लोक आस्था के महान पर्व महापर्व छठ के पावन अवसर पर भोजपुरी संगीत जगत की लोकप्रिय गायिका अक्षरा सिंह द्वारा गाया गया भजन "ऊगा हो सुरुज देव" सनातन संस्कृति, सूर्य उपासना और लोक परंपरा का एक अत्यंत मनमोहक एवं जीवंत प्रतीक है। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य के प्रति मानव मन की अगाध निष्ठा, कृतज्ञता और अनन्य समर्पण का सजीव दस्तावेज है। छठ महापर्व के चार दिनों के कठिन अनुष्ठान के दौरान जब खरना और संध्या अर्घ्य का समय आता है, तब बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और देश-विदेश में बसे पूर्वांचल के प्रवासियों के घरों और घाटों पर यह सुमधुर स्वर गूंज उठता है। अक्षरा सिंह की सधी हुई और भावपूर्ण आवाज में यह भजन श्रोताओं के अंतर्मन को झंकृत कर देता है और उन्हें सीधे लोक संस्कृति की जड़ों से जोड़ता है। इस लेख में हम इसी पावन भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, इसके गहन आध्यात्मिक अर्थ, सूर्य उपासना के महत्व, लोक परंपरा और इसके सांस्कृतिक आयामों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
छठ महापर्व के इस पारंपरिक एवं लोकप्रिय गीत के बोल नीचे दिए गए हैं, जिन्हें आप शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण कर सकते हैं:
(मुखड़ा)
ऊगा हो सुरुज देव भइले अरघ के बेर,
सुनिअ पुकार हे दीनानाथ...
ऊगा हो सुरुज देव भइले अरघ के बेर,
सुनिअ पुकार हे दीनानाथ...
सुनिअ पुकार हे दीनानाथ,
सुरुज देव ऊगा हो...
(अंतरा 1)
घाटवा पे बान्हल जाला केरा केरे घववा,
तापे तापे दीयना जरेली गोड़रवा।
केरा के घववा से सोहे घाट सारा,
आइये ना सुरुज देव होखे उजियारा।
सुनिअ पुकार हे दीनानाथ,
सुरुज देव ऊगा हो...
(अंतरा 2)
सासु मोर पूजेली पहिले सुरुज देवता,
नित उठि धियावत बानी राउर पावन चरितरता।
दर्शन दियs ए सुरुज देवता हे दीनानाथ,
भकतुलक के राखीहें हमेशा तू लाज।
सुनिअ पुकार हे दीनानाथ,
सुरुज देव ऊगा हो...
(अंतरा 3)
नदियों के तीर लागे भारी भीड़ भइया,
छठि मइया के महिमा अपार हे कन्हैया।
सबेरे-सबेरे आइहें सुरुज रथ पर सवार,
करें जतन सब परिवार हे दीनानाथ।
सुनिअ पुकार हे दीनानाथ,
सुरुज देव ऊगा हो...
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह लोकगीत एवं भजन भगवान सूर्य (दीनानाथ) के प्रति एक भक्त की विनम्र पुकार और विनय को व्यक्त करता है। लोक परंपरा में सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जिन्हें आंखों से देखा जा सकता है और जिनकी ऊर्जा से संपूर्ण ब्रह्मांड का जीवन संचालित होता है।
भजन के मुखड़े में भक्त सूर्य देव से प्रार्थना करता है कि हे दीनानाथ! अर्घ्य देने का समय हो गया है, कृपया आप उदित हों और हमारी पुकार सुनें। छठ पूजा में जल और दूध का अर्घ्य देने का विशेष विधान है, और समय पर सूर्योदय न होने या बादलों के घिरे होने पर व्रती और उनके परिवारजन अत्यंत भावुक होकर सूर्य भगवान से प्रकट होने की प्रार्थना करते हैं।
अंतरा भागों में घाट की सुंदरता का वर्णन किया गया है। केले के खंभों (घववा) से सजे हुए घाट, जलते हुए दीये और नदी के तट पर उमड़ी भक्तों की भारी भीड़ इस लोक पर्व के सामाजिक और सांस्कृतिक वैभव को दर्शाती है। बहुएँ अपनी सासुओं और बुजुर्गों से सीखे हुए संस्कारों के अनुसार पूरी निष्ठा से व्रत का पालन करती हैं। यह गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही उस सनातन परंपरा का संवाहक है जहाँ प्रकृति, जल, अग्नि और सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
सनातन संस्कृति में सूर्योपासना का वेदों के काल से ही अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। ऋग्वेद में सूर्य देवता को जगत की आत्मा कहा गया है— "सूर्यात्मा जगतस्तस्थुषश्च"। यह भजन उसी वैदिक परंपरा का लोक रूप है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- प्रत्यक्ष देवता की उपासना: भगवान सूर्य एकमात्र ऐसे देवता हैं जिनके दर्शन साक्षात प्रतिदिन होते हैं।
- लोक संस्कृति का संगम: भोजपुरी आंचल की भाषा, मिठास और ठेठ लोक शैली इस भजन को हर दिल अजीज बनाती है।
- पारिवारिक और सामाजिक समरसता: छठ घाट पर जाति, वर्ग और ऊंच-नीच के भेद को मिटाकर सभी लोग एक समान भाव से सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
- मनोवैज्ञानिक शांति: इस भजन को सुनने से मन में सकारात्मक ऊर्जा, संयम और आशा का संचार होता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस पावन गीत को मुख्य रूप से कार्तिक और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में मनाए जाने वाले छठ महापर्व के दौरान गाया और सुना जाता है।
- संध्या अर्घ्य के समय: षष्ठी तिथि की शाम को जब अचल गामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तब घाटों पर यह गीत गूंजता है।
- प्रातः अर्घ्य के समय: सप्तमी तिथि की सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने से ठीक पहले यह प्रार्थना की जाती है कि "ऊगा हो सुरुज देव..."।
- व्रत के अनुष्ठान में: खरना और प्रसाद निर्माण के दौरान महिलाएं इसे सामूहिक रूप से गाती हैं।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के केंद्र में प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य (दीनानाथ) और प्रकृति की अधिष्ठात्री देवी छठी माता (षष्ठी देवी) हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, छठी माता भगवान सूर्य की बहन या शक्तिरूपा मानी गई हैं। संतान प्राप्ति, दीर्घायु, आरोग्यता और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत अत्यंत कठिन नियमों के साथ रखा जाता है। इस लोक परंपरा को जीवित रखने में लोक कलाकारों, गृहिणियों और संत तुल्य बुजुर्ग महिलाओं का अभूतपूर्व योगदान रहा है जिन्होंने मौखिक परंपरा के माध्यम से इसे सहेज कर रखा है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
"ऊगा हो सुरुज देव" मूल रूप से एक पारंपरिक लोकगीत है जिसे पीढ़ियों से पूर्वांचल और बिहार की लोक माटी में गाया जाता रहा है। समय-समय पर शारदा सिन्हा, मनोज तिवारी, पवन सिंह और अक्षरा सिंह जैसे दिग्गज कलाकारों ने इसे अपने आधुनिक संगीत और मधुर स्वरों से सजाकर वैश्विक स्तर पर स्थापित किया है। अक्षरा सिंह द्वारा गाया गया संस्करण विशेष रूप से युवाओं और आधुनिक श्रोताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ है, जो पारंपरिक धुनों को सहेजते हुए उच्च कोटि की ध्वनि गुणवत्ता प्रदान करता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
यह भजन ठेठ भोजपुरी लोक भाषा में रचित है। इसकी काव्य शैली अत्यंत सरल, सहज और हृदयस्पर्शी है। इसमें अलंकारों के जटिल प्रयोग के बजाय लोक जीवन के सीधे-सच्चे प्रतीकों का उपयोग किया गया है जैसे—केरा के घववा (केले का गुच्छा), गोड़रवा (दीपक रखने का स्थान), और घाटवा (नदी का घाट)। यह सरलता ही इस गीत की सबसे बड़ी ताकत है जो सीधे श्रोता के हृदय को छू लेती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें सिखाता है कि जीवन में कृतज्ञता का भाव कितना आवश्यक है। जिस सूर्य की ऊर्जा से संपूर्ण पृथ्वी पर अन्न, जल और जीवन पनपता है, उसके प्रति आभार व्यक्त करना मनुष्य का प्राथमिक कर्तव्य है। इसके अलावा, यह कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, संयम और अटूट आस्था बनाए रखने की प्रेरणा देता है। जैसे व्रती पूरे दिन निर्जल रहकर सूर्योदय की प्रतीक्षा करते हैं, वैसे ही साधक को भी अपने आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर साधना और प्रतीक्षा करनी पड़ती है.
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पदावली | सरल हिंदी अर्थ | सांस्कृतिक संदर्भ |
|---|---|---|
| दीनानाथ | दिनों (दुखियों) के नाथ या स्वामी | भगवान सूर्य का संबोधन |
| अरघ के बेर | अर्घ्य देने का समय | सूर्य को जल अर्पित करने का उपयुक्त क्षण |
| केरा के घववा | केले का पूरा गुच्छा | छठ पूजा में मंडप सजाने हेतु पवित्र फल |
| गोड़रवा | भूमि पर दीपक रखने का स्थान | घाट पर जलाए जाने वाले विशेष दीप |
| छठि मइया | षष्ठी देवी | प्रकृति और संतान की रक्षा करने वाली देवी |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"ऊगा हो सुरुज देव भइले अरघ के बेर..."
भावार्थ: हे भगवान सूर्य! अब अर्घ्य देने का समय हो चुका है, कृपया आप बादलों को चीरकर उदित हों। भक्त की यह पुकार उसकी उत्कंठित भावना को दर्शाती है कि कहीं अर्घ्य देने का शुभ मुहूर्त निकल न जाए।
"घाटवा पे बान्हल जाला केरा केरे घववा..."
भावार्थ: नदी के घाट को केले के थम्बों और गुच्छों से सजाया गया है। जमीन पर दीप जलाए गए हैं, जिनकी झिलमिलाहट से पूरा घाट आलोकित हो उठा है। हे सुरुज देव! आप आकर इस अंधकार को दूर करें और प्रकाश फैलाएं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
सूर्य उपासना के दौरान निम्नलिखित वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:
- सूर्य गायत्री मंत्र: ॐ आदित्याय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्यः प्रचोदयात्।
- प्रणाम मंत्र: जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम। तरिमारं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | ऊगा हो सुरुज देव (Uga Ho Suruj Dev) |
|---|---|
| गायक / कलाकार | अक्षरा सिंह (Akshara Singh) एवं पारंपरिक लोक स्वर |
| संगीत शैली | भोजपुरी लोक गीत / छठ भक्ति गीत |
| भाषा | भोजपुरी (हिन्दी लिपि) |
| ाराध्य देव | भगवान सूर्य (दीनानाथ) एवं छठी मइया |
| मुख्य अवसर | छठ महापर्व (कार्तिक एवं चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी) |
| भक्ति भाव | प्रकृति प्रेम, कृतज्ञता, विनय और समर्पण |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री पारंपरिक लोक साहित्य, सनातन सूर्य उपासना पद्धति और उपलब्ध लोक संगीत के संदर्भों के आधार पर तैयार की गई है। इसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक एवं सांस्कृतिक रूप से समृद्ध जानकारी प्रदान करना है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- वैदिक साहित्य एवं सूर्य उपासना परंपरा
- पूर्वांचल की लोक संस्कृति और छठ गीत परंपरा
- भोजपुरी लोक साहित्य और संगीत अकादमिक संदर्भ
- पारंपरिक सनातन व्रत एवं त्यौहार मार्गदर्शिका
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