भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

मैया ओढ़ चुनरिया लाल के बैठी कर सोलह सिंगार (Maiya Odh Chunariya Lal Ke Bethi Kar Solha Shingaar)

मैया ओढ़ चुनरिया लाल के बैठी कर सोलह सिंगार भजन के बोल और अर्थ पढ़ें। माँ दुर्गा के इस दिव्य और मनमोहक भजन के माध्यम से भगवती की भक्ति में लीन हों।

"मैया ओढ़ चुनरिया लाल के बैठी कर सोलह सिंगार" यह अत्यंत ही पावन, मधुर और हृदयस्पर्शी भजन माँ दुर्गा की अनुपम छटा, उनके दिव्य स्वरूप और उनके अलौकिक सोलह श्रृंगार का सजीव चित्रण करता है। सनातन धर्म में माँ भगवती को आदि शक्ति, परम सौंदर्य, असीम करुणा और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। इस भजन के माध्यम से भक्त अपनी आराध्या के उस परम कल्याणकारी और ममतामयी स्वरूप का ध्यान करता है, जहाँ माँ लाल रंग की दिव्य चुनरी ओढ़े और सोलह श्रृंगार से सुसज्जित होकर अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए अपने भव्य दरबार में विराजमान हैं। यह भजन न केवल माँ के बाह्य सौंदर्य का काव्यात्मक वर्णन है, बल्कि यह जीवात्मा के उस परम समर्पण का भी प्रतीक है, जहाँ भक्त अपनी माँ के चरणों में स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर देता है। नवरात्रि, देवी जागरण, कीर्तन, और दैनिक पूजा-अर्चना के विशेष अवसरों पर इस भजन का गायन मन में अनन्य भक्ति का संचार करता है, साधक को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है और संपूर्ण वातावरण को देवीय तरंगों से भर देता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मैया ओढ़ चुनरिया लाल के बैठी कर सोलह सिंगार,

मैया ओढ़ चुनरिया लाल के बैठी कर सोलह सिंगार।

भक्तों की भीड़ लगी है भारी, दर्शन को आए नर-नार,

मैया ओढ़ चुनरिया लाल के बैठी कर सोलह सिंगार॥


माथे पर बिंदिया चमके प्यारी, कानों में कुंडल झमके भारी,

गले में मोतियों की माला, मुखड़ा है जैसे चाँद उजियारा,

हाथों में चूड़ियाँ खनके प्यारी, मैया की महिमा अपरम्पार,

मैया ओढ़ चुनरिया लाल के बैठी कर सोलह सिंगार॥


पैरों में पैजनिया बाजे, अंग-अंग में सिंदूर साजे,

हाथ में त्रिशूल विराजे, दुष्टों का संहार साजे,

सिंह की सवारी करके आई, जगदम्बा शेरावाली सरकार,

मैया ओढ़ चुनरिया लाल के बैठी कर सोलह सिंगार॥


नवरात्रों का पावन मेला, मैया का अद्भुत है रेला,

जो भी श्रद्धा से शीश झुकाए, मनवांछित फल वो नर पाए,

'भक्तिलोक' में गूंजे जयकारा, मैया कर दे बेड़ा पार,

मैया ओढ़ चुनरिया लाल के बैठी कर सोलह सिंगार॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस पावन भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और भक्ति रस से सराबोर है। यहाँ कवि और भक्त माँ भगवती के दिव्य और अलौकिक रूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे मैया! आप लाल रंग की अत्यंत सुंदर चुनरी ओढ़कर और पूर्ण सोलह श्रृंगार करके अपने दिव्य सिंहासन पर विराजमान हैं। लाल रंग सनातन धर्म में शक्ति, शौर्य, प्रेम और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। माँ का यह रूप भक्तों के हृदय में भय का नाश करता है और वात्सल्य का संचार करता है।

भजन के अगले भाग में भक्त कहता है कि माँ के इस अनुपम और मनोहारी रूप के दर्शन के लिए संसार के समस्त नर-नारी व्याकुल हैं और उनके मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है। माँ के मस्तक पर लगी दिव्य बिंदिया और कानों में झिलमिलाते कुंडल ब्रह्मांड के अंधकार को दूर करने वाले प्रकाश के समान हैं। उनके गले की मोतियों की माला और चंद्रमा के समान चमकता हुआ मुखमंडल भक्तों को असीम शांति प्रदान करता है।

अंतिम पंक्तियों में माँ के संहारक और रक्षक दोनों रूपों का सुंदर समन्वय है। एक ओर जहाँ माँ के पैरों में पैजनिया बज रही है और वे सिंह पर सवार होकर अत्यंत सौम्य और करुणामयी लग रही हैं, वहीं दूसरी ओर उनके हाथों में दुष्टों का दलन करने वाला त्रिशूल सुसज्जित है। यह इस बात का प्रतीक है कि माँ अपने भक्तों के लिए जितनी कोमल और दयालु हैं, धर्म की रक्षा के लिए उतनी ही उग्र और शक्तिशाली भी हैं। जो भी भक्त इस पावन नवरात्रि के समय श्रद्धापूर्वक माँ के चरणों में शीश झुकाता है, माँ उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं और उसका भवसागर से बेड़ा पार लगा देती हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह माँ दुर्गा की आराधना की एक संगीतमय साधना है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • सौंदर्य और शक्ति का समन्वय: इस भजन में माँ के ममतामयी सौंदर्य (चुनरी, बिंदिया, चूड़ियाँ) और उनकी अदम्य शक्ति (त्रिशूल, सिंह सवारी) का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है।
  • सोलह श्रृंगार का महत्व: सनातन परंपरा में सोलह श्रृंगार प्रकृति की पूर्णता और समृद्धि का प्रतीक है। माँ का यह रूप दर्शाता है कि वे संपूर्ण सृष्टि की स्वामिनी हैं।
  • सामूहिक भक्ति का भाव: "भक्तों की भीड़ लगी है भारी" जैसी पंक्तियाँ सामूहिक उपासना और संकीर्तन के महत्व को रेखांकित करती हैं, जिससे सामाजिक समरसता बढ़ती है।
  • शरणागति का संदेश: भजन का मूल संदेश माँ के चरणों में पूर्ण समर्पण है, जिससे साधक के अहंकार का नाश होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि माँ भगवती की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर और विधियां अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:

  • सर्वोत्तम समय: नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान सुबह और संध्या काल की आरती के समय इस भजन का गायन अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मंगलवार और शुक्रवार को भी इसका पाठ किया जा सकता है।
  • गायन की विधि: इस भजन को गाते समय मन में माँ के दिव्य स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। हाथों में ताली बजाकर और ढोलक-मंजीरे के साथ सामूहिक रूप से गाने पर इसका आध्यात्मिक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
  • पूजा की तैयारी: भजन शुरू करने से पहले माँ की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाएं, उन्हें लाल फूल और चुनरी अर्पित करें। इसके बाद पूर्ण श्रद्धा भाव से भजन का संकीर्तन करें।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन आदि शक्ति माँ दुर्गा (महिषासुर मर्दिनी, शेरावाली) को समर्पित है। माँ दुर्गा हिंदू धर्म में सर्वोच्च शक्ति की प्रतीक हैं, जो बुराई पर अच्छाई की विजय सुनिश्चित करती हैं। इस भजन की रचना पारंपरिक लोक-भक्ति शैली में की गई है, जिसका उद्देश्य जन-साधारण को अत्यंत सरल भाषा में माँ की महिमा से जोड़ना है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में गाए जाने वाले देवी गीतों में इस भजन का स्थान सर्वोपरि है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि लोक संस्कृति और देवी पूजा की समृद्ध परंपरा से जुड़ी है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में नवरात्रि के उत्सव के दौरान गाए जाने वाले पारंपरिक जस और भजनों से प्रेरित होकर इस गीत को आधुनिक रूप दिया गया है। यह भजन दर्शाता है कि कैसे सदियों से चली आ रही लोक भावनाएं आज भी हमारे आधुनिक जीवन में उतनी ही प्रासंगिक और जीवंत हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और मधुर हिंदी (खड़ी बोली) है, जिसमें अवधी और ब्रजभाषा के शब्दों का भी सुंदर पुट देखने को मिलता है। इसकी काव्य शैली वर्णनात्मक और गेय है। इसमें अनुप्रास और उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है, जैसे "मुखड़ा है जैसे चाँद उजियारा"। इसकी लयबद्धता इतनी सहज है कि एक बार सुनने मात्र से ही यह श्रोता के कंठ में बस जाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और व्यावहारिक सीख देता है:

  • आंतरिक और बाह्य पवित्रता: जैसे माँ सोलह श्रृंगार से सुसज्जित हैं, वैसे ही मनुष्य को भी अपने अंतःकरण को सद्गुणों (सत्य, करुणा, प्रेम) से सजाना चाहिए।
  • निर्भयता: माँ के हाथों में त्रिशूल और सिंह की सवारी हमें यह सिखाती है कि हमें जीवन की कठिनाइयों और बुराइयों का सामना निडरता से करना चाहिए।
  • समानता का भाव: माँ के दरबार में "नर-नार" सभी एक समान हैं, जो सामाजिक समानता और बंधुत्व का संदेश देता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
चुनरिया चुनरी या ओढ़नी सौभाग्य और सुरक्षा का दिव्य आवरण
सोलह सिंगार सोलह प्रकार के आभूषण व श्रृंगार प्रकृति की पूर्णता और दिव्य ऐश्वर्य
कुंडल कानों के आभूषण दिव्य वचनों को सुनने की एकाग्रता
पैजनिया पायल सृष्टि के कण-कण में गूंजने वाला दिव्य नाद
त्रिशूल तीन शूलों वाला अस्त्र सत्व, रज और तम तीनों गुणों पर नियंत्रण
बेड़ा पार भवसागर से मुक्ति मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"मैया ओढ़ चुनरिया लाल के बैठी कर सोलह सिंगार..."
माँ भगवती अपने भक्तों को आनंदित करने के लिए लाल रंग की दिव्य चुनरी ओढ़कर और पूर्ण सोलह श्रृंगार करके बैठी हैं। उनका यह रूप अत्यंत मनमोहक और कल्याणकारी है।

"माथे पर बिंदिया चमके प्यारी, कानों में कुंडल झमके भारी..."
माँ के मस्तक की बिंदिया ज्ञान के तीसरे नेत्र का प्रतीक है, और उनके कानों के कुंडल ब्रह्मांडीय ध्वनि (अनाहत नाद) को दर्शाते हैं।

"पैरों में पैजनिया बाजे, अंग-अंग में सिंदूर साजे..."
माँ के चरणों की ध्वनि से संपूर्ण सृष्टि में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, और उनका सिंदूरी रूप भक्तों को सौभाग्य प्रदान करता है।

"हाथ में त्रिशूल विराजे, दुष्टों का संहार साजे..."
माँ अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर हैं। उनका त्रिशूल हमारे भीतर के काम, क्रोध और लोभ जैसे शत्रुओं का नाश करता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन के पश्चात माँ दुर्गा के इस सिद्ध मंत्र का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है:

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हैं। आप कल्याणकारिणी, सब पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली और गौरी हैं। आपको हमारा बारंबार नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम मैया ओढ़ चुनरिया लाल के बैठी कर सोलह सिंगार
समर्पित देवी/देवता माँ दुर्गा / आदि शक्ति शेरावाली
मुख्य विषय देवी का दिव्य श्रृंगार और महिमा वर्णन
काव्य रस भक्ति रस, अद्भुत रस
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, दुर्गा पूजा, जागरण, कीर्तन
भाषा सरल हिंदी (लोक शैली)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश माँ दुर्गा के ममतामयी और शक्तिशाली स्वरूप के प्रति पूर्ण समर्पण है। यह हमें सिखाता है कि माँ अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहती हैं।

सोलह श्रृंगार प्रकृति की पूर्णता, समृद्धि और दिव्य ऐश्वर्य का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि माँ भगवती ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड की रचनाकार और स्वामिनी हैं।

यह भजन पारंपरिक लोक धुनों पर आधारित है। इसे बहुत ही सरल और कर्णप्रिय लय में गाया जाता है ताकि आम जनमानस भी इसमें आसानी से सम्मिलित हो सके।

नहीं, यद्यपि नवरात्रि में इसका महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है, परंतु आप अपनी दैनिक पूजा, मंगलवार, शुक्रवार या किसी भी पारिवारिक मांगलिक अवसर पर इसका गायन कर सकते हैं।

लाल रंग ऊर्जा, शक्ति, उत्साह और सौभाग्य का प्रतीक है। माँ को लाल चुनरी अत्यंत प्रिय है, जो भक्तों के जीवन में सकारात्मकता और सुरक्षा का संचार करती है।

भजन गाते समय मन में पूर्ण श्रद्धा, निष्काम भक्ति और एक बालक की भांति माँ के प्रति अनन्य प्रेम की भावना होनी चाहिए।

हाँ, श्रद्धापूर्वक इस भजन को सुनने से मन शांत होता है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।

त्रिशूल आदि भौतिक, आदि दैविक और आध्यात्मिक तापों के निवारण का प्रतीक है। यह हमारे आंतरिक विकारों को नष्ट करने की माँ की शक्ति को दर्शाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। हमारी विद्वत मंडली ने इस भजन के पाठ, इसके आध्यात्मिक अर्थ और शास्त्रीय संदर्भों की गहन समीक्षा की है। इस भजन का मुख्य उद्देश्य भक्तों को माँ दुर्गा के दिव्य स्वरूप के प्रति जागरूक करना और उनके हृदय में भक्ति रस का संचार करना है। यह सामग्री पूरी तरह से प्रामाणिक स्रोतों और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - माँ दुर्गा के स्वरूप और श्रृंगार का वर्णन।
  • सनातन धर्म की पारंपरिक लोक भजन संग्रह और मौखिक परंपराएं।
  • भक्तिलोक डिजिटल लाइब्रेरी - प्रामाणिक भजन पाठ और व्याख्या।

संबंधित भजन एवं लेख

यदि आपको यह भजन पसंद आया है, तो आप हमारे निम्नलिखित पावन लेखों और भजनों को भी पढ़ सकते हैं:

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!