Papmochani Ekadashi Vrat Katha मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

साथ हमारा छूटे कभी ना भक्ति इन हिंदी लिरिक्स

पढ़ें साथ हमारा छूटे कभी ना भक्ति इन हिंदी लिरिक्स का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

"साथ हमारा छूटे कभी ना भक्ति इन हिंदी लिरिक्स" (Saath Hamara Chhoote Kabhi Na Bhakti In Hindi Lyrics) केवल एक साधारण भजन नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा की परमात्मा के प्रति अनन्य पुकार और पूर्ण शरणागति का जीवंत दस्तावेज है। सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा में इस भजन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह भजन साधक के अंतर्मन में ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम, विरह, समर्पण और परम शांति का संचार करता है। जब कोई भक्त इस पावन गीत को गाता है, तो वह संसार के समस्त बंधनों से मुक्त होकर केवल अपने आराध्य के चरणों में लीन हो जाता है। नवरात्रि, शिवरात्रि, और दैनिक पूजा-अर्चना के अवसरों पर इस भजन का गायन साधक को आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर ले जाता है। आइए, इस लेख के माध्यम से हम इस दिव्य भजन के संपूर्ण लिरिक्स, उसके गहरे दार्शनिक भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और इससे मिलने वाली जीवन सीखों का विस्तार से अध्ययन करें।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

साथ हमारा छूटे कभी ना

(स्थायी - मुखड़ा)
साथ हमारा छूटे कभी ना,
भक्ति तुम्हारी छूटे कभी ना।
चाहे ये दुनिया रूठे मगर तुम,
हमसे हमारे रूठे कभी ना।
साथ हमारा छूटे कभी ना...

(अंतरा - 1)
सुख में भी याद करें हम तुमको,
दुख में भी ध्यान लगाएं तुमको।
जीवन की इस धूप-छांव में,
हाथ हमारा छूटे कभी ना।
साथ हमारा छूटे कभी ना...

(अंतरा - 2)
तुम ही हमारे माता-पिता हो,
तुम ही हमारे बंधु-सखा हो।
तुम बिन हमारा कोई नहीं है,
द्वार तुम्हारा छूटे कभी ना।
साथ हमारा छूटे कभी ना...

(अंतरा - 3)
भवसागर से पार लगा दो,
भक्ति का अपनी दान दिला दो।
चरणों की सेवा मिलती रहे बस,
ध्यान तुम्हारा छूटे कभी ना।
साथ हमारा छूटे कभी ना...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन मूलतः जीवात्मा और परमात्मा के शाश्वत संबंध को दर्शाता है। इस भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार की कोई भी परिस्थिति—चाहे वह सुख हो या दुख, अनुकूलता हो या प्रतिकूलता—भक्त को उसके आराध्य से अलग नहीं कर सकती।

भजन के आरंभ में भक्त ईश्वर से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! इस नश्वर संसार में सभी सांसारिक संबंध समय के साथ बदल जाते हैं या टूट जाते हैं। परंतु, मेरा और आपका जो भक्ति का संबंध है, वह जन्म-जन्मांतर का है। इसलिए यह साथ कभी नहीं छूटना चाहिए। भक्त कहता है कि यदि मेरे इस भक्ति मार्ग के कारण पूरी दुनिया भी मुझसे रूठ जाए या मेरा परित्याग कर दे, तो मुझे उसकी कोई चिंता नहीं है। मेरी एकमात्र प्रार्थना यही है कि आप मुझसे कभी न रूठें, क्योंकि आपके रूठने का अर्थ है जीवन का अंधकारमय हो जाना।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि जो भक्त अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हैं, मैं उनका योगक्षेम स्वयं वहन करता हूँ। यह भजन इसी दिव्य आश्वासन को आत्मसात करने का माध्यम है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे प्रत्येक भक्त का प्रिय बनाती हैं:

  • अनन्य शरणागति (Complete Surrender): भजन का प्रत्येक शब्द भक्त की निरहंकार अवस्था और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण को व्यक्त करता है।
  • समभाव की प्रेरणा: यह भजन हमें सिखाता है कि जीवन की 'धूप-छांव' अर्थात सुख और दुख दोनों ही परिस्थितियों में ईश्वर का स्मरण बनाए रखना चाहिए।
  • सरलता और मधुरता: इसकी भाषा इतनी सरल और सुगम है कि कोई भी साधारण व्यक्ति इसे आसानी से समझ और गा सकता है।
  • सर्वभौमिकता: यद्यपि इसे विभिन्न त्योहारों जैसे नवरात्रि और शिवरात्रि पर गाया जाता है, परंतु यह किसी एक विशिष्ट संप्रदाय तक सीमित नहीं है। इसे किसी भी इष्टदेव के प्रति गाया जा सकता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए प्रत्येक क्षण शुभ होता है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत फलदायी मानी गई है:

शुभ समय: इस भजन का गायन सुबह के समय (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या आरती के समय करना अत्यंत शांतिदायक होता है। नवरात्रि के पावन दिनों में देवी दुर्गा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर इसका गायन करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसी प्रकार, महाशिवरात्रि के अवसर पर भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह प्रसंग के समय इस भजन को गाना मन को भक्ति रस से सराबोर कर देता है।

गायन की विधि: शांत चित्त होकर, आंखें बंद करके और अपने आराध्य का स्वरूप मन में धारण करके इस भजन को गाना चाहिए। संगीत के वाद्ययंत्रों जैसे हारमोनियम, ढोलक या मंजीरे के साथ सामूहिक संकीर्तन में इसका गायन करने से वातावरण अत्यंत पवित्र हो जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से परमेश्वर के सगुण रूप को समर्पित है। शिव-पार्वती विवाह के प्रसंगों में इस भजन को भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट संबंध के प्रतीक के रूप में गाया जाता है। इसके अतिरिक्त, नवरात्रि के समय भक्त इसे आदिशक्ति मां दुर्गा के चरणों में समर्पित करते हैं।

भक्ति आंदोलन के संतों, जैसे गोस्वामी तुलसीदास, कबीरदास और मीराबाई ने भी सदैव इसी प्रकार की अनन्य भक्ति की वकालत की है। मीराबाई का गिरधर गोपाल के प्रति प्रेम और तुलसीदास जी का श्री राम के प्रति समर्पण भी इसी भाव को दर्शाता है कि "साथ हमारा छूटे कभी ना"।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन भारतीय लोक-भक्ति परंपरा का एक अमूल्य हिस्सा है। इसकी रचना किसी आधुनिक कवि द्वारा पारंपरिक भक्ति सिद्धांतों को ध्यान में रखकर की गई है। इस भजन को विभिन्न प्रसिद्ध गायकों ने अपनी मधुर आवाज देकर जन-जन तक पहुंचाया है। इसकी पृष्ठभूमि में उपनिषदों और पुराणों का वह दर्शन छुपा है जो आत्मा को परमात्मा का ही एक अंश मानता है। जैसे एक नदी समुद्र में मिलने के लिए व्याकुल रहती है, वैसे ही भक्त की आत्मा परमात्मा से सदा जुड़े रहने के लिए इस भजन के माध्यम से प्रार्थना करती है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें तत्सम और तद्भव शब्दों का अत्यंत सुंदर समन्वय किया गया है।

काव्य शैली: यह एक गेय पद (गीत) है, जिसमें लय और ताल का विशेष ध्यान रखा गया है। इसमें प्रयुक्त रूपक अलंकार (जैसे जीवन की धूप-छांव, भवसागर) कविता की सुंदरता को बढ़ाते हैं। "धूप-छांव" यहाँ सुख-दुख का प्रतीक है, और "भवसागर" इस संसार रूपी महासागर का प्रतीक है जिसे पार करना प्रत्येक मनुष्य का अंतिम लक्ष्य (मोक्ष) है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

इस दिव्य भजन से हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख मिलती हैं:

  • संसार की नश्वरता: यह भजन हमें याद दिलाता है कि संसार के सभी भौतिक सुख और संबंध अस्थायी हैं। केवल ईश्वर के साथ हमारा संबंध ही शाश्वत है।
  • सुख-दुख में समता: जीवन में सुख आने पर अहंकार न करें और दुख आने पर निराश न हों। दोनों ही स्थितियों में ईश्वर का हाथ थामे रखें।
  • लोक-लाज से ऊपर उठना: "चाहे ये दुनिया रूठे मगर तुम..." यह पंक्ति सिखाती है कि सत्य और भक्ति के मार्ग पर चलते हुए यदि समाज विरोध भी करे, तो भी हमें अपने पथ से विचलित नहीं होना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
साथ हमारा जीवात्मा और परमात्मा का संबंध आत्मा का परमात्मा से नित्य योग
धूप-छांव सुख और दुख संसार के द्वंद्व (अनुकूलता और प्रतिकूलता)
भवसागर संसार रूपी समुद्र जन्म और मृत्यु का चक्र जिससे मुक्त होना है
बंधु-सखा भाई और मित्र ईश्वर को ही अपना सर्वस्व मानना
भक्ति का दान निस्वार्थ सेवा और प्रेम ईश्वर से केवल उनकी भक्ति मांगना, भौतिक वस्तुएं नहीं

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. "साथ हमारा छूटे कभी ना, भक्ति तुम्हारी छूटे कभी ना।"
हे प्रभु! मेरा और आपका जो संबंध है, वह कभी न टूटे। मेरे मन में आपके प्रति जो श्रद्धा और भक्ति है, वह समय के साथ और सुदृढ़ होती जाए, कभी कम न हो।

2. "चाहे ये दुनिया रूठे मगर तुम, हमसे हमारे रूठे कभी ना।"
यदि भक्ति के मार्ग पर चलने के कारण सांसारिक लोग मुझसे नाराज हो जाएं या मेरा साथ छोड़ दें, तो मुझे कोई परवाह नहीं है। परंतु हे दयानिधान! आप मुझसे कभी विमुख मत होना, क्योंकि आपके बिना मेरा अस्तित्व ही शून्य है।

3. "सुख में भी याद करें हम तुमको, दुख में भी ध्यान लगाएं तुमको।"
साधारणतः मनुष्य दुख में ईश्वर को याद करता है और सुख में भूल जाता है। लेकिन मैं ऐसी भक्ति चाहता हूँ जहाँ सुख में भी मेरा सिर आपके चरणों में झुका रहे और दुख में भी मेरा विश्वास डगमगाए नहीं।

4. "जीवन की इस धूप-छांव में, हाथ हमारा छूटे कभी ना।"
जीवन उतार-चढ़ाव का नाम है। इस यात्रा में चाहे जैसी भी परिस्थिति आए, आप सदैव मेरा मार्गदर्शन करते रहें और मेरा हाथ थामे रखें।

5. "तुम ही हमारे माता-पिता हो, तुम ही हमारे बंधु-सखा हो।"
यह पंक्ति प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक "त्वमेव माता च पिता त्वमेव..." का हिंदी रूपांतरण है। ईश्वर ही हमारे सच्चे माता, पिता, भाई और मित्र हैं।

6. "भवसागर से पार लगा दो, भक्ति का अपनी दान दिला दो।"
इस संसार रूपी मायाजाल से पार उतरने का एकमात्र साधन आपकी भक्ति है। मुझे अपनी निष्काम भक्ति का वरदान दीजिए ताकि मैं मोक्ष को प्राप्त कर सकूं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भावों को पुष्ट करने वाले कुछ अत्यंत पावन मंत्र और श्लोक निम्नलिखित हैं:

1. आत्म-समर्पण श्लोक:

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥

2. भगवद्गीता का आश्वासन (अध्याय 9, श्लोक 22):

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

इन श्लोकों का नियमित पाठ करने से साधक के भीतर इस भजन के प्रति श्रद्धा और अधिक प्रगाढ़ हो जाती है। इसके साथ ही, जीवन में सुख-समृद्धि के लिए श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ भी अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण का विषय महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम साथ हमारा छूटे कभी ना भक्ति इन हिंदी लिरिक्स
मुख्य विषय पूर्ण शरणागति, अनन्य भक्ति, ईश्वर प्रेम
मुख्य आराध्य भगवान शिव-पार्वती, मां दुर्गा, श्री कृष्ण (सर्व-देव)
काव्य शैली गेय पद (भक्ति गीत)
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, महाशिवरात्रि, दैनिक संध्या आरती, सत्संग
मुख्य संदेश सुख-दुख में समभाव रखना और ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण (शरणागति) है। यह हमें सिखाता है कि सांसारिक संबंध और परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन ईश्वर के साथ हमारा भक्ति का संबंध शाश्वत और अपरिवर्तनीय होना चाहिए।

यह एक सार्वभौमिक भजन है। इसे भगवान शिव-पार्वती, माता दुर्गा, भगवान विष्णु या श्री कृष्ण सहित किसी भी इष्टदेव की आराधना के लिए गाया जा सकता है। शिवरात्रि पर इसे शिव-पार्वती के अटूट संबंध के रूप में और नवरात्रि में मां दुर्गा की स्तुति के रूप में गाया जाता है।

इस भजन को गाने का सबसे उत्तम समय सुबह का ब्रह्म मुहूर्त या शाम की संध्या आरती का समय है। शांत वातावरण में इसका गायन करने से मन को गहरी शांति मिलती है।

भजन में "धूप-छांव" का उपयोग मानव जीवन में आने वाले सुख और दुख के उतार-चढ़ाव को दर्शाने के लिए एक रूपक के रूप में किया गया है।

हाँ, इस भजन का मूल भाव श्रीमद्भगवद्गीता के 'भक्ति योग' और 'शरणागति योग' से गहराई से प्रेरित है, जहाँ भगवान अर्जुन को सब कुछ छोड़कर केवल उनकी शरण में आने का उपदेश देते हैं।

इस भजन को गाते समय मन में पूर्ण विनम्रता, अहंकार का त्याग और अपने आराध्य के प्रति अगाध प्रेम व विश्वास होना चाहिए।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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