bhakti gana bhojpuri mein मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

BHARAT SHARMA VYAS - Mata Bhajans

सुर सम्राट भरत शर्मा व्यास के पावन भोजपुरी माता भजन 'सातो रे बहिनिया' का भावार्थ और आध्यात्मिक महत्व पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित विस्तृत विवरण।

"सातो रे बहिनिया अइलीं" (Saato Re Bahiniya) भोजपुरी लोक-संस्कृति, मातृ-शक्ति की उपासना और सनातन देवी भक्ति का एक अत्यंत पावन, पारंपरिक और कालजयी भजन संग्रह है। सुर सम्राट भरत शर्मा व्यास (Bharat Sharma Vyas) की ओजस्वी और भावपूर्ण आवाज में गाया गया यह भजन संग्रह मुख्य रूप से आदिशक्ति मां दुर्गा और उनकी सात बहनों (सप्तमातृका स्वरूप) के प्रति अनन्य श्रद्धा, वात्सल्य और पूर्ण शरणागति को समर्पित है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के क्षेत्रों में नवरात्रि के पावन अवसर पर इस भजन का गूंजना हर घर में साक्षात् देवी के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इस भजन में प्रयुक्त पारंपरिक राग, माटी की सुगंध और वाद्ययंत्र श्रोताओं के अंतर्मन में एक अलौकिक शांति, दिव्यता और भक्ति रस का संचार करते हैं। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि जीवात्मा का परमात्मा से मिलन और मातृ-शक्ति के प्रति पूर्ण समर्पण का एक संगीतमय दस्तावेज है, जो सदियों से हमारी लोक-चेतना को जाग्रत रखे हुए है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ सातो रे बहिनिया अइलीं झुलुआ झुलाए रे ॥

सातो रे बहिनिया अइलीं, झुलुआ झुलाए रे।
निमिया के डारि मैया, झुलुआ लगावेली, झुलुआ झुलाए रे॥

पहिली बहिनिया अइलीं, मैया मोरी दुर्गा,
सिंह पर सवार होइके, ममता लुटावेली, ममता लुटावेली रे।
सातो रे बहिनिया अइलीं, झुलुआ झुलाए रे॥

दूसरी बहिनिया अइलीं, मैया मोरी काली,
खप्पर चमकाए के, दुष्टन संहारेली, दुष्टन संहारेली रे।
सातो रे बहिनिया अइलीं, झुलुआ झुलाए रे॥

तीसरी बहिनिया अइलीं, मैया शीतला भवानी,
कलश के जलवा से, जग को सींचेली, जग को सींचेली रे।
सातो रे बहिनिया अइलीं, झुलुआ झुलाए रे॥

चौथी बहिनिया अइलीं, मैया फूलमती गोरी,
फूलन के गजरा से, अंगिया सजावेली, अंगिया सजावेली रे।
सातो रे बहिनिया अइलीं, झुलुआ झुलाए रे॥

पांचवीं, छठवीं और सातों बहिनिया,
मिलिजुलि गावेली, मंगल गीतिया, मंगल गीतिया रे।
निमिया के ठंडी छांव में, आसन लगावेली, आसन लगावेली रे॥

भरत शर्मा व्यास गावे, मैया तोरी महिमा,
चरणन में राखिहें, हमनी के मैया, हमनी के मैया रे।
सातो रे बहिनिया अइलीं, झुलुआ झुलाए रे॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह पावन भोजपुरी देवी गीत "सातो रे बहिनिया अइलीं" देवी दुर्गा के सात स्वरूपों (जिन्हें लोक परंपरा में सातों बहिनिया कहा जाता है) के पृथ्वी पर आगमन और उनके वात्सल्यमयी रूप का अत्यंत सुंदर चित्रण करता है। भजन का मुख्य भाव यह है कि जब भी भक्त सच्चे मन से मां को पुकारते हैं, तब मां अपने समस्त दिव्य स्वरूपों के साथ पृथ्वी पर अवतरित होती हैं।

भजन की शुरुआत में नीम के पेड़ (निमिया के डारि) का उल्लेख है, जिसे सनातन लोक परंपरा में अत्यंत पवित्र और देवी का वास माना गया है। मां नीम की डाल पर झूला झूलती हैं, जो उनके आनंदमयी और क्रीड़ामयी (लीला) स्वरूप को दर्शाता है। इसके बाद, एक-एक करके देवी के विभिन्न रूपों जैसे मां दुर्गा, मां काली, मां शीतला और मां फूलमती के आगमन का वर्णन है। वे अपने भक्तों पर ममता लुटाती हैं, दुष्टों का संहार करती हैं और अपने दिव्य कलश के जल से पूरे संसार को शीतलता और आरोग्य प्रदान करती हैं। अंत में, गायक मां के चरणों में स्थान पाने की प्रार्थना करता है, जो कि अनन्य भक्ति और शरणागति का सूचक है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व बहुआयामी है:

  • सप्तमातृका परंपरा का लोक स्वरूप: वेदों और पुराणों में वर्णित 'सप्तमातृका' (ब्राह्मणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा) को ही भोजपुरी लोकगीतों में अत्यंत आत्मीयता के साथ "सातो बहिनिया" के रूप में पूजा जाता है। यह भजन शास्त्रीय ज्ञान को लोक-संस्कृति से जोड़ता है।
  • प्रकृति और ईश्वर का संबंध: भजन में नीम के पेड़, ठंडी छांव और फूलों का वर्णन है। यह दर्शाता है कि हमारी सनातन संस्कृति में प्रकृति को ही साक्षात् देवी का रूप मानकर उसकी रक्षा और पूजा का संदेश दिया गया है।
  • सामुदायिक समरसता: जब गांवों में महिलाएं एकत्रित होकर इस भजन को गाती हैं, तो यह सामाजिक एकता और सामूहिक उपासना की भावना को सुदृढ़ करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि मां की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए विशेष अवसर निर्धारित हैं:

यह भजन मुख्य रूप से नवरात्रि व्रत विधि के दौरान सुबह और शाम की आरती के समय गाया जाता है। इसके अतिरिक्त, चैत्र और आश्विन नवरात्रि में कलश स्थापना के समय, देवी जागरण (जगरन) में और मां शीतला की पूजा के समय इस भजन को गाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे गाते समय हाथ में मंजीरा, ढोलक और झांझ का प्रयोग किया जाता है, जिससे वातावरण अत्यंत भक्तिमय हो जाता है। शांत चित्त से, शुद्ध वस्त्र धारण कर, मां की प्रतिमा के सम्मुख घी का दीपक जलाकर इस भजन का श्रवण करने से मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से आदिशक्ति मां दुर्गा और उनके विभिन्न लोक स्वरूपों को समर्पित है। इसमें मां शीतला (आरोग्य की देवी) और मां काली (शक्ति और संहार की देवी) का विशेष स्मरण किया गया है।

इस भजन को अपनी आवाज देने वाले कलाकार भरत शर्मा व्यास हैं, जिन्हें भोजपुरी लोक संगीत का 'व्यास' कहा जाता है। उन्होंने पारंपरिक भोजपुरी निर्गुण, पूर्वी और देवी गीतों को शास्त्रीय मर्यादा और शुद्धता के साथ जन-जन तक पहुंचाया है। उनके गीतों में अश्लीलता से परे, विशुद्ध भक्ति और जीवन दर्शन का समावेश होता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

भोजपुरी अंचल में "सातो बहिनिया" की अवधारणा अत्यंत प्राचीन है। यह गीत किसी आधुनिक कवि की तात्कालिक कल्पना नहीं है, बल्कि यह सदियों से चली आ रही मौखिक लोक परंपरा (Oral Tradition) का हिस्सा है। भरत शर्मा व्यास ने इस पारंपरिक लोक धुन को परिष्कृत कर, आधुनिक वाद्यों के सुंदर संयोजन के साथ "सातो रे बहिनिया" एल्बम के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस एल्बम को 'हमार भोजपुरी' (HamaarBhojpuri) द्वारा जारी किया गया था, जिसने भोजपुरी भक्ति संगीत के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचा।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा शुद्ध और मधुर भोजपुरी है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे 'झुलुआ', 'निमिया', 'डारि', 'अइलीं' और 'गीतिया' मिट्टी की सोंधी खुशबू और आत्मीयता का अहसास कराते हैं।

काव्य शैली की दृष्टि से यह एक 'कजरी' और 'पूर्वी' लोक शैली से प्रभावित देवी गीत है। इसमें अनुप्रास अलंकार और रूपक अलंकार का सहज प्रयोग देखने को मिलता है। नीम के पेड़ को मां के मंदिर और उसकी डालियों को झूले के रूप में कल्पित करना लोक-काव्य की पराकाष्ठा है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:

  1. मातृ-भाव का आदर: ईश्वर को माता के रूप में पूजना हमें संसार की समस्त स्त्रियों के प्रति सम्मान और आदर का भाव रखना सिखाता है।
  2. सरलता और सहजता: मां को रिझाने के लिए किसी कठिन यज्ञ या आडंबर की आवश्यकता नहीं है; वे केवल एक साधारण नीम के पेड़ पर भक्तों के प्रेमपूर्ण झूले और गीतों से प्रसन्न हो जाती हैं।
  3. आरोग्य और स्वच्छता: मां शीतला का स्मरण हमें स्वच्छता, शुद्ध जल के महत्व और शारीरिक व मानसिक आरोग्य के प्रति सचेत रहने की प्रेरणा देता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

भोजपुरी शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
बहिनिया बहनें (देवी के सात स्वरूप) सप्तमातृका या नवदुर्गा के लोक स्वरूप
निमिया नीम का पेड़ शीतलता और आरोग्य प्रदान करने वाला पवित्र वृक्ष
झुलुआ झूला संसार रूपी झूले में देवी की आनंदमयी लीला
डारि डाल / शाखा प्रकृति का आश्रय
अइलीं आई हैं भक्तों के कल्याण हेतु देवी का पृथ्वी पर अवतरण

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"सातो रे बहिनिया अइलीं, झुलुआ झुलाए रे..."
अर्थ: देवी के सातों दिव्य स्वरूप (सातों बहनें) पृथ्वी पर भक्तों को आनंदित करने और स्वयं आनंदमयी लीला रचने के लिए पधारी हैं। वे नीम की डाल पर झूला झूल रही हैं।

"पहिली बहिनिया अइलीं, मैया मोरी दुर्गा, सिंह पर सवार होइके..."
अर्थ: सबसे पहले मां दुर्गा सिंह पर सवार होकर आती हैं। सिंह शक्ति और साहस का प्रतीक है, और मां अपने भक्तों पर अपनी ममतामयी दृष्टि से वात्सल्य की वर्षा करती हैं।

"दूसरी बहिनिया अइलीं, मैया मोरी काली, खप्पर चमकाए के..."
अर्थ: दूसरे रूप में मां काली का शुभागमन होता है। वे अपने हाथ में खप्पर और खड्ग लेकर दुष्टों और नकारात्मक शक्तियों का संहार करती हैं, जिससे भक्तों के जीवन से भय का नाश होता है।

"तीसरी बहिनिया अइलीं, मैया शीतला भवानी, कलश के जलवा से..."
अर्थ: तीसरे रूप में मां शीतला आती हैं, जो अपने कलश के पवित्र और शीतल जल से समस्त संसार के संताप, ज्वर और रोगों को दूर कर शांति प्रदान करती हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन से पूर्व या पश्चात मां भगवती के इस परम कल्याणकारी श्लोक का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे नारायणी! आप सब प्रकार का मङ्गल प्रदान करने वाली मङ्गलमयी हैं। आप कल्याणकारिणी, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली और गौरी हैं। आपको नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम सातो रे बहिनिया अइलीं (Saato Re Bahiniya)
मुख्य गायक भरत शर्मा व्यास (Bharat Sharma Vyas)
भाषा भोजपुरी (Bhojpuri)
मुख्य देवी-देवता मां दुर्गा, मां शीतला, मां काली (सातों बहिनिया)
मुख्य विषय देवी भक्ति, लोक आराधना, वात्सल्य भाव
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, देवी पूजन, मुंडन संस्कार, पारिवारिक मांगलिक कार्य

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस कालजयी भजन के मुख्य गायक भोजपुरी लोक संगीत के दिग्गज कलाकार भरत शर्मा व्यास हैं।

भोजपुरी लोक परंपरा में "सातों बहिनिया" देवी दुर्गा के सात लोक स्वरूपों (जैसे दुर्गा, काली, शीतला, फूलमती, बुढ़िया माई आदि) को कहा जाता है, जो शास्त्रीय 'सप्तमातृका' का ही लोक रूप हैं।

सनातन धर्म और लोक मान्यताओं में नीम के पेड़ को अत्यंत पवित्र और देवी शीतला का निवास स्थान माना गया है। इसकी पत्तियां और हवा आरोग्य प्रदान करती हैं, इसलिए भजन में मां के नीम की डाल पर झूला झूलने का वर्णन है।

यह भजन विशेष रूप से चैत्र और आश्विन मास की नवरात्रि, देवी जागरण, मुंडन संस्कार और सावन के महीने में देवी पूजा के समय सुनना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

हाँ, देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण में वर्णित 'सप्तमातृका' और 'नवदुर्गा' की अवधारणा ही इस लोक भजन का मुख्य आधार है, जिसे लोक कवियों ने सरल भाषा में पिरोया है।

भरत शर्मा व्यास के भजनों में शास्त्रीयता, लोक धुनों की शुद्धता, अश्लीलता से पूर्ण दूरी और गंभीर आध्यात्मिक संदेश होता है, जो सीधे हृदय को स्पर्श करता है।

इस भजन के श्रवण से मन को असीम शांति मिलती है, घर से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और देवी मां की कृपा से सुख, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

हाँ, यह भजन बच्चों को अपनी लोक-संस्कृति, मातृभाषा भोजपुरी और सनातन धर्म के गौरवशाली इतिहास व परंपराओं से जोड़ने का एक बेहतरीन माध्यम है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "सातो रे बहिनिया अइलीं" भजन के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लोक परंपराओं और शास्त्रीय ग्रंथों के समन्वय के साथ यह सामग्री तैयार की गई है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों को प्रामाणिक और ज्ञानवर्धक जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से संकलित की गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण (सप्तमातृका प्रसंग)
  • भोजपुरी लोक साहित्य एवं सांस्कृतिक अध्ययन, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद
  • भरत शर्मा व्यास - आधिकारिक एल्बम संग्रह (हमार भोजपुरी)

संबंधित भजन एवं लेख

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!