bhakti gana bhojpuri mein मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

देहब अरघिया सूरजदेव के भक्ति इन हिंदी लिरिक्स

देहब अरघिया सूरजदेव के भोजपुरी छठ भजन के बोल (Lyrics) और हिंदी अर्थ पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित भक्तिरस से परिपूर्ण सुंदर प्रस्तुति।

भोजपुरी भक्ति संगीत की परंपरा में सूर्यदेव की उपासना का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। "देहब अरघिया सूरजदेव के" एक ऐसा पावन भजन है जो छठ पर्व और सूर्य षष्ठी व्रत की आत्मा को समेटे हुए है। इस भजन में भक्त अपने जीवन के प्रत्येक अंग को सूर्यदेव को अर्पित करने की भावना व्यक्त करता है — "देहब अरघिया" अर्थात् "अर्घ्य दूंगा, अर्पण करूंगा"। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि जीवात्मा का परम सत्ता के प्रति पूर्ण समर्पण का उद्घोष है। भोजपुरी भाषा की मिठास और लोक-भक्ति की गहराई इसमें जिस रूप में प्रकट होती है, वह साधक के हृदय को सहज ही भक्तिरस से भर देती है। छठ पूजा, सूर्य षष्ठी, कार्तिक मास की षष्ठी तिथि, तथा सूर्योपासना से जुड़े प्रत्येक अवसर पर यह भजन गाया जाता है। इसकी लोकप्रियता भोजपुरी भक्ति गीतों की परंपरा में एक विशेष स्थान रखती है, जहाँ लोकगायकों ने इसे अपनी स्वर-लहरी से अमर बना दिया है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मुखड़ा

देहब अरघिया सूरजदेव के,
देहब अरघिया सूरजदेव के।
उगेला सूरुज देव, अस्तेला सूरुज देव,
देहब अरघिया सूरजदेव के।

अंतरा १

करिया कमरिया बाँध के,
सिर पर सोनवा के सूपा,
ठाढ़ी होइब हम घाटे पे,
देहब अरघिया सूरजदेव के।

अंतरा २

केरा के पात पर रखब,
ठेकुआ आउर फलवा,
पानी के अंजुरी भरब,
देहब अरघिया सूरजदेव के।

अंतरा ३

सोनवा के आभूषण पहिनब,
हरदी के छाप लगइब,
सुगंधित फूल चढ़इब,
देहब अरघिया सूरजदेव के।

अंतरा ४

जेकरा लगे संतान नइखे,
ओकरा संतान देब,
जेकरा लगे धन नइखे,
ओकरा धन देब,
देहब अरघिया सूरजदेव के।

अंतरा ५

रोगी के रोग हरब,
दुखिया के दुख हरब,
भक्तन के रखब अपना पास,
देहब अरघिया सूरजदेव के।

अंतरा ६

करिया कमरिया बाँध के,
सिर पर सोनवा के सूपा,
ठाढ़ी होइब हम घाटे पे,
देहब अरघिया सूरजदेव के।

समापन

देहब अरघिया सूरजदेव के,
देहब अरघिया सूरजदेव के।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का केंद्रीय भाव "अर्पण" है। "देहब अरघिया" का अर्थ है — मैं अर्घ्य दूंगा, अर्थात् सूर्यदेव को जल एवं पुष्प अर्पित करूंगा। भोजपुरी में "देहब" क्रिया भविष्यकाल की दृढ़ संकल्पात्मक भावना व्यक्त करती है — यह केवल इच्छा नहीं, बल्कि व्रत का संकल्प है। भक्त कहता है कि सूर्यदेव जब उगते हैं और जब अस्त होते हैं, तब-तब मैं उन्हें अर्घ्य अर्पित करूंगा। यह भाव सूर्य की नित्य-निरंतर उपस्थिति और भक्त की नित्य-निरंतर श्रद्धा का प्रतीक है।

पहले अंतरे में भक्त अपनी वेशभूषा का वर्णन करता है — "करिया कमरिया बाँध के" अर्थात् काली कमरबंध बाँधकर, "सिर पर सोनवा के सूपा" अर्थात् सिर पर स्वर्ण या पीतल का सूप धारण करके। यह छठ व्रत की पारंपरिक वेशभूषा है, जो व्रती की शुद्धता, विनम्रता और समर्पण को दर्शाती है। घाट पर खड़े होकर अर्घ्य देने का दृश्य भारतीय लोक-आस्था का अत्यंत मार्मिक चित्रण है।

दूसरे अंतरे में पूजा सामग्री का वर्णन है — केले के पत्ते पर ठेकुआ और फल रखना, तथा अंजुलि में जल भरकर अर्घ्य देना। यह केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि भक्ति का जीवंत स्वरूप है। तीसरे अंतरे में भक्त सुगंधित पुष्प, हरदी का छाप और स्वर्ण आभूषणों का उल्लेख करता है, जो सूर्योपासना की समृद्ध परंपरा को दर्शाता है।

चौथे अंतरे में भजन सामाजिक करुणा की ओर बढ़ता है — जिसके पास संतान नहीं, उसे संतान मिले; जिसके पास धन नहीं, उसे धन मिले। यह भाव दर्शाता है कि सूर्यदेव केवल प्रकाश के देवता नहीं, बल्कि जीवन के पोषक और दुखहारी हैं। पाँचवें अंतरे में रोगी के रोग हरने और दुखिया के दुख दूर करने की प्रार्थना है। समापन में पुनः मुखड़ा दोहराया जाता है, जिससे भजन की चक्रीय संरचना पूर्ण होती है और भक्ति की धारा निरंतर बहती रहती है।

यह भजन साधक को यह सिखाता है कि जीवन के प्रत्येक क्षण को ईश्वर को अर्पित कर देना ही सच्ची भक्ति है। सूर्यदेव केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष देवता हैं — जिनके बिना पृथ्वी पर जीवन असंभव है। इस भजन का भावार्थ यही है कि जो सूर्य को अर्घ्य देता है, वह वस्तुतः अपने अहंकार को, अपने दुख को, अपने जीवन को परम सत्ता को समर्पित कर देता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन सूर्योपासना की लोक-परंपरा का प्रमुख स्तंभ है। सनातन धर्म में सूर्यदेव को प्रत्यक्ष देवता माना गया है — "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च" (सूर्य ही समस्त चराचर जगत की आत्मा हैं)। छठ पर्व पर गाए जाने वाले इस भजन की विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • भाषा की सहजता: भोजपुरी की लोक-भाषा में रचा यह भजन हर वर्ग के भक्त को सहज ही जोड़ लेता है।
  • व्रत-संकल्प की अभिव्यक्ति: "देहब अरघिया" का दोहराव भक्त के दृढ़ संकल्प को व्यक्त करता है।
  • लोक-संस्कृति का प्रतीक: सूप, ठेकुआ, केले का पत्ता, हरदी का छाप — ये सभी छठ पर्व की सांस्कृतिक पहचान हैं।
  • करुणा एवं समर्पण: भजन में संतान, धन, रोग-निवारण की प्रार्थना सामूहिक कल्याण की भावना दर्शाती है।
  • संगीतमयता: भोजपुरी लोकगायकों द्वारा गाया गया यह भजन अपनी मधुर लय और भावपूर्ण स्वर के कारण श्रोताओं के हृदय में गहराई तक उतरता है।

इस भजन को सुनने और गाने से साधक के भीतर आत्मविश्वास, धैर्य और श्रद्धा का संचार होता है। छठ व्रत करने वाले व्रती इस भजन को गाकर अपने व्रत की पूर्णता का अनुभव करते हैं। यह भजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय लोक-जीवन की आस्था, संस्कृति और परंपरा का जीवंत दस्तावेज है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यह भजन विशेष रूप से छठ पर्व के अवसर पर गाया जाता है, जो कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त सूर्य षष्ठी, रविवार व्रत, तथा सूर्यदेव की उपासना से जुड़े अन्य अवसरों पर भी इसका गायन किया जाता है।

गायन की विधि:

  • प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • पूर्व दिशा की ओर मुख करके ताम्र पात्र में जल, दूध, लाल पुष्प एवं अक्षत लेकर अर्घ्य दें।
  • संध्या के समय अस्ताचलगामी सूर्य को पश्चिम दिशा की ओर मुख करके अर्घ्य अर्पित करें।
  • भजन गाते समय मन में पूर्ण श्रद्धा और विनम्रता रखें।
  • घाट, नदी तट, तालाब या घर के आँगन में भी इस भजन का गायन किया जा सकता है।
  • भजन के साथ ढोल, झाल, मंजीरा आदि लोक-वाद्यों का प्रयोग करें।

श्रवण करते समय श्रोता को चाहिए कि वह भजन के भाव में स्वयं को डुबो दे। यह भजन केवल कानों से नहीं, हृदय से सुना जाता है। जो साधक नियमित रूप से इस भजन का श्रवण एवं गायन करता है, उसके जीवन में सूर्यदेव की कृपा से तेज, ओज और आत्मबल का संचार होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न १: "देहब अरघिया सूरजदेव के" भजन का मुख्य भाव क्या है?

इस भजन का मुख्य भाव सूर्यदेव के प्रति पूर्ण समर्पण और अर्घ्य अर्पण का संकल्प है। यह भक्त की दृढ़ श्रद्धा और व्रत-पालन की भावना को व्यक्त करता है।

प्रश्न २: यह भजन किस पर्व पर गाया जाता है?

यह भजन विशेष रूप से छठ पर्व (सूर्य षष्ठी) पर गाया जाता है, जो कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त रविवार व्रत और सूर्योपासना के अन्य अवसरों पर भी इसका गायन होता है।

प्रश्न ३: क्या इस भजन को घर पर गाया जा सकता है?

हाँ, इस भजन को घर के आँगन, छत या पूजा स्थल पर भी श्रद्धापूर्वक गाया जा सकता है। यदि संभव हो तो नदी, तालाब या किसी पवित्र जल स्रोत के निकट गाना अधिक फलदायी माना जाता है।

प्रश्न ४: सूर्यदेव को अर्घ्य देने की सही विधि क्या है?

ताम्र पात्र में जल, दूध, लाल पुष्प, अक्षत एवं गुड़ रखकर दोनों हाथों से सिर के ऊपर उठाकर धीरे-धीरे जल अर्पित करें। प्रातःकाल उगते सूर्य को और संध्या को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

प्रश्न ५: इस भजन को गाने से क्या लाभ होते हैं?

इस भजन के गायन एवं श्रवण से मन में शांति, आत्मविश्वास, रोगों से मुक्ति, संतान सुख, धन-समृद्धि तथा सूर्यदेव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह साधक के तेज और ओज को बढ़ाता है।

प्रश्न ६: क्या यह भजन किसी विशेष लोकगायक से जुड़ा है?

भोजपुरी भक्ति संगीत की परंपरा में इस भजन को अनेक लोकगायकों ने अपनी स्वर-लहरी में प्रस्तुत किया है। यह भजन लोक-परंपरा से निरंतर प्रवाहित होता आ रहा है और विभिन्न कलाकारों द्वारा गाया जाता रहा है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसमें भोजपुरी भक्ति परंपरा, सूर्योपासना एवं छठ पर्व से जुड़े भजन का भावार्थ एवं महत्व प्रस्तुत किया गया है। सामग्री को लोक-परंपरा, शास्त्रीय संदर्भों तथा भक्ति साहित्य के आधार पर संकलित किया गया है। पाठकों से अनुरोध है कि वे भजन के भाव को हृदय से ग्रहण करें और श्रद्धापूर्वक सूर्यदेव की उपासना करें।

सूर्योपासना का उल्लेख ऋग्वेद के सूक्तों में भी मिलता है, जहाँ सविता देवता की स्तुति की गई है। छठ पर्व की परंपरा को लोक-आस्था और शास्त्रीय दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जाता है।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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