लोक आस्था के महान पर्व 'छठ पूजा' में प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्यदेव की उपासना का एक अद्वितीय और अत्यंत भावुक स्वरूप देखने को मिलता है। पारंपरिक भोजपुरी छठ गीत "बदरी चिर के आई उगी हे सूर्यदेव" (Badari Chir Ke Aai Ugi He Suryadev) इसी पावन भक्ति भावना का सजीव संगीतमय प्रतीक है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी और सप्तमी तिथि पर जब व्रती नदियां और घाटों के ठंडे जल में खड़े होकर प्रातःकालीन अर्घ्य के लिए भगवान भास्कर की प्रतीक्षा करते हैं, तब यह गीत संपूर्ण वातावरण को भक्ति रस से सराबोर कर देता है। इस गीत में भक्त का अपने इष्ट देव के प्रति अनन्य प्रेम, श्रद्धा, और प्राकृतिक प्रतिकूलताओं के बीच भी सूर्यदेव के दर्शन पाने की कातर प्रार्थना निहित है। भोजपुरी संगीत जगत् में पवन सिंह, खेसारी लाल यादव और शारदा सिन्हा जैसे महान गायकों द्वारा गाए गए छठ गीतों की यह महान परंपरा सनातन धर्म के सूर्योपसना विधान और छठ महापर्व की सांस्कृतिक जड़ों को गहराई से रेखांकित करती है।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics
॥ बदरी चिर के आई उगी हे सूर्यदेव ॥
॥ मुखड़ा ॥
बदरी चिर के आई उगी हे सूर्यदेव,
अढ़वा प जलवा ढारिं, अर्घिया देबइ हे सूर्यदेव।
बदरी चिर के आई उगी हे सूर्यदेव,
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय,
दुखवा हरहु छठी माई, अरज सुनहीं हे सूर्यदेव!
॥ अंतरा १ ॥
जाड़े के दिनवा में जलवा में ठाढ़ बानी,
गोड़वा थर-थर कांपे, आस लगाइ बानी।
अंधियारा छाएल बा, अंबर के छाती पर,
किरण बिखेरी अब आई हे सूर्यदेव!
बदरी चिर के आई उगी हे सूर्यदेव...
॥ अंतरा २ ॥
माथे पर दउरा उठवले बाड़े पूजनहार,
फल फूल नारियल सोहे, सेवा स्वीकार।
दीनानाथ कृपा करीं, दर्शन दीहीं अपार,
सभकर मनोरथ पूरा करीं हे सूर्यदेव!
बदरी चिर के आई उगी हे सूर्यदेव...
॥ अंतरा ३ ॥
छठी मैया के व्रतिया में शुद्ध मन भाव,
तप और संयम से पूजीं प्रभु के पाँव।
सबके सुखी राखीं, बांझी के गोद भरीं,
अंधकार दूर करीं, जग उजियार करीं हे सूर्यदेव!
बदरी चिर के आई उगी हे सूर्यदेव...
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
भोजपुरी लोक संस्कृति में रचा-बसा यह पावन छठ गीत भगवान सूर्यदेव (दीनानाथ) के प्रति अत्यंत कातर एवं भावपूर्ण पुकार है। जब छठ पर्व की प्रातःकालीन बेला में सूर्योदय से पूर्व शीतल जल में खड़े व्रती आकाश में बादलों का आवरण देखते हैं, तो उनका हृदय प्रभु दर्शन के लिए व्याकुल हो उठता है। इस गीत के प्रत्येक छंद में निहित अर्थ को नीचे विस्तार से समझाया गया है:
मुखड़ा का अर्थ (Refrain Meaning)
भक्त हाथ जोड़कर भगवान सूर्यदेव से विनती करते हैं— "हे प्रकाश के पुंज भगवान सूर्यदेव! आप आकाश में छाए बादलों को चीरकर (बदरी चिर के) उदित हो जाइए। हम जलधारा अर्पण (अर्घ्य) करने के लिए पवित्र अर्घ्य पात्र लेकर आपकी प्रतीक्षा में खड़े हैं। कच्चे बांस की सुंदर लचकत बहंगी में सजे पूजन सामग्री और फलों को लेकर हम आपकी शरण में आए हैं। हे छठी मैया और हे सूर्यदेव! हमारे समस्त कष्टों एवं दुखों का हरण कीजिए और हमारी कातर प्रार्थना स्वीकार कीजिए।"
प्रथम अंतरा का अर्थ (First Stanza Meaning)
गीत के पहले अंतरे में छठ व्रत की कठोरता और निष्ठा का वर्णन है— "कार्तिक मास की शीतल सुबह में, जाड़े के मौसम में हम पवित्र नदी व पोखर के ठंडे जल में खड़े हैं। ठंड के कारण हमारे पैर थर-थर कांप रहे हैं, किंतु हमारे मन में आपके उदित होने की अटल आशा बसी हुई है। संपूर्ण आकाश पर प्रातःकाल का अंधियारा छाया हुआ है, हे दीनानाथ! अपनी मंगलमयी रश्मियों और स्वर्ण किरणों को बिखेरते हुए अब आप प्रकट हो जाइए।"
द्वितीय अंतरा का अर्थ (Second Stanza Meaning)
द्वितीय अंतरे में श्रद्धा भाव और प्रसाद का चित्रण है— "माथे पर सूप और दउरा उठाए हुए पूजक (सधवा व व्रती) आपकी सेवा में खड़े हैं। इस दउरे में शुद्धता से तैयार ठेकुआ, मौसमी फल, गन्ना और नारियल सुशोभित हो रहे हैं। हे दीनदयाल सूर्यदेव! हमारी इस लघु सेवा को स्वीकार करें और हमें अपने प्रत्यक्ष रूप के अपार दर्शन दें। इस संसार में उपस्थित सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करें।"
तृतीय अंतरा का अर्थ (Third Stanza Meaning)
अंतिम अंतरे में सर्वकल्याण और लोक-मंगल की भावना निहित है— "छठी मैया का यह पावन व्रत पूर्ण आत्म-शुद्धि, कठोर तप, और मानसिक संयम के साथ धारण किया गया है। हम आपके पावन चरणों की पूजा करते हैं। हे भगवान सूर्यदेव! संसार के सभी प्राणियों को सुखी एवं निरोगी रखिए, संतानहीनों को संतान का सुख प्रदान कीजिए, और अज्ञान व अंधकार को दूर कर पूरे जगत में ज्ञान और स्वास्थ्य का उजियार (प्रकाश) फैलाइए।"
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
छठ महापर्व का यह प्रसिद्ध लोकगीत मूलतः 'समर्पण', 'प्रतीक्षा' और 'कृपा-याचना' की भावना से ओतप्रोत है। सनातन वैदिक दर्शन में सूर्यदेव को साक्षात 'प्रत्यक्ष देव' और जगत की आत्मा माना गया है ("सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च")। इस गीत में निम्नलिखित मुख्य भावनाएं उभरकर सामने आती हैं:
- प्रकृति और ईश्वर का तादात्म्य: यह गीत मनुष्य का प्रकृति (सूर्य, जल, वायु, आकाश) के साथ अटूट आध्यात्मिक संबंध स्थापित करता है।
- कठोर तप एवं निष्ठा: जल में निर्जला खड़े होकर कांपते शरीर से सूर्यदेव की प्रतीक्षा करना साधक के दृढ़ विश्वास और तपोबल को दर्शाता है।
- सामूहिक भक्ति भाव: इस गीत में केवल व्यक्तिगत सुख की कामना नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों के कल्याण, वंश वृद्धि, स्वास्थ्य और उजियार की मंगलकामना की गई है।
गीत की जानकारी | Song Information
| विषय / मद | विस्तृत विवरण |
|---|---|
| गीत का शीर्षक | बदरी चिर के आई उगी हे सूर्यदेव (Badari Chir Ke Aai Ugi He Suryadev) |
| संबद्ध पर्व / त्यौहार | छठ पूजा (कार्तिक एवं चैत्र छठ महापर्व) |
| मुख्य देवता | भगवान सूर्यदेव (भास्कर / दीनानाथ) एवं छठी मैया (षष्ठी देवी) |
| भाषा एवं बोली | भोजपुरी (लोकगीत परंपरा) |
| प्रसिद्ध गायक/कलाकार | पवन सिंह, खेसारी लाल यादव, शारदा सिन्हा व अन्य लोक कलाकार |
| संगीत शैली | पारंपरिक छठ भक्ति लोकगीत (Chhath Devotional Folk Geet) |
| मुख्य भाव (Mood) | विनय, करुणा, समर्पण, और उषा-वंदना |
गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators
भोजपुरी लोक संगीत की यह विशेषता है कि अनेक छठ गीत युगों से मौखिक परंपरा द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होते आए हैं। "बदरी चिर के आई उगी हे सूर्यदेव" मूल रूप से लोक-मानस द्वारा रचित पारंपरिक अर्घ्य गीत है। आधुनिक काल में भोजपुरी संगीत उद्योग के अग्रणी गायकों जैसे पवन सिंह और खेसारी लाल यादव ने इसे नए संगीतमय संयोजन के साथ प्रस्तुत किया है, जिससे यह आधुनिक युवाओं और विदेशों में बसे भोजपुरी भाषी समुदाय में अत्यंत लोकप्रिय हुआ है। स्वर कोकिला स्वर्गीय शारदा सिन्हा जी द्वारा गाए गए इसी भाव के गीतों ने छठ गीतों को शास्त्रीय एवं वैश्विक पहचान दिलाई है।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| भोजपुरी शब्द | सरल हिंदी अर्थ | संदर्भगत व्याख्या |
|---|---|---|
| बदरी (Badari) | बादल / मेघ | प्रातःकाल आकाश में छाए हुए मेघ जो सूर्य की किरणों को ढक लेते हैं। |
| अढ़वा (Arhawa) | अर्घ्य पात्र / कलश | सूर्यदेव को जल देने हेतु प्रयुक्त विशेष पावन पात्र या सूप। |
| बहंगिया (Bahangiya) | बांस का बहंगी / कांवर | कच्चे बांस से बना कंधा-पात्र जिसमें प्रसाद का दउरा लादकर घाट पर ले जाया जाता है। |
| ठाढ़ (Thadh) | खड़े होना | शीतल जल के भीतर घुटने या कमर तक खड़े रहकर प्रतीक्षा करना। |
| दउरा (Daura) | बांस की टोकरी | छठ पूजा के फल और ठेकुआ प्रसाद को रखने वाली पवित्र बांस की टोकरी। |
| दीनानाथ (Deenanath) | दीनों के स्वामी / सूर्यदेव | भगवान सूर्य का एक पौराणिक और भक्तिमय नाम। |
| बांझी (Baanjhi) | निःसंतान स्त्री | छठ मैया से संतान प्राप्ति हेतु मनोकामना मांगने वाली महिला। |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
वैदिक वांग्मय में सूर्य की उपासना आरोग्य, तेज, ज्ञान और जीवन-शक्ति प्राप्त करने का मुख्य साधन मानी गई है। आदित्य हृदय स्तोत्र में भी सूर्यदेव को समस्त जगत का रक्षक और प्रकाशक कहा गया है। यह छठ गीत उसी वैदिक परंपरा का लोकभाषा में प्राकट्य है:
प्रत्यक्ष देव की प्रत्यक्ष साधना
अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा पूजा की तुलना में छठ पर्व पर प्रत्यक्ष दिखने वाले सूर्यदेव की पूजा होती है। जब साधक प्रातःकाल जल में खड़ा होकर "बदरी चिर के आई" गाता है, तो वह सीधे दृश्य जगत के नियंत्रक से संवाद स्थापित कर रहा होता है।
समानता और पवित्रता का प्रतीक
छठ महापर्व में ऊंच-नीच, जाति-पात का कोई भेदभाव नहीं होता। बांस की बहंगी और मिट्टी के चूल्हे पर बना ठेकुआ सभी के लिए एक समान पवित्र है। यह गीत लोक-समरसता की इसी दिव्य परंपरा को स्वर देता है।
उषा काल एवं स्वास्थ्य लाभ
प्रातःकाल सूर्योदय के समय जल में खड़े होकर सूर्य की किरणों का स्वागत करना वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक दृष्टि से भी शरीर में विटामिन-डी, सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति का संचार करता है।
गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons
- धैर्य और आशा (Patience & Hope): घने बादलों और अंधकार के बीच भी सूर्यदेव के प्रकट होने की आशा रखना सिखाता है कि जीवन के कठिन दौर के बाद सफलता का सूर्य अवश्य उदित होता है।
- प्रकृति का संरक्षण (Environmental Consciousness): नदियां, जल, बांस, फल-फूल और सूर्य की महत्ता को समझना प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का संदेश देता है।
- संयम एवं अनुशासन (Self-Discipline): कठिन व्रत के नियमों का पालन करते हुए ईश्वर-लीला का गान करना मन को संयमित और सुदृढ़ बनाता है।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
यद्यपि यह गीत वर्ष भर सूर्य उपासना और आध्यात्मिक शांति के लिए सुना जा सकता है, किंतु निम्नलिखित अवसरों पर इसका विशेष महत्व है:
- कार्तिक छठ पर्व के उषा अर्घ्य के समय: चतुर्थ दिन प्रातःकाल जब नदियां व तालाब के घाटों पर अर्घ्य अर्पण किया जाता है।
- चैत्री छठ पूजा: चैत्र मास में आयोजित होने वाले छठ पर्व के दौरान।
- रविवार सूर्य व्रत: प्रत्येक रविवार को भगवान सूर्य की पूजा और सूर्य चालीसा के पाठ के साथ।
- संक्रांति एवं मकर संक्रांति: जब सूर्यदेव उत्तरायण होते हैं, तब प्रातःकाल की साधना में।
एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance
| मापदंड | विवरण |
|---|---|
| गीत का नाम | बदरी चिर के आई उगी हे सूर्यदेव |
| संबद्ध देवी-देवता | भगवान सूर्यदेव एवं छठी मैया |
| मुख्य अवसर | छठ पूजा (प्रातःकालीन उषा अर्घ्य) |
| सांस्कृतिक क्षेत्र | बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) एवं वैश्विक भोजपुरी समुदाय |
| मुख्य प्रार्थना | स्वास्थ्य, आरोग्य, संतान प्राप्ति, दुख-निवारण एवं जगत्-कल्याण |
| संबद्ध पाठ / मंत्र | सूर्य मंत्र एवं जप विधि, छठ पूजा व्रत कथा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
'बदरी चिर के आई उगी हे सूर्यदेव' गीत का मुख्य अर्थ क्या है?
इस गीत का मुख्य अर्थ है कि हे सूर्यदेव! आकाश में छाए बादलों को चीरकर उदित हो जाइए, हम जल में खड़े होकर अर्घ्य देने के लिए आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हमारे दुखों का नाश कीजिए।
यह गीत मुख्य रूप से किस पर्व पर गाया जाता है?
यह गीत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वांचल के सबसे बड़े लोकपर्व 'छठ पूजा' के चौथे दिन (प्रातःकालीन अर्घ्य के समय) गाया जाता है।
छठ पूजा में सूर्यदेव को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?
सूर्यदेव प्रत्यक्ष देवता हैं जो पृथ्वी पर जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य के मुख्य स्रोत हैं। उनकी उपासना से आरोग्य, दीर्घायु और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
इस गीत में 'बहंगी' का क्या अर्थ है?
'बहंगी' कच्चे बांस से बना एक पारंपरिक कांवर-नुमा पात्र होता है, जिसमें छठ पूजा का प्रसाद, फल और सूप रखकर पूजा घाट तक ले जाया जाता है।
पवन सिंह और खेसारी लाल यादव के छठ गीतों की क्या विशेषता है?
पवन सिंह और खेसारी लाल यादव ने अपने मधुर और भावपूर्ण कण्ठ से पारंपरिक छठ गीतों को आधुनिक वाद्ययंत्रों के साथ गाकर नई पीढ़ी तक पहुंचाया है, जिससे भक्ति भाव अत्यधिक प्रभावशाली बनता है।
क्या यह गीत रोजाना प्रातःकाल सुना जा सकता है?
हाँ, भगवान सूर्यदेव के इस पावन भक्ति गीत को नित्य प्रातःकाल सुनने से मन में सकारात्मक ऊर्जा, शांति और आरोग्य भावना का संचार होता है।
छठ पर्व में प्रातःकालीन अर्घ्य का क्या समय होता है?
प्रातःकालीन अर्घ्य सूर्योदय के ठीक पहले (उषा काल) से लेकर सूर्यदेव के पूर्ण उदित होने तक दिया जाता है।
सूर्यदेव को अर्घ्य देते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?
अर्घ्य देते समय "ॐ सूर्याय नमः" या "ॐ घृणिः सूर्याय नमः" मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह आलेख भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा सनातन लोक-साहित्य, भोजपुरी सांस्कृतिक परंपराओं एवं प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथों के आधार पर संपादित किया गया है। सामग्री की प्रामाणिकता, भाषाई शुद्धता एवं आध्यात्मिक सत्यता का विशेष ध्यान रखा गया है। (संपादकीय रूप से तैयार सामग्री)।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भागवत पुराण - सूर्य उपासना प्रसंग
- वाल्मीकि रामायण - आदित्य हृदय स्तोत्र अध्याय
- बिहार एवं पूर्वांचल की पारंपरिक छठ लोकगीत धरोहर
- भोजपुरी लोक साहित्य एवं संस्कृति शोध ग्रंथ
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें