bhakti gana bhojpuri mein मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

छठ के बरत कईसे सईया होला

पढ़ें छठ के बरत कईसे सईया होला का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

छठ महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोक आस्था, प्रकृति पूजा, शुचिता और पारिवारिक समरसता का एक जीवंत महायज्ञ है। इस पावन अवसर पर गाए जाने वाले पारंपरिक और आधुनिक भोजपुरी लोकगीत इस व्रत की महिमा को जन-जन तक पहुँचाने का मुख्य माध्यम हैं। ऐसा ही एक अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण गीत है "छठ के बरत कईसे सईया होला" (Chhath Ke Barat Kaise Saiya Hola), जिसे सुप्रसिद्ध लोक गायक गोलू गोल्ड और अंतरा सिंह प्रियंका ने अपने मधुर स्वरों से सजाया है। यह गीत एक नवविवाहिता गृहस्थ स्त्री की उस व्याकुलता, श्रद्धा और समर्पण को दर्शाता है, जहाँ वह अपने पति से छठ व्रत की अत्यंत कठिन एवं पवित्र विधियों को समझने की जिज्ञासा प्रकट करती है। भोजपुरी लोक संस्कृति में यह गीत पति-पत्नी के बीच के सामंजस्य, संयुक्त परिवार की भूमिका और सूर्य देव व छठी मैया के प्रति अटूट विश्वास का अनुपम प्रतीक है। इस विस्तृत लेख में हम इस लोकप्रिय गीत के बोल, उसका गहरा आध्यात्मिक व व्यावहारिक भावार्थ, छठ महापर्व की शास्त्रीय पृष्ठभूमि और लोक संगीत में इसके महत्व का सांगोपांग विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

छठ के बरत कईसे सईया होला (भोजपुरी छठ गीत)

छठ के बरत कईसे सईया होला, हमके बतावा ए सईया,
का-का लागेला सामान, कइसे करीं हम पूजन, हमके बतावा ए सईया।

नहाय-खाय से सुरु होला, खरना के दिन आवेला,
सांझा के अरघिया सईया, डूबते सूरज के चढ़ावेला।

भोर के अरघिया सईया, उगते सूरज के मनावेला,
छठ मैया के कृपा से, घरवा में सुख-शांति आवेला।

दउरा सजाईब सूप ले आईब, घाट पे हम जाईब,
अन्न-जल तियागी के, निर्जला व्रत हम करीं सईया।

छठ के बरत कईसे सईया होला, हमके बतावा ए सईया...
का-का लागेला सामान, कइसे करीं हम पूजन, हमके बतावा ए सईया।

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह गीत भोजपुरी लोक मानस की सहजता और धार्मिक निष्ठा को अत्यंत खूबसूरती से अभिव्यक्त करता है। गीत की प्रत्येक पंक्ति में छठ व्रत की शास्त्रीयता और लोक परंपरा का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। आइए इसके विस्तृत भावार्थ को समझते हैं:

प्रथम अंतरा: व्रत की जिज्ञासा और पति से संवाद

गीत की शुरुआत में नवविवाहिता अपने पति से अत्यंत आदर और प्रेमपूर्वक पूछती है कि "हे स्वामी! छठ का यह महान व्रत कैसे किया जाता है? मुझे इसकी पूरी विधि समझाइए। इस पूजन में कौन-कौन सी सामग्रियां लगती हैं और पूजा की सही पद्धति क्या है?" यह प्रश्न केवल एक भौतिक जिज्ञासा नहीं है, बल्कि यह उस नववधू की जिम्मेदारी और अपनी ससुराल की कुल-परंपरा को आगे बढ़ाने की पवित्र इच्छा को दर्शाता है। वह चाहती है कि इस कठिन व्रत में कोई त्रुटि न हो, इसलिए वह अपने जीवनसाथी को इस यात्रा में अपना मार्गदर्शक बनाती है।

द्वितीय अंतरा: नहाय-खाय और खरना का महत्व

आगे के अंश में व्रत के प्रारंभिक चरणों का वर्णन है। पति अपनी पत्नी को समझाते हुए कहता है कि यह व्रत अत्यंत कठिन है, जो चार दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत 'नहाय-खाय' से होती है, जिसमें तन और मन की शुद्धि के लिए पवित्र स्नान के बाद सात्विक भोजन (कद्दू-भात) ग्रहण किया जाता है। इसके अगले दिन 'खरना' आता है, जिसमें दिनभर निर्जला उपवास रखकर शाम को मिट्टी के नए चूल्हे पर गुड़ और अरवा चावल की खीर तथा रोटी का प्रसाद बनाया जाता है। इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद से ही छत्तीसगढ़ का मुख्य 36 घंटे का निर्जला उपवास प्रारंभ होता है।

तृतीय अंतरा: अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य को अर्घ्य

गीत में आगे छठ पूजा के सबसे अनूठे पहलू का वर्णन है—डूबते और उगते सूर्य की आराधना। पति बताता है कि तीसरे दिन की शाम को 'सांझ का अर्घ्य' दिया जाता है, जहाँ अस्ताचलगामी (डूबते हुए) सूर्य देव को अर्घ्य देकर उनकी वंदना की जाती है। इसके बाद चौथे दिन की सुबह 'भोर का अर्घ्य' दिया जाता है, जिसमें उदीयमान (उगते हुए) सूर्य देव का स्वागत किया जाता है। यह अनुष्ठान हमें सिखाता है कि जीवन में अंधकार (अस्त) और प्रकाश (उदय) दोनों ही पूजनीय हैं और दोनों का अपना महत्व है।

चतुर्थ अंतरा: दउरा सजाना और निर्जला साधना

अंतिम पंक्तियों में व्रत की तैयारियों का सजीव चित्रण है। पत्नी कहती है कि वह बांस से बने पवित्र 'दउरा' (बड़ी टोकरी) को सजाएगी, पीतल या बांस के 'सूप' लेकर आएगी और पूरे परिवार के साथ नदी या तालाब के घाट पर जाएगी। वह अन्न और जल का पूर्ण त्याग करके इस अत्यंत कठिन 'निर्जला व्रत' को पूर्ण निष्ठा के साथ करेगी ताकि उनके घर-परिवार पर छठी मैया और सूर्य देव की असीम अनुकंपा बनी रहे और घर में सुख, शांति तथा समृद्धि का वास हो।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस गीत का मुख्य स्वर "समर्पण, शुचिता और सहभागिता" है। छठ पूजा का व्रत कोई अकेला व्यक्ति केवल अपनी इच्छा से पूर्ण नहीं कर सकता; इसमें पूरे परिवार और समाज का सहयोग आवश्यक होता है। गीत में निहित मुख्य संदेश इस प्रकार हैं:

  • पारिवारिक सामंजस्य: यह गीत दिखाता है कि कैसे पति और पत्नी मिलकर एक धार्मिक और सामाजिक कर्तव्य का निर्वहन करते हैं। पति यहाँ केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि अपनी पत्नी का मार्गदर्शक और सहायक है।
  • परंपराओं का हस्तांतरण: नवविवाहिता द्वारा व्रत की विधि पूछना यह दर्शाता है कि युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को सहेजने और उसे आगे बढ़ाने के लिए कितनी उत्सुक है।
  • कठिन साधना के प्रति उत्साह: 36 घंटे के निर्जला उपवास जैसी कठिन साधना को भी एक उत्सव के रूप में स्वीकार करना भारतीय संस्कृति की जिजीविषा को दर्शाता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण बिंदु (Parameter) गीत की जानकारी (Song Details)
गीत का नाम (Song Title) छठ के बरत कईसे सईया होला (Chhath Ke Barat Kaise Saiya Hola)
मुख्य गायक (Singers) गोलू गोल्ड (Golu Gold) एवं अंतरा सिंह प्रियंका (Antra Singh Priyanka)
गीत की श्रेणी (Category) भोजपुरी छठ देवी गीत (Bhojpuri Devi Geet / Chhath Geet)
भाषा (Language) भोजपुरी (Bhojpuri)
मुख्य विषय (Theme) छठ व्रत की विधि, श्रद्धा, और पति-पत्नी का संवाद
संगीत शैली (Music Style) पारंपरिक लोक संगीत का आधुनिक संयोजन

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

इस गीत को भोजपुरी संगीत जगत के दो बेहद लोकप्रिय कलाकारों ने अपनी आवाज दी है। गोलू गोल्ड अपनी सुरीली और भावपूर्ण गायकी के लिए जाने जाते हैं, विशेषकर उनके देवी गीत और छठ गीत श्रोताओं के दिलों को छू लेते हैं। वहीं, अंतरा सिंह प्रियंका ने अपनी खनकती आवाज से इस गीत में एक नवविवाहिता की व्याकुलता और श्रद्धा को जीवंत कर दिया है। दोनों कलाकारों की जुगलबंदी ने इस गीत को हर साल छठ महापर्व के दौरान बजाए जाने वाले चुनिंदा गीतों में शामिल करा दिया है। इस गीत का संगीत पारंपरिक वाद्यों जैसे ढोलक, मंजीरा और बांसुरी के साथ-साथ आधुनिक सिंथेसाइज़र का एक बेहतरीन मिश्रण है, जो इसे सुनने में बेहद कर्णप्रिय बनाता है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

कठिन शब्द (Bhojpuri Word) सरल हिंदी अर्थ (Hindi Meaning) सांस्कृतिक संदर्भ (Cultural Context)
बरत (Barat) व्रत / उपवास धार्मिक संकल्प और नियमपूर्वक किया जाने वाला उपवास।
सईया (Saiya) पति / स्वामी / जीवनसाथी गृहस्थ जीवन में स्त्री द्वारा पति को आदरपूर्वक संबोधित शब्द।
नहाय-खाय (Nahay-Khay) स्नान और सात्विक भोजन छठ पूजा का पहला दिन, जिसमें पवित्रता की शुरुआत होती है।
खरना (Kharna) शुद्धिकरण / प्रसाद ग्रहण छठ का दूसरा दिन, जिसमें शाम को विशेष खीर का प्रसाद बनता है।
अरघिया (Arghya) अर्घ्य / जल देना सूर्य देव को दूध और गंगाजल अर्पित करने की पवित्र क्रिया।
दउरा (Daura) बांस की बड़ी टोकरी जिसमें छठ का मुख्य प्रसाद (ठेकुआ, फल) रखकर घाट पर ले जाया जाता है।
सूप (Soop) सूपड़ा (बांस या पीतल का) जिसमें अर्घ्य की सामग्री रखकर सूर्य देव को दिखाया जाता है।

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

भोजपुरी लोकगीत "छठ के बरत कईसे सईया होला" केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह छठ महापर्व के संपूर्ण दर्शन को समेटे हुए है। छठ पूजा का आध्यात्मिक आधार ऋग्वेद और पुराणों में मिलता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इस व्रत का अत्यधिक महत्व है:

  • प्रकृति और मानव का संबंध: यह व्रत हमें सिखाता है कि हमारी उत्पत्ति और अस्तित्व प्रकृति (सूर्य और जल) पर निर्भर है। सूर्य देव प्रत्यक्ष देवता हैं जो हमें जीवन ऊर्जा प्रदान करते हैं।
  • समानता का संदेश: छठ घाट पर राजा हो या रंक, सभी एक साथ पानी में खड़े होकर सूर्य देव की आराधना करते हैं। यहाँ कोई पुरोहित या मध्यस्थ नहीं होता; भक्त का भगवान से सीधा संबंध होता है।
  • मानसिक और शारीरिक शुद्धि: 36 घंटे का निर्जला उपवास शरीर के विषैले तत्वों को बाहर निकालता है (Detoxification) और मन को एकाग्र व शांत बनाता है।

इस गीत के माध्यम से इन सभी कठिन नियमों को अत्यंत सरल और सुबोध भाषा में प्रस्तुत किया गया है, जिससे नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है। यदि आप इस पावन पर्व की कथा विस्तार से पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी विशेष प्रस्तुति छठ पूजा व्रत कथा अवश्य पढ़ें।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

यह सुंदर भोजपुरी गीत हमें दैनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  1. जिज्ञासा और सीखने की प्रवृत्ति: जिस प्रकार गीत में पत्नी अपने पति से व्रत की विधि सीख रही है, उसी प्रकार हमें भी अपनी संस्कृति और अच्छे संस्कारों को बड़ों से सीखने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।
  2. कठिन परिस्थितियों में धैर्य: निर्जला उपवास रखना आत्म-नियंत्रण और संकल्प शक्ति की परीक्षा है। यह हमें जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहने की प्रेरणा देता है।
  3. सामूहिकता की भावना: छठ पूजा में पूरा समाज मिलकर घाटों की सफाई करता है, दउरा उठाता है और एक-दूसरे की मदद करता है। यह सामाजिक समरसता और भाईचारे का सर्वोत्तम उदाहरण है।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यद्यपि यह गीत वर्षभर भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में सुना जाता है, लेकिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चलने वाले चार दिवसीय छठ महापर्व के दौरान इसकी गूंज हर गली, मोहल्ले और छठ घाट पर सुनाई देती है। विशेष रूप से:

  • प्रसाद (ठेकुआ) बनाते समय: जब घर की महिलाएं अत्यंत शुद्धता के साथ मिट्टी के चूल्हे पर गेहूं के आटे, गुड़ और घी से 'ठेकुआ' बनाती हैं, तब यह गीत पृष्ठभूमि में बजता हुआ वातावरण को भक्तिमय बना देता है।
  • घाट की यात्रा के दौरान: जब सिर पर दउरा रखकर पूरा परिवार घाट की ओर प्रस्थान करता है, तब इस गीत के स्वर भक्तों में अपूर्व ऊर्जा का संचार करते हैं।
  • यदि आप अन्य देवी-देवताओं के पारंपरिक गीतों का आनंद लेना चाहते हैं, तो हमारे संग्रह भोजपुरी देवी गीत और खेसारी लाल के भोजपुरी गाना पर जा सकते हैं।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु (Key Point) संक्षिप्त विवरण (Quick Description)
गीत का शीर्षक छठ के बरत कईसे सईया होला
मुख्य विषयवस्तु छठ व्रत की तैयारी, नियम और पारिवारिक संवाद
गायक कलाकार गोलू गोल्ड एवं अंतरा सिंह प्रियंका
मुख्य पर्व कार्तिक छठ महापर्व (Surya Shashti)
आध्यात्मिक संदेश प्रकृति पूजा, शुचिता, कठिन तप और पारिवारिक एकता
संबंधित मंत्र/आरती सूर्य देव की आरती

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह अत्यंत लोकप्रिय भोजपुरी छठ गीत सुप्रसिद्ध लोक गायक गोलू गोल्ड और सुरीली गायिका अंतरा सिंह प्रियंका द्वारा गाया गया है। दोनों की जुगलबंदी ने इस गीत को जीवंत बना दिया है।

इस गीत में एक नवविवाहिता पत्नी और उसके पति के बीच का संवाद है। पत्नी अपने पति से छठ व्रत की कठिन विधियों, आवश्यक सामग्रियों और पूजा के नियमों के बारे में श्रद्धापूर्वक पूछती है।

'नहाय-खाय' छठ पूजा का पहला दिन होता है जिसमें स्नान के बाद सात्विक भोजन किया जाता है। 'खरना' दूसरा दिन होता है, जिसमें दिनभर उपवास रखकर शाम को गुड़ की खीर का प्रसाद ग्रहण किया जाता है, जिसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।

डूबते सूर्य (अस्ताचलगामी सूर्य) को अर्घ्य देना यह दर्शाता है कि सृष्टि में जिसका अंत होता है, उसका पुनरुदय भी निश्चित है। यह जीवन के चक्र और कृतज्ञता का प्रतीक है।

'दउरा' बांस की बनी एक बड़ी टोकरी होती है जिसमें पूजा का मुख्य प्रसाद और फल रखे जाते हैं। 'सूप' में अर्घ्य की सामग्री रखकर सूर्य देव को समर्पित की जाती है। बांस के बर्तनों का उपयोग प्रकृति के प्रति सम्मान और सादगी को दर्शाता है।

हाँ, इस गीत के बोलों में छठ पूजा के चारों दिनों की संक्षिप्त और सटीक विधि (नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य, उषा अर्घ्य) बताई गई है, जो नए व्रतियों को इस महापर्व की रूपरेखा समझने में मदद करती है।

यह महापर्व मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त चैत्र मास में भी 'चैती छठ' मनाई जाती है।

इस गीत का संगीत पारंपरिक भोजपुरी लोक धुनों पर आधारित है, जिसमें ढोलक, मंजीरा और शहनाई के साथ आधुनिक वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया गया है, जिससे यह अत्यंत कर्णप्रिय और भक्तिमय लगता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। हमारी संपादकीय टीम ने इस गीत के बोलों, इसके सांस्कृतिक संदर्भों और छठ महापर्व की शास्त्रीय विधियों का गहन विश्लेषण करके इसे तैयार किया है। इस सामग्री का उद्देश्य भोजपुरी लोक संगीत के माध्यम से सनातन धर्म की समृद्ध परंपराओं और पारिवारिक मूल्यों को बढ़ावा देना है। इस लेख में दी गई जानकारी पूरी तरह से प्रामाणिक लोक मान्यताओं और पारंपरिक ग्रंथों पर आधारित है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • ऋग्वेद - सूर्य सूक्त और उषा वंदना प्रसंग।
  • भोजपुरी लोक साहित्य एवं पारंपरिक छठ गीत संग्रह।
  • बिहार एवं उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय छठ पूजा पद्धतियां एवं पारिवारिक मौखिक परंपराएं।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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