bhakti gana bhojpuri mein मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

भोलेदानी के डमरुआ ( Bholedani Ke Damarua Lyrics in Hindi)

अंजलि भारद्वाज द्वारा गाए प्रसिद्ध शिव भजन 'भोलेदानी के डमरुआ' के संपूर्ण बोल और भावार्थ पढ़ें। सावन और कांवड़ यात्रा के लिए विशेष शिव भक्ति सामग्री।

सनातन धर्म में देवों के देव महादेव की आराधना का विशेष महत्व है, और जब बात सावन के पावन महीने की हो, तो कांवड़ यात्रा और शिव भजनों की गूंज से संपूर्ण सृष्टि शिवमय हो जाती है। भोजपुरी लोक संस्कृति में शिव भक्ति को अत्यंत सरल, सुगम और आनंदमयी रूप में प्रस्तुत किया गया है। सुप्रसिद्ध गायिका अंजलि भारद्वाज द्वारा गाया गया भजन "भोलेदानी के डमरुआ" (Bholedani Ke Damarua Lyrics in Hindi) इसी पावन परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह गीत भगवान शिव के औढरदानी (भोलेदानी) स्वरूप और उनके दिव्य वाद्य यंत्र 'डमरू' की ध्वनि से उत्पन्न होने वाले अलौकिक आनंद को समर्पित है। इस भजन में कांवड़ियों के उत्साह, देवघर की पावन यात्रा, और भगवान शिव के प्रति अनन्य समर्पण भाव को बहुत ही सुंदर शब्दों में पिरोया गया है। यह लेख इस भजन के संपूर्ण बोल, उसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ, सांस्कृतिक महत्व और शिव भक्ति के विभिन्न आयामों को विस्तार से प्रस्तुत करता है।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

भोलेदानी के डमरुआ (गीत के बोल)

(मुखड़ा)
भोलेदानी के डमरुआ बाजे झमाझम,
नाचेले देवघर में भक्त हरदम।
कांवर उठा के चलले शिव के दुअरिया,
बोला हर हर महादेव, गूंजे डगरिया।
भोलेदानी के डमरुआ बाजे झमाझम...

(अंतरा 1)
गंगा जी के जलवा भर के कांवरिया सजावेले,
गेरुआ रंग चोलवा पहिर के सब आवेले।
भोला जी के चरनन में शीश झुकावेले,
डमरू के बाजते ही मन हर्षावेले।
भोलेदानी के डमरुआ बाजे झमाझम...

(अंतरा 2)
भांग और धतूरा भोले बाबा के चढ़ावेले,
बेलपतर चंदन से बाबा के रिझावेले।
अंजलि भी गावे गीत महिमा अपार बा,
भोला जी के किरपा से बेड़ा ई पार बा।
भोलेदानी के डमरुआ बाजे झमाझम,
नाचेले देवघर में भक्त हरदम।

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह भजन भोजपुरी भाषा की मिठास और शिव भक्ति के रस से सराबोर है। इसके प्रत्येक अंतरे का भावार्थ अत्यंत गहरा और हृदय को छूने वाला है:

मुखड़े का भावार्थ: भजन की शुरुआत में गायिका कहती हैं कि औढरदानी भगवान शिव का डमरू अत्यंत मधुर और तीव्र गति से 'झमाझम' बज रहा है। इस दिव्य ध्वनि को सुनकर देवघर (वैद्यनाथ धाम) में उपस्थित सभी भक्त आनंदित होकर निरंतर नृत्य कर रहे हैं। भक्त अपने कंधों पर पवित्र कांवड़ उठाकर भगवान शिव के द्वार की ओर बढ़ रहे हैं। पूरी राह में केवल 'हर हर महादेव' का जयघोष गूंज रहा है, जिससे संपूर्ण मार्ग पवित्र और ऊर्जामयी हो गया है।

प्रथम अंतरे का भावार्थ: भक्त सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल भरकर अपनी कांवड़ को अत्यंत श्रद्धापूर्वक सजाते हैं। वे गेरुए रंग के वस्त्र (चोला) धारण करके बाबा के दरबार की ओर प्रस्थान करते हैं। जब वे देवघर पहुंचते हैं, तो बाबा भोलेनाथ के चरणों में अपना शीश झुकाकर अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। जैसे ही मंदिर परिसर में डमरू की आवाज गूंजती है, भक्तों का मन हर्ष और उल्लास से भर उठता है और उनकी सारी थकान दूर हो जाती है।

द्वितीय अंतरे का भावार्थ: शिव आराधना की पारंपरिक सामग्री का वर्णन करते हुए गायिका कहती हैं कि भक्त बाबा को प्रसन्न करने के लिए भांग, धतूरा, बेलपत्र और चंदन अर्पित करते हैं। गायिका अंजलि भारद्वाज स्वयं को शिव चरणों में समर्पित करते हुए कहती हैं कि बाबा की महिमा अनंत है और उनकी कृपा मात्र से ही इस संसार रूपी भवसागर से मनुष्य का बेड़ा पार हो जाता है।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस भजन की मुख्य भावना 'सख्य और समर्पण भाव' है। भोजपुरी लोकगीतों में भगवान को बहुत दूर की सत्ता न मानकर अपने परिवार का मुखिया या अत्यंत प्रिय मित्र माना जाता है। यही कारण है कि उन्हें 'भोलेदानी' कहकर पुकारा गया है, जो अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होकर मनचाहा वरदान दे देते हैं।

यह गीत संदेश देता है कि ईश्वर की भक्ति में कोई ऊंच-नीच या भेदभाव नहीं होता। जब भक्त गेरुआ वस्त्र धारण कर कांवड़ उठाता है, तो वह सांसारिक पहचान को भूलकर केवल 'शिव का दूत' बन जाता है। डमरू की ध्वनि इस बात का प्रतीक है कि जीवन में चाहे कितनी भी विषमताएं हों, ईश्वर की शरण में आते ही जीवन में आनंद का संगीत बजने लगता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण (Parameter) जानकारी (Information)
गीत का नाम (Song Name) भोलेदानी के डमरुआ (Bholedani Ke Damarua)
मुख्य गायिका (Singer) अंजलि भारद्वाज (Anjali Bhardwaj)
भाषा (Language) भोजपुरी (Bhojpuri)
श्रेणी (Category) भोजपुरी बोलबम भजन / कांवड़ गीत (Kanwar Geet)
मुख्य विषय (Theme) शिव भक्ति, देवघर यात्रा, डमरू की महिमा
संगीत शैली (Music Style) पारंपरिक भोजपुरी लोक संगीत (Folk Devotional)

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

इस भजन को अपनी सुमधुर आवाज से जीवंत करने का श्रेय भोजपुरी जगत की सुप्रसिद्ध भक्ति गायिका अंजलि भारद्वाज को जाता है। अंजलि भारद्वाज ने बहुत ही कम उम्र में अपनी शास्त्रीय और लोक गायकी के दम पर देश-विदेश में अपनी पहचान बनाई है। उनके गाए देवी गीत और बोलबम गीत उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में अत्यंत लोकप्रिय हैं। इस गीत में प्रयुक्त वाद्य यंत्रों, विशेषकर ढोलक, डमरू और मंजीरे का समन्वय श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर देता है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द (Word) सरल अर्थ (Meaning) संदर्भ (Context)
भोलेदानी शीघ्र प्रसन्न होकर दान देने वाले (शिव) भगवान शिव का एक उदार नाम
डमरुआ डमरू (भगवान शिव का वाद्य यंत्र) सृष्टि के नाद का प्रतीक
दुअरिया द्वार या चौखट बाबा वैद्यनाथ का मंदिर द्वार
डगरिया रास्ता या मार्ग कांवड़ यात्रा का पथ
चोलवा वस्त्र या चोला कांवड़ियों द्वारा पहना जाने वाला गेरुआ वस्त्र
बेलपतर बिल्वपत्र (बेल के पत्ते) शिव पूजा की मुख्य सामग्री
रिझावेले प्रसन्न करना या मनाना भक्तों द्वारा शिव को रिझाना

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

भगवान शिव का डमरू केवल एक वाद्य यंत्र नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय चेतना और सृजन का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार, जब सृष्टि का प्राकट्य हुआ, तब भगवान नटराज ने चौदह बार डमरू बजाया था, जिससे 'माहेश्वर सूत्राणि' यानी संस्कृत व्याकरण के आधारभूत स्वरों की उत्पत्ति हुई थी। इस प्रकार डमरू की ध्वनि को 'नाद ब्रह्म' माना गया है।

सावन के महीने में कांवड़ यात्रा का अत्यधिक महत्व है। भक्त मीलों पैदल चलकर, कष्ट सहकर गंगाजल लाते हैं और शिव का अभिषेक करते हैं। यह यात्रा अहंकार के विसर्जन और शारीरिक व मानसिक शुद्धि का माध्यम है। यह भजन इसी पावन यात्रा के दौरान भक्तों के उत्साह को बनाए रखने में संजीवनी का कार्य करता है। जब भक्त थकने लगते हैं, तो ऐसे ऊर्जावान भजन उनके भीतर पुनः नव-ऊर्जा का संचार कर देते हैं।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यद्यपि यह एक भक्ति गीत है, परंतु यह हमें व्यावहारिक जीवन के लिए भी कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  • समानता का भाव: कांवड़ यात्रा में सभी भक्त एक समान वस्त्र पहनते हैं और एक-दूसरे को 'बम' या 'कांवरिया' कहकर संबोधित करते हैं। यह समाज से जाति, वर्ग और प्रतिष्ठा के भेद को समाप्त करने का संदेश देता है।
  • कठिन परिस्थितियों में आनंद: कांवड़ यात्रा अत्यंत कठिन होती है, पैरों में छाले पड़ जाते हैं, परंतु डमरू की आवाज और शिव नाम का जाप भक्तों को आनंदित रखता है। यह सिखाता है कि जीवन के संघर्षों में भी सकारात्मकता और ईश्वर पर विश्वास बनाए रखना चाहिए।
  • सरलता और संतोष: भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किसी बहुमूल्य वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। वे केवल जल, बेलपत्र और जंगली फल (धतूरा) से भी प्रसन्न हो जाते हैं। यह हमें जीवन में सादगी और संतोष अपनाने की प्रेरणा देता है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यह भजन विशेष रूप से निम्नलिखित अवसरों पर गाया और सुना जाता है:

  • सावन मास (Shravan Month): सावन के पूरे महीने में मंदिरों, घरों और पंडालों में यह गीत गूंजता है।
  • कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra): सुल्तानगंज से देवघर के मार्ग पर कांवड़ियों के शिविरों में यह गीत अत्यंत लोकप्रिय है।
  • महाशिवरात्रि (Mahashivratri): शिव विवाह के पावन अवसर पर भगवान शिव की बारात और संकीर्तन में इस भजन पर भक्त झूमते हैं।
  • सोमवार व्रत पूजा: प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव की विशेष पूजा के उपरांत इस भजन का श्रवण मन को शांति प्रदान करता है।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु संक्षिप्त विवरण
गीत का शीर्षक भोलेदानी के डमरुआ
मुख्य आराध्य भगवान शिव (भोलेनाथ)
गायिका की शैली भोजपुरी लोक-भक्ति रस
प्रमुख वाद्य यंत्र डमरू, ढोलक, मंजीरा, पैड
मुख्य संदेश शिव की शरण में ही परम आनंद और मुक्ति है
संबंधित तीर्थ स्थल बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन भोजपुरी लोक संगीत की सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय भक्ति गायिका अंजलि भारद्वाज द्वारा गाया गया है।

'भोलेदानी' का अर्थ है अत्यंत भोले और शीघ्रता से दान (वरदान) देने वाले। भगवान शिव अपने भक्तों की थोड़ी सी पूजा और निष्कपट भाव से ही प्रसन्न होकर उन्हें मनचाहा फल दे देते हैं, इसलिए उन्हें भोलेदानी या औढरदानी कहा जाता है।

इस भजन में सावन मास में होने वाली प्रसिद्ध 'कांवड़ यात्रा' और झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की यात्रा का अत्यंत सजीव वर्णन किया गया है।

डमरू भगवान शिव का प्रिय वाद्य यंत्र है। इसकी ध्वनि को ब्रह्मांड का पहला नाद (ध्वनि) माना जाता है, जिससे सृष्टि का सृजन हुआ। इसकी ध्वनि मन को एकाग्र करने और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में सहायक होती है।

गेरुआ या केसरिया रंग वैराग्य, त्याग, पवित्रता और संकल्प का प्रतीक है। कांवड़ यात्रा के दौरान सांसारिक मोह-माया का त्याग कर पूर्णतः शिवमय होने के प्रतीक स्वरूप गेरुए वस्त्र धारण किए जाते हैं।

यह भजन अत्यंत ऊर्जावान और भक्ति रस से परिपूर्ण है। इसे सुनने से मन का तनाव दूर होता है, उत्साह का संचार होता है और भगवान शिव के प्रति श्रद्धा व भक्ति भाव प्रगाढ़ होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "भोलेदानी के डमरुआ" भजन के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस भजन के माध्यम से भोजपुरी लोक संस्कृति में रची-बसी शिव भक्ति की अनूठी परंपरा को उजागर किया गया है। यह सामग्री पूरी तरह से शोध पर आधारित है और इसमें लोक मान्यताओं के साथ-साथ शास्त्रीय संदर्भों का भी ध्यान रखा गया है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री - भक्तिकाल की समृद्ध लोक परंपराओं और आधुनिक भक्ति संगीत के समन्वय को दर्शाती एक विशेष प्रस्तुति।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत पुराण एवं शिव महापुराण (रुद्र संहिता)
  • भोजपुरी लोक साहित्य एवं पारंपरिक कांवड़ गीत संग्रह
  • वैद्यनाथ धाम (देवघर) की स्थानीय सांस्कृतिक परंपराएं

संबंधित भजन एवं लेख

यदि आप भगवान शिव की भक्ति से ओतप्रोत अन्य दिव्य रचनाओं का आनंद लेना चाहते हैं, तो हमारे निम्नलिखित लेख अवश्य पढ़ें:

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 08 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!