Papmochani Ekadashi Vrat Katha मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी

पढ़ें प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

URL Slug: 2021/11/navratri-bhajans-i-pyara-saja-hai-tera.html | Categories: gayatri mantra, Lakshmi Gayatri Mantra, Papmochani Ekadashi Vrat Katha, Patriotic Songs, Shiv Parvati Vivah Shivratri Bhajan

सनातन धर्म में शक्ति उपासना का पर्व नवरात्रि एवं माँ भगवती की आराधना का भारतीय संस्कृति में अत्यंत विशिष्ट एवं पावन स्थान है। माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की वंदना करते हुए गाए जाने वाले भजन साधक के अंतर्मन को पवित्र करने के साथ-साथ उनमें अनन्य भक्ति और समर्पण भाव का संचार करते हैं। ऐसा ही एक अत्यंत पावन, मनमोहक एवं लोकप्रिय भजन है — "प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी"। यह भजन माँ दुर्गा, माता शेरावाली, अम्बे भवानी के दरबार की अलौकिक सुंदरता, उनके परम कारुणिक स्वभाव और भक्तों के प्रति उनकी अहेतुकी कृपा का जीवंत वर्णन करता है। जब भक्त नवरात्रि के पावन दिनों में, माता के जागरण में अथवा किसी भी मांगलिक उत्सव पर इस भजन का गान करते हैं, तो पूरा वातावरण दिव्यता और सकारात्मक ऊर्जा से ओत-प्रोत हो जाता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के संपूर्ण बोल, इसका गहन आध्यात्मिक अर्थ, भावार्थ, गायन की विधि, और सनातन परंपरा में इसके महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थायी (मुखड़ा):

प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी,
भक्तों की लगी है लंबी कतार भवानी।
दर्शन को आए हैं तेरे हज़ारों, झुका के सिर अपना,
ओ मेरी मैया, ओ मेरी शेरावाली...
प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी,
भक्तों की लगी है लंबी कतार भवानी।

अंतररा 1:

ऊँचे पर्वतों पर तेरा धाम है सुहाना,
तुझको मनाने तेरे द्वार है आना।
चरणों की धूल को जो मस्तक लगाए,
उसके जीवन से हर दुःख मिट जाए।
तू ही दुर्गा, तू ही काली, तू ही संतोषी माता,
तेरे दर पर आकर हर मन सुख पाता।
प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी,
भक्तों की लगी है लंबी कतार भवानी।

अंतररा 2:

लाल चुनरिया माते तेरे अंग विराजे,
हाथों में त्रिशूल और सिंह पे साजे।
जो भी पुकारे तुझे सच्चे मन से,
तू काट दे फंदे उसके हर बंधन से।
मैया तेरी महिमा का गुणगान जो गाए,
भवसागर से वो तर जाए।
प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी,
भक्तों की लगी है लंबी कतार भवानी।

अंतिम चरण (समापन):

झिलमिल दीपों से सजा है तेरा मंदिर सारा,
लगे प्यारा हमको यह जग से न्यारा।
चरणों में तेरे मेरा यह जीवन बीते,
भक्ति का अमृत हम जी भर के पीते।
ओ अम्बे भवानी, तेरी जय जयकार हो,
भक्तों के दिल में तेरा ही प्यार हो!
प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी,
भक्तों की लगी है लंबी कतार भवानी।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

"प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी" भजन केवल शब्दों की माला नहीं है, बल्कि यह एक भक्त के अंतस से निकला हुआ प्रेम और समर्पण का उद्गार है। इस भजन का मुख्य भाव शरणागति और माँ के प्रति अनन्य प्रेम का है। जब भक्त गाता है कि 'प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी, भक्तों की लगी है लंबी कतार भवानी', तो इसका अर्थ यह है कि भौतिक जगत की समस्त विसंगतियों और दुखों से त्रस्त होकर मनुष्य जब माँ के दरबार में पहुँचता है, तो उसे वहाँ असीम शांति और आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है। माँ का दरबार सांसारिक मोह-माया से परे एक ऐसा पावन स्थल है जहाँ राजा और रंक, अमीर और गरीब का भेद मिट जाता है और सभी केवल उस परम शक्ति की संतान के रूप में उपस्थित होते हैं।

भजन के अंतररे में पर्वतों पर स्थित माँ के धाम का उल्लेख है। सनातन परंपरा में त्रिकुटाचल, विंध्याचल, और हिमालय जैसे पवित्र पर्वतों पर देवियों के वास का प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक दोनों अर्थ हैं। ऊँचे पर्वत यह सिखाते हैं कि परमात्मा को पाने के लिए साधक को अपने जीवन में ऊँचे आदर्शों, उच्च विचारों और तपस्या के मार्ग पर चलना होगा। 'चरणों की धूल को जो मस्तक लगाए, उसके जीवन से हर दुःख मिट जाए' पंक्ति यह दर्शाती है कि अहंकार का त्याग करके जब कोई भक्त माँ के चरणों में अपनी पूर्ण नम्रता (विनम्रता) समर्पित करता है, तो उसके सारे कष्ट और संताप स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। यह भजन साधक को यह बोध कराता है कि इस भवसागर से पार पाने का एकमात्र साधन माँ भगवती की कृपा और उनका निरंतर स्मरण है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

माता भगवती की आराधना भारतीय संस्कृति की रीढ़ रही है। नवरात्रि के नौ दिनों में अथवा किसी भी शुक्ल पक्ष की अष्टमी-चतुर्दशी पर जब इस प्रकार के भजनों का संकीर्तन होता है, तो घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस भजन की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • भक्ति रस से ओत-प्रोत: यह भजन साधक के मन में वैराग्य, प्रेम और भक्ति का अद्भुत समन्वय स्थापित करता है।
  • सुलभ एवं कर्णप्रिय: इसकी लयबद्धता और सरल शब्दावली इसे हर उम्र के लोगों द्वारा आसानी से गाने योग्य बनाती है।
  • सार्वभौमिक संदेश: इसमें किसी जाति, पंथ या वर्ग का भेद न होकर समस्त मानव जाति के लिए कल्याण की कामना की गई है।
  • मानसिक शांति: नियमित रूप से इस भजन का श्रवण करने से मन की चंचलता शांत होती है और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।
  • सनातन संस्कृति में ऐसे भजनों के माध्यम से युवा पीढ़ी को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने में बहुत मदद मिलती है। आप हमारी श्री हनुमान चालीसा और शिव तांडव स्तोत्र जैसी अन्य पावन रचनाओं का भी पाठ करके अपनी आध्यात्मिक यात्रा को और प्रगाढ़ बना सकते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भजन गायन के लिए किसी कठोर नियम की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ईश्वर भाव के भूखे होते हैं। फिर भी कुछ विशेष अवसरों और विधियों से इसका फल कई गुना बढ़ जाता है:

  • प्रातःकाल एवं संध्याकाल: दैनिक पूजा के समय दीप प्रज्वलित करने के पश्चात माँ के सम्मुख इस भजन का गान अत्यंत फलदायी माना गया है।
  • नवरात्रि के पावन दिन: शारदीय और चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में घटस्थापना के बाद माता की चौकी या जागरण के दौरान इस भजन को विशेष रूप से गाया जाता है।
  • सत्संग एवं अनुष्ठान: पारिवारिक अनुष्ठानों, माता की ब्यालू या सुंदर कांड जैसे आयोजनों में सामूहिक रूप से इस भजन का गायन माहौल को पूरी तरह भक्तिमय बना देता है।
  • गायन विधि: मन को एकाचित कर, माता के चित्र या विग्रह के समक्ष पुष्प अर्पित करते हुए इसे प्रेम और श्रद्धा के साथ गाना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन की केंद्र बिंदु माँ आदिशक्ति जगदंबा, भवानी, शेरावाली, माता दुर्गा हैं। सनातन दर्शन में आदिशक्ति को ही संपूर्ण ब्रह्मांड की जननी, पालनकर्ता और संहारकर्ता के रूप में पूजा जाता है। वे ही महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली के रूप में त्रिगुणात्मिका शक्ति का संचालन करती हैं। इस प्रकार के पारंपरिक भजन पीढ़ियों से मौखिक परंपरा और लोक-संस्कृति के माध्यम से आगे बढ़ते आए हैं, जिन्हें विभिन्न प्रख्यात लोक गायकों और संतों ने अपनी मधुर वाणी से जन-जन तक पहुँचाया है। माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों और उनके मंत्रों के बारे में अधिक जानने के लिए आप गायत्री मंत्र एवं लक्ष्मी गायत्री मंत्र के अनुष्ठान विधि लेखों का भी अध्ययन कर सकते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

लोक भजनों की श्रेणी में आने वाला यह भजन किसी एक निश्चित रचनाकार की सीमा में बंधा न होकर लोक-साहित्य और भक्ति आंदोलन की देन है, जिसे समय-समय पर विभिन्न संगीतकारों और गीतकारों ने परिवर्धित किया है। यह भजन मूल रूप से माता के दरबार की भव्य सजावट, भक्तों के उत्साह और मैया के प्रति अगाध प्रेम की पृष्ठभूमि पर रचा गया है। जब भी भारतवर्ष में माता के मेलों, मंदिरों के कपाट खुलने के समय या जागरण की शुरुआत होती है, तो इस भजन की गूंज से पूरा वातावरण गुंजायमान हो उठता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और आम जनमानस की समझ में आने वाली हिंदी एवं बोलचाल की ब्रज-अवधि मिश्रित खड़ी बोली है। इसमें रूपक अलंकार और उपमाओं का सुंदर प्रयोग किया गया है। जैसे 'द्वार सजना', 'लंबी कतार लगना', 'चरणों की धूल मस्तक लगाना'—ये सभी ऐसे काव्यात्मक प्रतीक हैं जो सीधे हृदय को स्पर्श करते हैं। इसमें शब्दों की क्लिष्टता के स्थान पर भावों की सरलता को प्राथमिकता दी गई है, जिससे कोई भी सामान्य भक्त इसे गाते ही आनंदित हो उठता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन के कई गहरे दार्शनिक और व्यावहारिक संदेश देता है:

  • शरणागति का महत्व: जीवन की हर कठिनाई में भगवान और गुरु के चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाना ही सच्चा समाधान है।
  • अहंकार का त्याग: जब हज़ारों भक्त एक ही पंक्ति में खड़े होकर माँ के दर्शन करते हैं, तो यह सिखाता है कि परमात्मा के दरबार में सभी मनुष्य समान हैं।
  • नियमित स्मरण: जिस प्रकार दीपों से मंदिर सजता है, उसी प्रकार भजन-कीर्तन से मनुष्य का अंतर्मन प्रकाशित होता है।
  • सेवा और विनम्रता: मैया के चरणों की धूल को मस्तक से लगाना सिखाता है कि नम्रता ही मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
भवानी माँ दुर्गा, संसार को उत्पन्न करने वाली मूल प्रकृति और चेतना शक्ति
द्वार दरवाजा या प्रवेश द्वार मोक्ष और शरण प्राप्ति का मार्ग
चरणों की धूल पैर की रज परम पवित्र आशीर्वाद और नम्रता
भवसागर जन्म-मृत्यु का संसार मोह-माया और दुखों से भरा संसार
शेरावाली सिंह पर सवार होने वाली समस्त भय और शत्रुओं का नाश करने वाली शक्ति

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी..." — इस पंक्ति में भक्त माता के दरबार की अलौकिक सजावट की प्रशंसा कर रहा है और बता रहा है कि माँ का द्वार इतना सुंदर है कि वहां आने वाले हर भक्त का मन मोह लेता है।

"भक्तों की लगी है लंबी कतार भवानी..." — यह दर्शाता है कि माँ के प्रति लोगों की आस्था अटूट है और उनके दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं।

"चरणों की धूल को जो मस्तक लगाए, उसके जीवन से हर दुःख मिट जाए..." — यहाँ यह भाव है कि जो मनुष्य अहंकार का त्याग कर माँ के प्रति पूर्ण निष्ठा रखता है, उसके सारे कष्ट और पाप स्वतः नष्ट हो जाते हैं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

माता भवानी की स्तुति में निम्नलिखित पौराणिक मंत्र का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना गया है:

सर्वमंगल मंगले शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे सभी प्रकार का मंगल करने वाली कल्याणमयी शिवे! सभी पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरण में आए हुए की रक्षा करने वाली और तीन नेत्रों वाली गौरी रूपी नारायणि! आपको हमारा बार-बार नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम प्यारा सजा है तेरा द्वार भवानी (Pyara Saja Hai Tera Dwar Bhawani)
प्रमुख देवता माँ दुर्गा / भवानी / शेरावाली
भाषा हिंदी (लोकगीत शैली)
मुख्य भाव प्रेम, शरणागति, उल्लास और भक्ति
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, माता की चौकी, जागरण, मंगलवार/शुक्रवार पूजा
मुख्य संदेश माँ के चरणों में अटूट विश्वास और भवसागर से पार पाना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन सनातन धर्म की आद्यशक्ति, माता दुर्गा, शेरावाली, अम्बे भवानी को समर्पित है।

इस भजन को नवरात्रि के दिनों में, प्रातःकाल या संध्याकालीन पूजा के समय, तथा माता के जागरण या चौकी के अवसर पर गाना सबसे उत्तम माना जाता है।

हाँ, आप इसे घर पर अकेले या अपने परिवार के साथ सामूहिक रूप से पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ गा सकते हैं।

इस भजन के गायन और श्रवण से मन को शांति मिलती है, मानसिक तनाव दूर होता है और माता भगवती की असीम कृपा प्राप्त होती है।

यह एक लोकप्रिय पारंपरिक लोक भजन है जो देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण में वर्णित दुर्गा सप्तशती की स्तुति परंपरा से प्रेरित होकर लोक-संस्कृति में रचा गया है।

आप इसे प्रत्येक मंगलवार, शुक्रवार, पूर्णिमा, अमावस्या अथवा किसी भी विशेष मांगलिक अनुष्ठान के दौरान गा सकते हैं।

गायन के समय मन में शुद्धता, माता के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण का भाव होना आवश्यक है।

हाँ, इसकी सरल लय और सहज शब्दों के कारण बच्चे इसे बहुत कम समय में आसानी से याद करके गा सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री Bhaktilok.in के उच्च संपादकीय मानकों के तहत सनातन धार्मिक परंपराओं, लोकगीत संकलन और भक्तों की आस्था को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। इस लेख में दी गई जानकारी पारम्परिक मान्यताओं और शास्त्रीय संदर्भों पर आधारित है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत पाठकों की प्रामाणिक जानकारी और भक्ति भाव को पोषित करने का पूर्ण प्रयास किया गया है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • दुर्गा सप्तशती - गीताप्रेस गोरखपुर
  • देवी भागवत पुराण - सांस्कृतिक एवं दार्शनिक प्रसंग
  • सनातन लोकगीत एवं भक्ति संकीर्तन परंपरा
  • पारंपरिक नवरात्रि भजन संग्रह

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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