"करुणा सिंधु करुणा कीजिये" (Karuna Sindhu Karuna Kijiye) एक अत्यंत ही पावन, भक्ति रस से परिपूर्ण और शरणागति का भाव जगाने वाला गुरु भजन है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है। सनातन धर्म में सद्गुरु को भगवान का साक्षात स्वरूप माना गया है, जो जीवात्मा को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। यह भजन उसी करुणामयी सद्गुरु के चरणों में पूर्ण समर्पण और दया की याचना का जीवंत उदाहरण है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है। जब साधक संसार के दुखों, कष्टों और भवसागर से थक जाता है, तब वह गुरु चरणों में शरण लेकर "करुणा सिंधु करुणा कीजिये" कहकर पुकारता है। यह भजन विशेष रूप से गुरु पूर्णिमा, गुरुवार के व्रत, सत्संग, भजन संध्या और दीक्षा के अवसरों पर गाया जाता है। इसका भाव यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर गुरु और ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
करुणा सिंधु करुणा कीजिये,
मेरे गुरुवर दया कीजिये।
भवसागर में डूब रहा हूँ,
अब तो पार लगाइये।
करुणा सिंधु करुणा कीजिये,
मेरे गुरुवर दया कीजिये।
अज्ञान के अंधकार में,
जीवन मेरा भटक रहा।
ज्ञान का दीप जलाइये,
करुणा सिंधु करुणा कीजिये।
काम क्रोध मद लोभ में,
मन मेरा बहक रहा।
भक्ति का रस पिलाइये,
करुणा सिंधु करुणा कीजिये।
तेरे चरणों की शरण में,
मैं तो आया हूँ प्रभु।
अपना दास बनाइये,
करुणा सिंधु करुणा कीजिये।
जन्म जन्म का संग है,
अब तो कृपा कीजिये।
मोक्ष का मार्ग दिखाइये,
करुणा सिंधु करुणा कीजिये।
तुम बिन मेरा कौन है,
किसके द्वारे जाऊँ मैं।
अपने गले लगाइये,
करुणा सिंधु करुणा कीजिये।
दीन दयाल कृपालु हो,
करुणा के सागर हो।
भक्त वत्सल नाम है तेरा,
करुणा सिंधु करुणा कीजिये।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का मुख्य भाव सद्गुरु के प्रति पूर्ण शरणागति और उनकी असीम करुणा पर अटूट विश्वास है। "करुणा सिंधु" अर्थात करुणा का सागर — यह संबोधन सद्गुरु के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो अपने भक्तों के दुखों को देखकर स्वयं द्रवित हो जाते हैं। भजन का प्रारंभ ही इस पुकार से होता है कि हे गुरुवर, आप करुणा के सागर हैं, अब मुझ पर दया कीजिये। साधक स्वीकार करता है कि वह भवसागर में डूब रहा है और उसे पार लगाने वाला कोई नहीं है। यह भवसागर जन्म-मरण के चक्र का प्रतीक है, जिसमें जीव अपने कर्मों के बंधन में बंधा हुआ भटकता रहता है।
दूसरे अंतरे में साधक अपने अज्ञान की स्वीकारोक्ति करता है। अज्ञान का अंधकार वह अविद्या है, जिसके कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है और संसार को ही सब कुछ मान लेता है। सद्गुरु ही वह ज्ञान का दीप हैं, जो इस अंधकार को मिटाकर आत्मज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं। तीसरे अंतरे में काम, क्रोध, मद और लोभ — ये चारों विकार मनुष्य के मन को बहका देते हैं और उसे भक्ति मार्ग से विचलित कर देते हैं। इन विकारों से मुक्त होने का एकमात्र उपाय भक्ति रस का सेवन है, जिसे सद्गुरु ही प्रदान कर सकते हैं।
चौथे अंतरे में साधक पूर्ण समर्पण का भाव व्यक्त करता है — "तेरे चरणों की शरण में मैं तो आया हूँ प्रभु, अपना दास बनाइये।" यह दास्य भाव भक्ति के नवधा भक्ति मार्ग का एक महत्वपूर्ण अंग है। हनुमान जी और हरि भक्तों ने भी इसी दास्य भाव को अपनाया था। पाँचवें अंतरे में साधक जन्म-जन्म के संग की बात करता है, जो यह दर्शाता है कि जीव और गुरु का संबंध केवल इस जन्म का नहीं, बल्कि अनादि काल से चला आ रहा है। अंतिम अंतरों में साधक गुरु की भक्त वत्सलता और दीन दयाल स्वभाव की स्तुति करते हुए पुनः करुणा की याचना करता है। कुल मिलाकर यह भजन शरणागति, विनम्रता, आत्मसमर्पण और गुरु कृपा पर आधारित एक सर्वोच्च भक्ति गीत है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन सद्गुरु की महिमा और उनकी करुणा पर केंद्रित है। सनातन परंपरा में गुरु को "ब्रह्मा, विष्णु, महेश" का स्वरूप कहा गया है — "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः"। गुरु ही जीव को ईश्वर से मिलाते हैं और अज्ञान के बंधन से मुक्त करते हैं। इस भजन की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- शरणागति का भाव: भजन में साधक पूर्ण रूप से गुरु के चरणों में समर्पित हो जाता है।
- करुणा की याचना: "करुणा सिंधु" संबोधन गुरु की असीम दया को दर्शाता है।
- भवसागर से मुक्ति: भजन का मुख्य उद्देश्य जन्म-मरण के चक्र से पार उतरना है।
- विकारों से मुक्ति: काम, क्रोध, लोभ, मद से छुटकारा पाने की प्रार्थना।
- दास्य भाव: स्वयं को गुरु का दास मानकर विनम्रता प्रकट करना।
इस भजन को सुनने और गाने से मन में भक्ति भाव जागृत होता है, मन शांत होता है और साधक को जीवन की कठिनाइयों में धैर्य एवं विश्वास प्राप्त होता है। नियमित रूप से इस भजन का गायन करने से गुरु कृपा का अनुभव होता है और आत्मिक उन्नति होती है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन का गायन किसी भी शुभ अवसर पर किया जा सकता है, लेकिन कुछ विशेष समय और पर्व इसे और भी प्रभावी बनाते हैं:
- गुरु पूर्णिमा: यह सद्गुरु को समर्पित सर्वोच्च पर्व है, इस दिन यह भजन विशेष फलदायी माना जाता है।
- गुरुवार का व्रत: प्रत्येक गुरुवार को स्नान-ध्यान के बाद इस भजन का गायन करना शुभ होता है।
- प्रातःकाल: ब्रह्म मुहूर्त में या सुबह की पूजा के समय इस भजन को गाने से दिन शुभ होता है।
- संध्या काल: दीप प्रज्वलन के बाद आरती के समय इस भजन का गायन किया जा सकता है।
- सत्संग एवं भजन संध्या: सामूहिक भजन में इसका गायन विशेष आनंद देता है।
गायन विधि: सर्वप्रथम स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। गुरु चरणों में दीप, धूप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें। फिर हाथ जोड़कर विनम्र भाव से इस भजन का गायन आरंभ करें। गायन के समय मन को एकाग्र रखें और प्रत्येक शब्द के भाव में डूबें। भजन के बाद गुरु आरती अवश्य करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
"करुणा सिंधु करुणा कीजिये" भजन किसे समर्पित है?
यह भजन सद्गुरु (गुरु जी) को समर्पित है, जिन्हें करुणा का सागर मानकर उनसे दया की याचना की जाती है।
इस भजन का मुख्य भाव क्या है?
इस भजन का मुख्य भाव पूर्ण शरणागति, विनम्रता और गुरु कृपा पर अटूट विश्वास है।
क्या इस भजन को किसी विशेष दिन गाना चाहिए?
गुरु पूर्णिमा और गुरुवार को इसका गायन विशेष शुभ माना जाता है, परंतु इसे किसी भी शुभ दिन गाया जा सकता है।
इस भजन को गाने से क्या लाभ होता है?
मन को शांति, भक्ति भाव में वृद्धि, विकारों से मुक्ति और गुरु कृपा की प्राप्ति होती है।
क्या इस भजन का गायन घर में कर सकते हैं?
हाँ, घर के मंदिर या पूजा स्थल पर शुद्ध भाव से इसका गायन किया जा सकता है।
इस भजन में "भवसागर" का क्या अर्थ है?
भवसागर जन्म-मरण के चक्र का प्रतीक है, जिससे मुक्ति के लिए गुरु कृपा की याचना की जाती है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसमें भजन के मूल भाव, अर्थ एवं आध्यात्मिक महत्व को सनातन परंपरा और भक्ति साहित्य के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। भजन के बोल पारंपरिक गुरु भजन परंपरा पर आधारित हैं और इनका उद्देश्य साधकों में श्रद्धा, शरणागति एवं भक्ति भाव जागृत करना है। पाठकों से अनुरोध है कि वे भजन का गायन शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ करें।
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