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Panch Panch Panwa Ke [Full Song] Hey Mayee Rahsoowali

पढ़ें Panch Panch Panwa Ke [Full Song] Hey Mayee Rahsoowali - BhaktiLok का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलो

सनातन धर्म में आदिशक्ति माँ दुर्गा की आराधना के विविध रूप प्रचलित हैं। इन्हीं पावन रूपों में से एक अत्यंत जाग्रत और ममतामयी रूप है "माँ रहसोवाली" (Mayee Rahsoowali)। "पाँच पाँच पनवा के" (Panch Panch Panwa Ke) एक अत्यंत लोकप्रिय, पारंपरिक और भक्ति रस से सराबोर देवी गीत (भजन) है, जो विशेष रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और मिथिलांचल के क्षेत्रों में श्रद्धापूर्वक गाया जाता है। इस भजन में भक्त अपनी आराध्य देवी माँ रहसोवाली को अत्यंत सरल, सुलभ और पवित्र सामग्रियां जैसे पान के बीड़े, गंगाजल और पुष्प अर्पित कर उनके प्रति अपनी अनन्य निष्ठा और समर्पण भाव प्रकट करता है। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि जीवात्मा का परमात्मा के प्रति विरह, मिलन और पूर्ण शरणागति का जीवंत दस्तावेज है। इस लेख के माध्यम से हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और इससे जुड़ी पौराणिक पृष्ठभूमि का रसास्वादन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ पाँच पाँच पनवा के बीड़ा - माँ रहसोवाली भजन ॥

(मुखड़ा)
पाँच पाँच पनवा के बीड़ा लगवलियों, हे माई रहसोवाली!
अचरा पसारि वर मांगिला, हे माई रहसोवाली!
हो माई रहसोवाली, हे माई रहसोवाली...
पाँच पाँच पनवा के बीड़ा लगवलियों, हे माई रहसोवाली!

(अंतरा - १)
सोने के गढ़वा गंगा जल पानी, चरण पखारन अइली हे माई रहसोवाली!
चरण पखारि तोहार आरती उतारिला, हे माई रहसोवाली!
अचरा पसारि वर मांगिला, हे माई रहसोवाली!

(अंतरा - २)
लाल लाल चुनरी सितारा जड़ल बा, अंगिया सोहावन लागे हे माई रहसोवाली!
माथे मुकुट हाथे कंगन सोहे, रूप मनभावन लागे हे माई रहसोवाली!
अचरा पसारि वर मांगिला, हे माई रहसोवाली!

(अंतरा - ३)
नारियल चुनरी ध्वजा नारियल, भेंट चढ़ावे अइली हे माई रहसोवाली!
भक्तन के काज संवारो जननी, अरज लगावे अइली हे माई रहसोवाली!
अचरा पसारि वर मांगिला, हे माई रहसोवाली!

(अंतरा - ४)
कलयुग के संकट दूर करा माई, विपदा मिटावा मोरी हे माई रहसोवाली!
शरण तिहारी आए बालक तोहार, नैया पार लगावा हे माई रहसोवाली!
अचरा पसारि वर मांगिला, हे माई रहसोवाली!
हो माई रहसोवाली, हे माई रहसोवाली...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन लोक-संस्कृति और शास्त्रीय भक्ति का एक अद्भुत संगम है। इसमें भक्त अपनी आराध्य देवी माँ रहसोवाली से प्रार्थना करते हुए कहता है कि "हे माँ! मैंने आपके लिए श्रद्धापूर्वक पाँच-पाँच पत्तों के सुंदर पान के बीड़े तैयार किए हैं। मैं आपके चरणों में अपना आँचल पसारकर (अत्यंत दीन और विनम्र भाव से) आपसे कल्याण का वरदान मांगता हूँ।"

भजन के प्रथम अंतरे में भक्त कहता है कि सोने के कलश (गढ़वा) में पवित्र गंगाजल भरकर वह माँ के पावन चरणों को धोने के लिए आया है। चरणों को धोकर वह माँ की आरती उतारता है। दूसरे अंतरे में माँ के दिव्य और अलौकिक श्रृंगार का वर्णन है, जिसमें लाल चुनरी, माथे का मुकुट और हाथों के कंगन माँ की शोभा बढ़ा रहे हैं। तीसरे और चौथे अंतरे में भक्त नारियल, चुनरी और ध्वजा अर्पित करते हुए अपनी विपत्तियों को दूर करने और कलयुग के बंधनों से मुक्ति दिलाने की गुहार लगाता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व बहुआयामी है:

  • समर्पण का भाव: भजन में प्रयुक्त शब्द "अचरा पसारि" (आँचल फैलाकर) पूर्ण शरणागति और बालकवत निष्कपट भाव को दर्शाता है।
  • लोक-संस्कृति का संरक्षण: यह भजन भोजपुरी और मैथिली भाषी क्षेत्रों की समृद्ध लोक-परंपरा को जीवंत रखता है, जहां ईश्वर को परिवार के सदस्य की तरह आत्मीय मानकर पूजा जाता है।
  • पंचोपचार पूजन का प्रतीक: पान (ताम्बूल), गंगाजल (अर्घ्य), चुनरी (वस्त्र) और नारियल (श्रीफल) का अर्पण सनातन धर्म के पंचोपचार पूजन पद्धति का ही लोक-स्वरूप है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि माँ की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत फलदायी माने गए हैं:

  • शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि: नवरात्रि के पावन नौ दिनों में इस भजन का गायन करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • संध्या आरती के समय: प्रतिदिन संध्याकाल में माँ दुर्गा की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाकर इस भजन को गाने से मानसिक शांति मिलती है।
  • गायन विधि: इस भजन को ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम के पारंपरिक वाद्यों के साथ सामूहिक रूप से गाना चाहिए, जिससे कीर्तन का वातावरण निर्मित हो सके।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से माँ दुर्गा के स्थानीय और ममतामयी रूप माँ रहसोवाली को समर्पित है। लोक मान्यताओं के अनुसार, माँ रहसोवाली अपने भक्तों के कष्टों का हरण अत्यंत शीघ्रता से करती हैं। इस भजन के माध्यम से भक्त माँ के उसी करुणामयी रूप की वंदना करता है जो पार्वती स्तोत्र और अन्य वैदिक देवी स्तुतियों में वर्णित आदिशक्ति का ही सौम्य रूप हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की रचना किसी एक विशिष्ट आधुनिक कवि द्वारा नहीं, बल्कि लोक-परंपरा के अज्ञात साधकों द्वारा की गई है जो पीढ़ियों से मौखिक रूप से हस्तांतरित होती आ रही है। "रहसोवाली" शब्द का संबंध "रहस्य" या "रास" (दिव्य क्रीड़ा) से भी जोड़ा जाता है, जो यह दर्शाता है कि माँ अपने भक्तों के साथ अत्यंत आत्मीय और रहस्यमयी लीलाएं रचती हैं। इस लोकगीत को आधुनिक समय में कई प्रसिद्ध लोक गायकों ने अपनी आवाज देकर वैश्विक पहचान दिलाई है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और मिठास से भरी भोजपुरी-मैथिली मिश्रित लोकभाषा है। इसकी काव्य शैली "पद शैली" है जिसमें बार-बार "हे माई रहसोवाली" के टेक (refrain) का प्रयोग किया गया है। यह टेक श्रोताओं और गायकों को एक गहरे ध्यान और तन्मयता की स्थिति में ले जाता है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सहज प्रयोग देखने को मिलता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख प्रदान करता है:

  1. सरलता ही सच्ची भक्ति है: ईश्वर को रिझाने के लिए महंगे उपहारों की नहीं, बल्कि श्रद्धा से अर्पित किए गए एक पत्ते (पान) और जल की आवश्यकता होती है।
  2. अहंकार का त्याग: "अचरा पसारना" यह सिखाता है कि भगवान के सामने हमें अपने समस्त सामाजिक और आर्थिक अहंकार को त्यागकर एक याचक की भांति जाना चाहिए।
  3. धैर्य और विश्वास: कलयुग के संकटों के बीच केवल माँ की शरण ही एकमात्र सहारा है, जो हमें जीवन रूपी भवसागर से पार उतार सकती है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

कठिन शब्द/वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
पनवा के बीड़ा पान का बीड़ा (ताम्बूल) आदर और सत्कार का प्रतीक, जो पूजा में देवी को अर्पित किया जाता है।
अचरा पसारि आँचल फैलाकर पूर्ण दीनता, समर्पण और याचना का भाव।
गढ़वा कलश या लोटा पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक पात्र।
पखारन धोना या प्रक्षालन करना चरणों की सेवा और शुद्धि का भाव।
विपदा कष्ट या संकट सांसारिक और आध्यात्मिक बाधाएं।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"पाँच पाँच पनवा के बीड़ा लगवलियों..." - भक्त कहता है कि हे माँ, मैंने आपके स्वागत में पाँच पान के पत्तों का सुंदर बीड़ा सजाया है। मैं आपके सामने अपना आँचल फैलाकर जीवन के कल्याण का वरदान मांग रहा हूँ।

"सोने के गढ़वा गंगा जल पानी..." - हे माँ रहसोवाली! मैं सोने के कलश में पवित्र गंगाजल लेकर आया हूँ ताकि आपके सुकोमल चरणों को धो सकूँ। आपके चरणों को धोकर मैं आपकी पावन आरती उतारना चाहता हूँ।

"लाल लाल चुनरी सितारा जड़ल बा..." - माँ के दिव्य रूप का वर्णन करते हुए भक्त कहता है कि आपकी लाल रंग की चुनरी जिस पर चमकीले सितारे जड़े हैं, वह अत्यंत सुशोभित हो रही है। आपके माथे का मुकुट और हाथों के कंगन आपके इस मनभावन रूप को और भी अलौकिक बना रहे हैं।

"कलयुग के संकट दूर करा माई..." - इस अंतिम भाग में भक्त प्रार्थना करता है कि हे जगत जननी! इस कलयुग में चारों ओर फैले अंधकार, संकट और दुखों से मेरी रक्षा करें। मैं आपकी शरण में आया हूँ, मेरी जीवन नैया को पार लगाएं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन के पश्चात या पूर्व माँ दुर्गा के इस सिद्ध मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है, जो इस भजन के भाव को और सुदृढ़ करता है:

"सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥"

अर्थ: जो शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी और नारायण की शक्ति हैं, उन कल्याणमयी देवी को नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण बिंदु महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम पाँच पाँच पनवा के (Panch Panch Panwa Ke)
समर्पित देवी माँ रहसोवाली (आदिशक्ति माँ दुर्गा का रूप)
भाषा भोजपुरी / मैथिली (पूर्वी लोकभाषा)
मुख्य रस/भाव भक्ति रस, वात्सल्य और समर्पण भाव
गायन का विशेष अवसर नवरात्रि, पारिवारिक मांगलिक कार्य, संध्या आरती
संबंधित आरती संदर्भ ॐ जय जगदीश हरे आरती की भांति ही यह लोक-आरती के रूप में प्रसिद्ध है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

माँ रहसोवाली आदिशक्ति माँ दुर्गा का ही एक ममतामयी और जाग्रत लोक-रूप हैं। इनका संबंध मुख्य रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों की लोक-आस्था से है, जहां इन्हें कुलदेवी और रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है।

सनातन धर्म में 'पाँच' की संख्या को अत्यंत शुभ और पंचतत्वों का प्रतीक माना गया है। पाँच पान के पत्तों का अर्पण माँ के प्रति पंचप्राणों के समर्पण को दर्शाता है।

हाँ, इस भजन को किसी भी शुभ कार्य, गृह प्रवेश, पारिवारिक पूजा या प्रतिदिन संध्या आरती के समय श्रद्धापूर्वक गाया जा सकता है।

इस भजन के श्रवण से मन को असीम शांति मिलती है, घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और साधक में भक्ति भाव का उदय होता है।

इसका अर्थ है "अपने आँचल को फैलाकर वरदान मांगना"। यह भारतीय संस्कृति में अत्यंत विनम्रता और पूर्ण विश्वास के साथ याचना करने का पारंपरिक तरीका है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को पारंपरिक लोक गायकों, प्रामाणिक लोक साहित्यों और सनातन धर्म की पूजन पद्धतियों के आधार पर संकलित और विश्लेषित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और प्रामाणिक भक्ति रस पहुंचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - देवी महिमा खंड
  • लोक साहित्य एवं पारंपरिक भोजपुरी देवी गीत संग्रह
  • सनातन धर्म की पंचोपचार एवं षोडशोपचार पूजन पद्धति

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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