मन को अति मोहे,
एक बार नयन खोल देहिन,
माटी के मुर्तिया बोल देहिन...
हाथों में त्रिशूल मैया दुष्टन को मारे,
भक्तन के काज मैया पल में संवारे,
अमृत रस घोल देहिन,
माटी के मुर्तिया बोल देहिन...
चरणों में तेरे मैया सारा जग हारा,
तू ही तो है मेरी नैया का सहारा,
भवसागर से पार कर देहिन,
माटी के मुर्तिया बोल देहिन...
बालक हैं हम तोरे शरण में आए,
झोली पसार के शीश झुकाए,
मैया मोरी आशीष दे देहिन,
माटी के मुर्तिया बोल देहिन...
माटी के मुर्तिया बोल देहिन,
मैं तेरे संग जी लेती हर एक पल...
मैया मोरी बोल देहिन, माटी के मुर्तिया बोल देहिन।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस सुंदर देवी गीत 'माटी के मुर्तिया बोल देहिन' में भक्त की उस पराकाष्ठा को दर्शाया गया है जहां वह जड़ और चेतन के भेद को मिटा देना चाहता है। भक्त कहता है कि हे मां! यदि मिट्टी की यह सुंदर प्रतिमा मुझसे बात करने लगे, तो मैं अपने जीवन का हर एक क्षण आपके साथ ही व्यतीत कर लूं। मुझे इस संसार के किसी अन्य सहारे की आवश्यकता नहीं रहेगी।
भजन के प्रथम भाग में मां के दिव्य रूप का वर्णन है। उनके मस्तक पर सोने का मुकुट सुशोभित है और उन्होंने लाल रंग की सुंदर चुनरी धारण की हुई है। भक्त मां से प्रार्थना करता है कि वे अपनी करुणामयी आंखें खोलें और अपने भक्त की ओर देखें। दूसरे भाग में मां की शक्ति और उनके संहारक व रक्षक रूपों की चर्चा की गई है। मां अपने हाथों में त्रिशूल धारण कर दुष्टों का नाश करती हैं और अपने भक्तों के बिगड़े काम पल भर में बना देती हैं। अंत में, भक्त स्वयं को मां का नादान बालक बताते हुए उनकी शरण में आता है और अपनी झोली फैलाकर आशीर्वाद की याचना करता है। यह भजन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति में कोई औपचारिकता नहीं होती, केवल हृदय का शुद्ध भाव और समर्पण ही पर्याप्त है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की मूर्ति पूजा और साकार साधना के पीछे छिपे गहरे विज्ञान को उजागर करता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- साकार ब्रह्म की उपासना: यह भजन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि एक भक्त के लिए मिट्टी की मूर्ति केवल मिट्टी नहीं, बल्कि साक्षात चैतन्य महाशक्ति का रूप है।
- सरल लोक-संस्कृति का प्रभाव: इसमें प्रयुक्त शब्द और शैली उत्तर भारतीय लोक-संस्कृति, विशेषकर भोजपुरी और पंजाबी देवी गीतों के प्रभाव को दर्शाती है, जो सीधे हृदय को छूती है।
- अनन्य शरणागति: भक्त अपनी समस्त चिंताओं को मां के चरणों में सौंपकर पूर्णतः निश्चिंत हो जाना चाहता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि मां भगवती की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर अत्यंत फलदायी माने गए हैं:
- शारदीय और चैत्र नवरात्रि: नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान इस भजन को सुबह या शाम की आरती के समय गाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके लिए आप नवरात्रि व्रत कथा का पाठ करने के बाद इस भजन का आनंद ले सकते हैं।
- माता की चौकी और जागरण: देवी जागरणों में इस भजन को गाकर भक्तगण भाव-विभोर हो उठते हैं।
- दैनिक पूजा: घर के मंदिर में मां दुर्गा की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाकर शांत मन से इस भजन का श्रवण करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन आदि शक्ति मां दुर्गा को समर्पित है। मां दुर्गा, जो शक्ति, करुणा, ममता और विजय की अधिष्ठात्री देवी हैं, उन्हीं के विभिन्न रूपों (जैसे शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा आदि) की स्तुति इस भजन के माध्यम से की जाती है। गायक रविंदर सिंह ज्योति ने अपनी अनूठी गायन शैली से इस भजन को जन-जन तक पहुंचाया है। उनकी आवाज में जो दर्द और पुकार है, वह भक्त को सीधे मां के दरबार से जोड़ देती है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की पृष्ठभूमि भारतीय लोक-भक्ति आंदोलन से प्रेरित है। भारत के ग्रामीण अंचलों में मिट्टी से मूर्तियां बनाने की प्राचीन परंपरा रही है। कुम्हार जब अपने हाथों से मिट्टी को आकार देकर मां की सुंदर प्रतिमा बनाता है, तो भक्त का हृदय उस कलाकृति में ईश्वर के साक्षात अंश को देखने लगता है। इसी पृष्ठभूमि पर आधारित होकर इस भजन की रचना की गई है, जो यह संदेश देती है कि ईश्वर सर्वव्यापी हैं और वे भक्त के भाव के भूखे हैं।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और लोक-भाषा (भोजपुरी मिश्रित हिंदी) है। इसमें प्रयुक्त अलंकार और रूपक बहुत ही सुंदर हैं। 'माटी के मुर्तिया' शब्द मानव शरीर की नश्वरता और मिट्टी से बने होने की ओर भी संकेत करता है। जैसे मिट्टी की मूर्ति में प्राण आने पर वह सुंदर और पूजनीय हो जाती है, वैसे ही मानव शरीर में जब तक ईश्वर की दी हुई सांसें हैं, तब तक इसका मूल्य है। इसकी काव्य शैली गेय है, जिसे आसानी से सामूहिक रूप से गाया जा सकता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
इस भजन से हमें कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और व्यावहारिक सीख मिलती हैं:
- श्रद्धा की शक्ति: यदि हमारी श्रद्धा सच्ची है, तो पत्थर और मिट्टी में भी भगवान प्रकट हो जाते हैं।
- अहंकार का त्याग: मां के सामने हमेशा एक छोटा बालक बनकर जाना चाहिए, क्योंकि बालक के प्रति मां का स्नेह असीम होता है।
- संसार की नश्वरता: जैसे मूर्ति मिट्टी की बनी है, वैसे ही हमारा शरीर भी मिट्टी का है। इसलिए हमें घमंड छोड़कर परोपकार और भक्ति के मार्ग पर चलना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| माटी के मुर्तिया | मिट्टी की मूर्ति | नश्वर शरीर या साकार रूप की प्रतीक |
| बोल देहिन | बोल उठती या बात करती | जड़ में चेतन का संचार होने की प्रार्थना |
| नयन खोल | आंखें खोलना | कृपा दृष्टि डालना |
| दुष्टन | बुरे लोग या आसुरी शक्तियां | मन के विकार (काम, क्रोध, लोभ) |
| भवसागर | संसार रूपी समुद्र | जन्म-मरण का चक्र |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"माटी के मुर्तिया बोल देहिन, मैं तेरे संग जी लेती हर एक पल..."
हे मां! यदि मिट्टी की यह सुंदर प्रतिमा मुझसे बात करने लगे, तो मैं इस संसार के प्रपंचों को छोड़कर अपना हर एक पल आपके चरणों में, आपके सानिध्य में व्यतीत कर दूं।
"सोने के मुकुट मैया तोरे सिर सोहे, लाल-लाल चुनरी मन को अति मोहे..."
हे जगत जननी! आपके मस्तक पर सोने का मुकुट अत्यंत शोभायमान है और आपकी लाल चुनरी मेरे मन को मोह लेती है। आपका यह दिव्य रूप अनुपम है।
"हाथों में त्रिशूल मैया दुष्टन को मारे, भक्तन के काज मैया पल में संवारे..."
आप अपने हाथों में त्रिशूल लेकर दुष्टों और पापियों का संहार करती हैं और अपने अनन्य भक्तों के सभी कष्टों को क्षण भर में दूर कर देती हैं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के गायन के पूर्व या पश्चात मां दुर्गा के इस सिद्ध मंत्र का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥
इसके अतिरिक्त, आप मां की स्तुति के लिए श्री दुर्गा चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं, जो जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाला है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | माटी के मुर्तिया बोल देहिन (Maati Ke Murtiya Bol Deehin) |
| मुख्य देवी/देवता | मां दुर्गा / आदि शक्ति भगवती |
| गायक | रविंदर सिंह ज्योति (Ravinder Singh Jyoti) |
| भाषा | भोजपुरी / लोक-भाषा |
| भक्ति का भाव | वात्सल्य, समर्पण, करुणा |
| उपयुक्त अवसर | नवरात्रि, माता की चौकी, जागरण, दैनिक पूजा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। हमारी विद्वान संपादकीय टीम ने इस भजन के आध्यात्मिक पहलुओं, लोक-संस्कृति पर इसके प्रभाव और इसके दार्शनिक अर्थों का गहन विश्लेषण कर इसे तैयार किया है। इस भजन के माध्यम से सनातन धर्म की साकार उपासना पद्धति को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जो पाठकों और भक्तों को मां दुर्गा की भक्ति में लीन होने की प्रेरणा देता है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - मां दुर्गा की महिमा और साकार उपासना प्रसंग।
- पारंपरिक उत्तर भारतीय लोक भजन संग्रह एवं मौखिक परंपराएं।
- रविंदर सिंह ज्योति के आधिकारिक भक्ति संगीत एल्बम।
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें