Punjabi Devi Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

दे दी चंदा दू-चार पईसा (De Di Chanda Du Chaar Paisa) - Khesari Lal Yadav Devi Geet

खेसारी लाल यादव का लोकप्रिय भोजपुरी देवी गीत 'दे दी चंदा दू-चार पईसा' पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित संपूर्ण लोक भजन का आनंद लें।

देवी गीत / लोक भजन

चार पईसा (De Di Chanda Du Chaar Paisa) - खेसारी लाल यादव देवी गीत

प्रकाशन तिथि: सितंबर 2022 गायक: खेसारी लाल यादव श्रेणी: भोजपुरी देवी गीत

भोजपुरी लोक संगीत और शक्ति की साधना की समृद्ध परंपरा में 'दे दी चंदा दू-चार पईसा, माई के पंडाल खातिर' एक अत्यंत लोकप्रिय, ऊर्जावान और सांस्कृतिक रूप से गहराई से जुड़ा हुआ देवी गीत है। सुप्रसिद्ध लोक गायक और अभिनेता खेसारी लाल यादव द्वारा अपनी ओजस्वी तथा सुरीली आवाज में गाया गया यह भजन न केवल शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पवित्र दिनों में उत्तर भारत के गांवों और शहरों के चौराहों पर गूंजता है, बल्कि यह सनातन लोक-संस्कृति के उस सामूहिक भाव को भी जीवंत करता है जहाँ हर वर्ग का व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार माता के दरबार की सजावट और उत्सव में अपनी छोटी सी आहुति देना अपना परम सौभाग्य मानता है। इस गीत के बोल भले ही बेहद सरल और ठेठ भोजपुरी भाषा में हैं, परंतु इसका अंतर्निहित भाव समाज को एकजुट करने, भक्ति रस में सराबोर होने और माँ भगवती के प्रति अटूट समर्पण प्रदर्शित करने का है। भक्तिलोक के इस विस्तृत आलेख में हम इस पावन गीत के संपूर्ण लिरिक्स, उसके गहरे आध्यात्मिक व सांस्कृतिक अर्थ, गायन की परंपरा और लोक-जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का संपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

[मुखड़ा]

दे दी चंदा दू-चार पईसा, माई के पंडाल खातिर,
दे दी चंदा दू-चार पईसा, माई के पंडाल खातिर।
भक्तन के भीड़ बाटे, माई के दरबार में,
खुश होइहें शेरावाली, सब के निहाल में।

[अंतरा 1]

सज गईल पंडाल माई के, जगमग-जगमग ज्योति जगे,
भक्तन के मन में उमंग बा, माई के दर्शन खातिर जागे।
धूप-धुआर से महके अंगना, बाजे शहनाई सुहानी,
आइल बानी दर्शन करे, भारत देश के सानी।
दे दी चंदा दू-चार पईसा, माई के पंडाल खातिर...

[अंतरा 2]

बच्चा-बच्चा झूमे माई के, महिमा अपार बा,
कोई चढ़ावे चुनरी लाल, केहू चढ़ावे फूल हार बा।
छोट होखे या बड़ होखे, सब केहू सेवा में लागल बा,
माँ के चरणों में शीश झुका के, जीवन सफल बनावल बा।
दे दी चंदा दू-चार पईसा, माई के पंडाल खातिर...

[अंतरा 3]

खेसारी पुकारे माई, सुनीहा अरदास हमार,
भक्तन के संकट हर लीहा, कइ दीहा बेड़ा पार।
मिल जुल के सब कोई मिलकर, जयकारा लगाईब हो,
शेरावाली के दरबार में, हाजिरी लगाईब हो।
दे दी चंदा दू-चार पईसा, माई के पंडाल खातिर...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

'दे दी चंदा दू-चार पईसा' केवल एक आर्थिक सहयोग मांगने का गीत नहीं है, बल्कि यह भारतीय सनातन संस्कृति की उस सहयोगात्मक और सामूहिक उत्सवधर्मिता का प्रतीक है जो नवरात्रि के दौरान गाँव-गाँव और गली-मुहल्लों में देखने को मिलती है। इस भजन का विस्तृत भावार्थ निम्नलिखित आयामों को स्पष्ट करता है:

सामूहिक सहभागिता और लोक-संग्रह

गीत की पंक्तियाँ - "दे दी चंदा दू-चार पईसा, माई के पंडाल खातिर" - इस बात का द्योतक हैं कि माँ दुर्गा की आराधना केवल व्यक्तिगत पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण समाज को एक सूत्र में पिरोने का माध्यम है। पंडाल का निर्माण, मूर्तियों की स्थापना और अनुष्ठान का आयोजन किसी एक व्यक्ति के बूते की बात नहीं होती। इसमें हर साधारण और गरीब व्यक्ति भी अपनी छोटी सी राशि ('दू-चार पईसा') का योगदान देकर उस भव्य आयोजन का हिस्सा बन जाता है। यह लोक-सहयोग की भावना भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत है।

माता के दरबार में समानता का भाव

गीत में आगे कहा गया है कि "भक्तन के भीड़ बाटे, माई के दरबार में, खुश होइहें शेरावाली, सब के निहाल में।" माँ शेरावाली के दरबार में राजा और रंक, अमीर और गरीब का कोई भेद नहीं होता। जो भाव से दो पैसे भी पंडाल के लिए देता है, माता उसे भी उतना ही आशीर्वाद देती हैं जितना किसी बड़े दानी को। यह पंक्ति भक्तों के मन में संतोष और ऊर्जा का संचार करती है।

उत्सव का उल्लास और श्रद्धा

पंडाल की सजावट, जगमग ज्योति, धूप-धुआर और शहनाई की गूंज इस बात का संकेत है कि जब भक्त मिलकर उत्सव मनाते हैं तो धरती पर ही बैकुंठ जैसा वातावरण उत्पन्न हो जाता है। गायक खेसारी लाल यादव ने अपनी ठेठ शैली में इसी ग्रामीण और सांस्कृतिक परिवेश को सजीव कर दिया है, जिसे सुनकर हर श्रोता भक्ति भाव से भर जाता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • सांस्कृतिक जुड़ाव: यह गीत उत्तर भारत, विशेषकर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की उस पारंपरिक संस्कृति से जुड़ा है जहाँ युवा और बच्चे मिलकर दुर्गा पूजा समितियों का गठन करते हैं और घर-घर जाकर चंदा एकत्र करते हैं।
  • लोक-शैली का उत्कर्ष: खेसारी लाल यादव की लोक-गायन शैली इसमें चार चांद लगाती है, जिससे श्रوता सीधे तौर पर जुड़ महसूस करते हैं।
  • समर्पण और निष्कलंक भाव: यहाँ धन का दान अहंकार का प्रदर्शन नहीं, बल्कि आदिशक्ति के प्रति समर्पण का विनम्र प्रयास है।
  • सद्भावना और एकता: इस प्रकार के भजन जाति, वर्ग और आर्थिक ऊंच-नीच के बंधनों को तोड़कर समाज को एक मंच पर लाते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस प्रकार के लोक-भजनों और देवी गीतों का गायन और श्रवण विशेष अवसरों पर अत्यधिक आनंदित और ऊर्जावान अनुभव कराता है:

  • शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि: नवरात्रि के नौ दिनों में सुबह और शाम के समय जब पंडालों में आरती की तैयारी होती है, तब यह गीत विशेष रूप से बजाया जाता है।
  • चंदा एकत्र करते समय: जब युवा मंडलियाँ और बच्चे माता के स्वागत के लिए गाँव-मोहल्ले में सहयोग राशि एकत्र करते हैं, तब यह गीत उनका मुख्य प्रेरणास्त्रोत होता है।
  • जागरण और सांस्कृतिक संध्या: माता के जागरण, चौकी या सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत में वातावरण को जीवंत बनाने के लिए इसे गाया जाता है।
  • श्रवण विधि: इसे स्वच्छ मन से, माता के ध्यान में मलीन होकर और पूरी ऊर्जा के साथ सुना या गाया जाना चाहिए। आप चाहें तो दुर्गा सप्तशती पाठ के पश्चात भी ऐसे लोक गीतों का आनंद ले सकते हैं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity

इस भजन की अधिष्ठाता देवी माँ दुर्गा (शेरावाली / आदिशक्ति) हैं। हिंदू सनातन धर्म में आदिशक्ति माँ दुर्गा को संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा, चेतना और पालन-पोषण करने वाली माता माना गया है। नवरात्रि के नौ दिनों में उनके विभिन्न स्वरूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—की पूजा की जाती है। खेसारी लाल यादव द्वारा गाए गए इस गीत में माँ के उसी करुणामयी और वरदायिनी स्वरूप का स्मरण किया गया है जो अपने हर छोटे-बड़े भक्त की मनोकामना पूर्ण करती हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

भोजपुरी संगीत जगत में देवी गीतों की एक लंबी और समृद्ध परंपरा रही है। समय के साथ लोक-गीतों के पारंपरिक स्वरूप में आधुनिक संगीत का संलयन हुआ है। 'दे दी चंदा दू-चार पईसा' गीत इसी लोक-परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति है। इसे प्रसिद्ध गीतकारों द्वारा रचा गया है और भोजपुरी के सुपरस्टार गायक खेसारी लाल यादव ने अपनी विशिष्ट गायन शैली से इसे जन-जन तक पहुँचाया है। यह गीत इस बात का प्रमाण है कि कैसे लोक-जीवन की वास्तविक घटनाओं और त्योहारों की तैयारियों को सुंदर संगीत में पिरोया जा सकता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन ठेठ भोजपुरी लोक-भाषा में रचित है, जो उत्तर भारत के करोड़ों लोगों के हृदय की भाषा है। इसकी काव्य शैली सरल, सहज और गेय (प्रवाहयुक्त) है। इसमें शास्त्रीय जटिलताओं के स्थान पर लोक-जीवन के मुहावरों, शब्दों और सरलता का प्रयोग किया गया है। 'पईसा', 'माई', 'भक्तन', 'निहाल', 'दुआर' जैसे तद्भव और देशज शब्दों का प्रयोग इसे आम जनता के अत्यंत निकट ले आता है। यही कारण है कि बच्चा-बच्चा इन पंक्तियों को आसानी से गुनगुना लेता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • सहयोग की भावना: बड़ा कार्य अकेले नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक सहयोग से ही संभव होता है।
  • निसंकोच भक्ति: दान या सेवा का परिमाण मायने नहीं रखता, बल्कि उसके पीछे का पवित्र भाव और निष्ठा महत्वपूर्ण होती है।
  • उत्सवधर्मिता: जीवन के दुखों को भुलाकर सामूहिक उत्सवों में भाग लेना और आनंदित रहना भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है।
  • शरणागति: माँ के दरबार में सभी समान हैं; अतः अहंकार का त्याग करके शरण में जाना ही सच्चा मनुष्य धर्म है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पद सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / प्रसंग
चंदा सहयोग राशि / चंदा पंडाल के आयोजन के लिए एकत्र किया जाने वाला धन
पईसा पैसा / मुद्रा सामर्थ्य के अनुसार छोटी से छोटी राशि
माई माता / देवी आदिशक्ति जगदम्बा माँ दुर्गा
पंडाल अस्थाई मंडप / शिविर माँ की मूर्ति स्थापना स्थल
निहाल प्रसन्न / तृप्त / धन्य भक्तों की मनोकामना पूर्ण होना
धूप-धुआर धूप और अगरबत्ती का धुआँ पूजा-अर्चना का सुगंधित वातावरण

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"दे दी चंदा दू-चार पईसा, माई के पंडाल खातिर..."
यहाँ गायक समाज के हर व्यक्ति से आह्वान कर रहा है कि माता का पंडाल सजने जा रहा है, इसलिए अपनी इच्छा और सामर्थ्य के अनुसार दो-चार पैसे का योगदान देकर इस पुण्य कार्य में भागीदार बनो।

"सज गईल पंडाल माई के, जगमग-जगमग ज्योति जगे..."
माता का दरबार सजकर तैयार है, चारों तरफ दीपों और ज्योतियों की जगमगाहट है और भक्तों के मन में दर्शन की तीव्र उत्कंठा जाग उठी है।

"खेसारी पुकारे माई, सुनीहा अरदास हमार..."
गायक खेसारी लाल यादव अपने आराध्य के चरणों में प्रार्थना करते हैं कि हे माता! हमारे जैसे तमाम भक्तों की पुकार सुनना और सभी के जीवन को सुखमय बनाना।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस देवी गीत के गायन और श्रवण के साथ माँ दुर्गा के इन पावन मंत्रों का स्मरण करना अत्यंत फलदायी होता है:

सर्वमंगलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

आप चाहें तो संपूर्ण अनुष्ठान के लिए श्री दुर्गा चालीसा का पाठ भी कर सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम दे दी चंदा दू-चार पईसा (De Di Chanda Du Chaar Paisa)
गायक / कलाकार खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav)
संगीत शैली भोजपुरी देवी गीत / लोक भजन
भाषा भोजपुरी (Bhojpuri)
अधिष्ठाता देवी माँ दुर्गा / शेरावाली
मुख्य विषय नवरात्रि उत्सव, पंडाल निर्माण एवं लोक-सहयोग
भाव उल्लास, समर्पण, सामूहिक भक्ति
उपयुक्त अवसर शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि, माता जागरण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस लोकप्रिय भोजपुरी देवी गीत के गायक प्रसिद्ध लोक गायक और अभिनेता खेसारी लाल यादव हैं।

यह गीत मुख्य रूप से शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान, दुर्गा पंडालों की स्थापना और चंदा एकत्र करने के समय विशेष रूप से गाया व बजाया जाता है।

इस गीत का मुख्य संदेश समाज में आपसी सहयोग, सामूहिक उत्सवधर्मिता, और माता के दरबार में बिना किसी भेदभाव के अपनी सामर्थ्य के अनुसार सेवा अर्पित करना है।

हाँ, यह गीत उत्तर भारत (विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश) की उस लोक-संस्कृति का सजीव चित्रण करता है जहाँ लोग मिलकर दुर्गा पूजा का आयोजन करते हैं।

यह भजन ठेठ भोजपुरी भाषा में रचित और गाया गया है।

यह भजन शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा (शेरावाली) को समर्पित है।

धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से सामूहिक आयोजनों में सहयोग करना परस्पर प्रेम, भाईचारे और धर्म के प्रति निष्ठा को मजबूत करता है।

ऐसे लोकगीत श्रोताओं में उत्सव का उल्लास, सांस्कृतिक जुड़ाव और भक्ति का एक अनूठा संचार करते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिलोक पर प्रकाशित यह आलेख पारंपरिक लोक संगीत, भोजपुरी देवी गीतों और सनातन संस्कृति के समन्वय को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। गीत के बोल, उसका सांस्कृतिक महत्व और आध्यात्मिक संदर्भ पाठकों की प्रामाणिक जानकारी के लिए प्रस्तुत किए गए हैं। यह सामग्री पूरी तरह से संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसका उद्देश्य लोक-संस्कृति को संरक्षित करना और उसका सही भाव पाठकों तक पहुँचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पारंपरिक भोजपुरी लोक संगीत एवं नवरात्रि उत्सव परंपराएं।
  • क्षेत्रीय लोकगीत संग्रह एवं भजन संकलन।
  • सनातन देवी उपासना और लोक-संस्कृति के सांस्कृतिक आयाम।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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