चलS सखी अरघ देबे: छठ महापर्व का पावन लोकगीत
लोक आस्था के महापर्व छठ की महिमा सनातन संस्कृति में अद्वितीय है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस महाव्रत में छठी मईया और भगवान सूर्य नारायण की उपासना की जाती है। इस पावन अवसर पर लोक कलाकारों द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक और आधुनिक भक्ति गीत इस पर्व के उल्लास को कई गुना बढ़ा देते हैं। प्रसिद्ध लोक गायिका रितिका पाण्डेय का स्वरबद्ध किया गया लोकप्रिय छठ गीत "चलS सखी अरघ देबे" पूर्वांचल की सांस्कृतिक धरोहर और लोक श्रद्धा का एक अत्यंत जीवंत और हृदयस्पर्शी उदाहरण है। इस गीत के माध्यम से व्रती महिलाओं के उस उत्साह, समर्पण और सामूहिक सहभागिता का सजीव चित्रण किया जाता है, जो छठ घाट पर जाने से पूर्व सखियों के बीच देखने को मिलता है। यह रचना न केवल कर्णप्रिय है, बल्कि यह श्रोताओं के मन में छठी मईया के प्रति अनन्य प्रेम, विसर्जन और शुचिता के भाव को भी जागृत करती है।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics
स्थायी (मुखड़ा):
चलS सखी अरघ देबे घाटवा पर जाई,
मईया छठी के महिमा अपरम्पार बा।
सजले घटवा सुहावना, सोहे पावन बयार,
भक्ति भाव में डूबल पूरा संसार बा॥
अंतरा 1:
भिनसारहीं उठि के सभे कइली तैयारी,
दउरा सजवले बाड़ें घर-घर महतारी।
कोशिशे ई बा कि नेवटा सबकर पुजाई,
छठी मईया से अरजिया सभे लगाई॥
चलS सखी अरघ देबे...॥
अंतरा 2:
घाट पर गूंजे लीलॉई आ गीत सुहावन,
सूर्य देव के दर्शन से महके मन-पावन।
कांच ही बाँस के बहंगिया बहंगी लचकत जाव,
तितकी सुरुज देव के अरघ गिरत जाव॥
चलS सखी अरघ देबे...॥
अंतरा 3:
रितिका पाण्डेय गावे छठी के भजनिया,
मिले ई वरदान पावन घरवा आंगनियां।
बाल-बच्चा सुख-सम्पति सब काहू के भेटे,
छठी माई के किरपा से पापर सब कटे॥
चलS सखी अरघ देबे घाटवा पर जाई...॥
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
रितिका पाण्डेय द्वारा गाया गया यह छठ गीत भोजपुरी लोक संस्कृति की उस निर्मल धारा को प्रवाहित करता है, जिसमें सामूहिक भावना और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता मुख्य होती है। गीत के मुखड़े में सखियाँ आपस में संवाद करती हुई कहती हैं कि हे सखी! चलो हम सब मिलकर घाट पर चलें और भगवान भास्कर को अर्घ्य दें। छठी मईया की महिमा इस संसार में अपरंपार है। कार्तिक मास की संध्या और प्रातः काल का वह पावन वातावरण, सजे हुए घाट और ठंडी बयार पूरे परिवेश को भक्तिमय बना देती है।
प्रथम अंतरे में ग्रामीण परिवेश की उस दिनचर्या का सुंदर वर्णन है जहाँ व्रती माताएं भिनसार (ब्रह्म मुहूर्त) से ही उठकर पवित्र मन से पूजा की तैयारी करती हैं। बांस की टोकरी (दउरा) में ठेकुआ, फल, कंदमूल और पकवान सजाए जाते हैं। हर महिला की यही कामना होती है कि उनका व्रत और अनुष्ठान निर्विघ्न पूर्ण हो तथा छठी मईया सबकी झोली खुशियों से भर दें।
दूसरे और तीसरे अंतरे में नदी या तालाब के घाट का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किया गया है। घाट पर गूंजते पारंपरिक सोहर और गीत मन को मोह लेते हैं। 'कांच ही बांस के बहंगिया' जैसी पंक्तियाँ लोक परंपरा की जीवंतता को दर्शाती हैं। अंत में गायिका रितिका पाण्डेय अपने नाम का स्मरण कराते हुए कहती हैं कि छठी मईया की कृपा से समस्त पापों का नाश होता है और भक्तों को आरोग्य, संतान सुख तथा अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
इस गीत का मूल भाव लोक आस्था, सामूहिक समर्पण, स्वच्छता और अनुशासन है। छठ महापर्व केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है। इस गीत के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि जब समाज मिलकर किसी पवित्र कार्य में जुटता है, तो अहंकार और भेदभाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं। स्त्री शक्ति और सामूहिक सहभागिता का यह पर्व समाज को एकजुट रखने का कार्य करता है।
गीत की जानकारी | Song Information
| गीत का नाम | चलS सखी अरघ देबे (Chal S Sakhi Aragh Debe) |
|---|---|
| गायिका | रितिका पाण्डेय (Ritika Pandey) |
| संगीत शैली | भोजपुरी लोक गीत / छठ पूजा गीत |
| भाषा | भोजपुरी / हिंदी |
| मुख्य विषय | छठ महापर्व, सूर्य उपासना, प्रकृति वंदना |
| संबंधित पर्व | कार्तिक छठ पूजा (Chhath Puja) |
गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators
रितिका पाण्डेय वर्तमान समय में लोक कला और पारंपरिक संगीत को आगे बढ़ाने वाली एक प्रतिष्ठित कलाकार हैं। उनके द्वारा गाए गए छठ गीत, देवी गीत और संकीर्तन श्रोताओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं। उनकी गायन शैली में ठेठ पूरबी मिठास और शास्त्रीय शुद्धता का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। इस गीत के माध्यम से उन्होंने आधुनिक दौर में भी पारंपरिक लोक धुनों को सहेजने का सराहनीय प्रयास किया है।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| शब्द / पद | सरल अर्थ | संदर्भ |
|---|---|---|
| अरघ (अर्घ्य) | जल अर्पित करना | सूर्य भगवान को जल और दूध देने की प्रक्रिया |
| भिनसारहीं | प्रातःकाल / ब्रह्म मुहूर्त | सुबह-सुबह उठकर कार्य आरंभ करना |
| दउरा | बांस की बनी टोकरी | पूजा सामग्री रखने का पारंपरिक पात्र |
| बहंगिया | कंधे पर रखकर ले जाने वाली भार वाहक संरचना | बांस के डंडे पर दोनों ओर बंधी टोकरियाँ |
| नेवटा | निमंत्रण / बुलावा | सभी को पर्व में सम्मिलित होने का आग्रह |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
छठ पर्व सूर्य षष्ठी व्रत के रूप में जाना जाता है, जिसमें दृश्यमान देवता भगवान सूर्य और प्रकृति की शक्ति 'छठी मईया' (माता षष्ठी) की पूजा की जाती है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें डूबते और उगते दोनों सूर्यों को अर्घ्य दिया जाता है। रितिका पाण्डेय का यह गीत इस सांस्कृतिक अनुष्ठान की गरिमा को शब्दों और स्वरों के माध्यम से जीवंत करता है। यह गीत नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कृति और लोक परंपराओं से जोड़ने का सशक्त माध्यम है।
गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons
- शुचिता और अनुशासन: छठ पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में पवित्रता, संयम और अनुशासन का क्या महत्व है।
- प्रकृति प्रेम: यह पर्व हमें सिखाता है कि जल, वायु, सूर्य और वनस्पति ही हमारे जीवन के आधार हैं, अतः इनका आदर करना चाहिए।
- सामूहिकता और भाईचारा: मिलजुलकर पर्व मनाना समाज में एकता और आपसी प्रेम को बढ़ावा देता है।
- कृतज्ञता का भाव: अन्न-जल और ऊर्जा देने वाली प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना ही सच्ची साधना है।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
यह गीत विशेष रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले छठ महापर्व के दौरान सुना और गाया जाता है। जब महिलाएं और पुरुष सिर पर दउरा उठाए पारंपरिक गीतों के साथ नदी घाट की ओर प्रस्थान करते हैं, तब ऐसे भजन वातावरण को पूरी तरह से भक्तिमय और ऊर्जावान बना देते हैं। इसे पारंपरिक छठ पूजा गीत संग्रह में विशेष स्थान प्राप्त है।
एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance
| रचना शीर्षक | चलS सखी अरघ देबे |
|---|---|
| गायक/कलाकार | रितिका पाण्डेय |
| विधा | भोजपुरी लोकगीत / छठ गीत |
| उद्देश्य | छठी मईया की महिमा और लोक संस्कृति का प्रचार |
| उपयुक्त अवसर | नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री पारंपरिक लोक साहित्य, सांस्कृतिक संदर्भों और क्षेत्रीय लोकगीत परंपराओं के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य भारतीय सनातन संस्कृति और लोक पर्वों की गरिमा को पाठकों तक पहुंचाना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत संग्रह एवं मौखिक परंपराएं
- भारतीय सनातन पर्व एवं लोक संस्कृति ग्रंथ
- सूर्य उपासना और छठ महापर्व से जुड़े शोध लेख
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