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वरतिया छठी माई के करब (Varatiya Chhathi Mai Ke Karab)

पढ़ें वरतिया छठी माई के करब | Khushboo Uttam | Varatiya Chhathi Mai Ke Karab | Chhath Song का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्या

"वरतिया छठी माई के करब" (Varatiya Chhathi Mai Ke Karab) भोजपुरी लोक संस्कृति और आस्था के महापर्व छठ पूजा का एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण गीत है। सुप्रसिद्ध लोक गायिका खुशबू उत्तम (Khushboo Uttam) द्वारा गाया गया यह गीत छठ व्रतियों के अटूट विश्वास, कठिन साधना और पारिवारिक समरसता को दर्शाता है। सनातन धर्म में छठ पूजा को प्रकृति, सूर्य देव और छठी मैया के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे पावन माध्यम माना गया है। इस गीत में एक नवविवाहिता या गृहणी अपने पति से छठ व्रत करने की इच्छा व्यक्त करती है और पूजा की तैयारियों में उनका सहयोग मांगती है। यह गीत पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के घरों में छठ पर्व के दौरान गूंजने वाला एक लोकप्रिय भजन है, जो श्रोताओं को भक्ति और पवित्रता के सागर में सराबोर कर देता है। इस लेख में हम इस पावन गीत के बोल, उसका विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और इससे जुड़ी परंपराओं का गहराई से विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics

वरतिया छठी माई के करब

वरतिया छठी माई के करब,
सजल घाट पर हम जाइब।
दउरा उठाईह पिया माथे पर,
छठी माई के गीत हम गाइब॥

कांच ही बांस के बहंगिया,
बहँगी लचकत जाए।
होईहे बलम जी कहारिया,
दउरा घाटे पहुँचाए॥

वरतिया छठी माई के करब,
सजल घाट पर हम जाइब॥

केरा के घवद घवद,
नारियल सेब मँगाईब।
सूप सजोईब पिया अपने हाथे,
अरघ छठी माई के देवाईब॥

वरतिया छठी माई के करब,
सजल घाट पर हम जाइब॥

गंगा जी के पावन तीरे,
वेदी हम बनाईब।
दीप जलाईब घीव के पिया,
छठी माई के ध्यान लगाईब॥

वरतिया छठी माई के करब,
सजल घाट पर हम जाइब।
दउरा उठाईह पिया माथे पर,
छठी माई के गीत हम गाइब॥

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth

यह पावन गीत छठ महापर्व की तैयारी और उसमें पति-पत्नी के सामूहिक योगदान को बहुत ही सुंदर ढंग से चित्रित करता है। यहाँ गीत के प्रत्येक भाग का विस्तृत भावार्थ प्रस्तुत है:

मुखड़ा: व्रत का संकल्प और घाट की यात्रा

गीत की शुरुआत में व्रतिन (व्रत रखने वाली महिला) अपने पति से कहती है कि वह इस वर्ष छठी मैया का पावन और कठिन व्रत करेगी। वह कहती है कि वह सज-धज कर सुंदर सजे हुए नदी घाट पर जाएगी। वह अपने पति से अनुरोध करती है कि वे पूजा सामग्री से भरा हुआ 'दउरा' (बांस की बड़ी टोकरी) अपने सिर पर उठाकर घाट तक ले चलें, और वह स्वयं छठी मैया के पावन गीतों का गायन करते हुए उनके पीछे-पीछे चलेगी। यह दृश्य भारतीय समाज में पति-पत्नी के संयुक्त धार्मिक कर्तव्यों और आपसी सहयोग को दर्शाता है।

प्रथम अंतरा: बहँगी और कहार का रूपक

दूसरे अंतरे में पारंपरिक छठ लोकगीत "कांच ही बांस के बहंगिया" का संदर्भ लिया गया है। व्रतिन कहती है कि कच्चे बांस से बनी बहँगी (कंधे पर रखकर सामान ढोने वाला ढांचा) भार के कारण लचक रही है। वह अपने पति को 'कहार' (भार उठाने वाला) बनने को कहती है, जो उस पवित्र दउरा को सुरक्षित रूप से नदी के घाट तक पहुँचाएगा। यह पंक्ति श्रम की गरिमा और ईश्वर के प्रति सेवा भाव को प्रदर्शित करती है।

द्वितीय अंतरा: पूजा सामग्री और अर्घ्य की तैयारी

तीसरे अंतरे में पूजा की सामग्रियों का वर्णन है। व्रतिन कहती है कि वह केले के बड़े-बड़े घवद (गुच्छे), नारियल, सेब और अन्य मौसमी फल मंगाएगी। वह अपने हाथों से सूप (बांस का सूपड़ा) सजाएगी और अपने पति के सहयोग से अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करेगी। यह प्रकृति के प्रति सम्मान और शुद्धता का प्रतीक है।

तृतीय अंतरा: गंगा घाट पर वेदी और दीपदान

अंतिम अंतरे में घाट के वातावरण का वर्णन है। व्रतिन कहती है कि वह गंगा नदी के पवित्र किनारे पर मिट्टी की सुंदर वेदी (सिरसोपता) बनाएगी। वहाँ शुद्ध घी के दीपक जलाए जाएंगे और वह पूरी श्रद्धा के साथ छठी मैया का ध्यान करेगी। यह साधना की पराकाष्ठा और ध्यान की पवित्रता को दर्शाता है।

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

यह गीत मुख्य रूप से 'समर्पण', 'सहयोग' और 'पारिवारिक एकता' की भावना पर आधारित है। छठ पूजा एक ऐसा पर्व है जो बिना किसी पुरोहित या मंत्रोच्चार के, सीधे प्रकृति और साधक के बीच का संबंध स्थापित करता है। इस गीत का संदेश यह है कि जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर किसी पवित्र कार्य को करते हैं, तो वह साधना सफल होती है। पति द्वारा दउरा उठाना और पत्नी द्वारा व्रत रखना गृहस्थ जीवन के संतुलन और सामंजस्य को दर्शाता है।

गीत की जानकारी | Song Information

विवरण जानकारी
गीत का नाम वरतिया छठी माई के करब (Varatiya Chhathi Mai Ke Karab)
गायिका खुशबू उत्तम (Khushboo Uttam)
भाषा भोजपुरी (Bhojpuri)
श्रेणी छठ देवी गीत / लोकगीत (Chhath Bhakti Song)
मुख्य विषय छठ व्रत का संकल्प, घाट की तैयारी और अर्घ्य
संगीत शैली पारंपरिक एवं आधुनिक लोक संगीत

गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators

खुशबू उत्तम भोजपुरी संगीत जगत की एक जानी-मानी और प्रतिष्ठित गायिका हैं। उन्होंने अपनी सुरीली और भक्तिमय आवाज से इस गीत को जीवंत बना दिया है। उनके साथ संगीतकारों और गीतकारों की टीम ने पारंपरिक छठ गीतों की मिठास को आधुनिक संगीत के साथ मिलाकर प्रस्तुत किया है, जिससे यह युवा पीढ़ी के बीच भी अत्यंत लोकप्रिय हो गया है। इस गीत का फिल्मांकन और संगीत संयोजन छठ पर्व की वास्तविक पवित्रता और उत्साह को दर्शाता है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द सरल अर्थ संदर्भ
वरतिया व्रत करने वाली / उपवास रखने वाली छठ व्रत का संकल्प लेने वाली महिला
दउरा बांस की बनी बड़ी टोकरी जिसमें पूजा का प्रसाद और फल रखे जाते हैं
बहंगिया बांस का बना हुआ काँवर या ढांचा कंधे पर रखकर पूजा सामग्री ले जाने के लिए
कहारिया कहार या भार उठाने वाला यहाँ पति को आदरपूर्वक कहार कहा गया है
घवद केले का पूरा गुच्छा छठ पूजा का मुख्य फल
अरघ अर्घ्य (जल या दूध का अर्पण) सूर्य देव को दिया जाने वाला अर्पण
वेदी मिट्टी का छोटा चबूतरा या सिरसोपता घाट पर पूजा और दीप जलाने का स्थान

गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance

छठ पूजा का आध्यात्मिक महत्व बहुत गहरा है। यह पर्व सूर्य देव (ऊर्जा के प्रत्यक्ष स्रोत) और उनकी शक्ति छठी मैया (उषा/प्रकृति) की पूजा का पर्व है। इस गीत में प्रयुक्त 'दउरा' और 'बहँगी' मिट्टी और बांस से बनी वस्तुएं हैं, जो यह सिखाती हैं कि ईश्वर की साधना के लिए किसी बहुमूल्य धातु या आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। प्रकृति द्वारा प्रदत्त सरल वस्तुएं ही ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त हैं। यह गीत हमें सिखाता है कि भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं है; यहाँ तक कि राजा हो या रंक, सभी को अपने सिर पर दउरा उठाकर घाट तक जाना होता है।

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

इस पावन छठ गीत से हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख मिलती हैं:

  • सादगी और पवित्रता: छठ पूजा में सादगी को सर्वोपरि माना गया है। हमें अपने जीवन में भी सादगी अपनानी चाहिए।
  • पारिवारिक सहयोग: पति-पत्नी का मिलकर व्रत की तैयारी करना वैवाहिक जीवन की सफलता और सामंजस्य का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • प्रकृति संरक्षण: नदी घाटों की सफाई और प्राकृतिक फलों का अर्घ्य देना हमें पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाता है।
  • समानता का संदेश: इस पर्व में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, सभी एक साथ घाट पर बैठकर प्रार्थना करते हैं।

गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing

यह गीत मुख्य रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चलने वाले चार दिवसीय महापर्व छठ के दौरान सुना जाता है। विशेष रूप से खरना के दिन और संध्या अर्घ्य के समय घाटों पर जाते समय इस गीत को बजाया और गाया जाता है। इसके अलावा, चैती छठ के अवसर पर भी भक्त इस गीत को बड़े चाव से सुनते हैं।

एक नजर में गीत की जानकारी | Song at a Glance

मुख्य बिंदु संक्षिप्त विवरण
गीत का शीर्षक वरतिया छठी माई के करब
मुख्य देवी-देवता छठी मैया (षष्ठी देवी) और सूर्य देव
मुख्य पर्व छठ पूजा (महापर्व)
गायन शैली भोजपुरी लोकगीत (Bhojpuri Folk)
मुख्य वाद्य यंत्र ढोलक, मंजीरा, बांसुरी और सिंथेसाइज़र
आध्यात्मिक संदेश प्रकृति पूजा, शुद्धता और पारिवारिक एकता

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस अत्यंत लोकप्रिय छठ गीत की मुख्य गायिका खुशबू उत्तम (Khushboo Uttam) हैं, जो अपनी सुरीली आवाज के लिए जानी जाती हैं।

'दउरा' बांस की बनी टोकरी होती है जिसमें पूजा का प्रसाद (ठेकुआ, फल आदि) रखा जाता है। 'बहँगी' उस बांस के ढांचे को कहते हैं जिससे दउरा को कंधे पर उठाकर घाट तक ले जाया जाता है। यह सादगी और प्राकृतिक जीवन शैली का प्रतीक है।

छठ पूजा मुख्य रूप से प्रत्यक्ष देवता सूर्य देव और उनकी मानस बहन या शक्ति 'छठी मैया' (षष्ठी देवी) को समर्पित है।

यह गीत शुद्ध भोजपुरी (Bhojpuri) भाषा में गाया गया है, जो उत्तर भारत के लोक संगीत की मिठास को दर्शाता है।

छठ पूजा का व्रत अत्यंत कठिन होता है और यह पूरे चार दिनों तक चलता है। इसमें नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य शामिल हैं।

इस गीत का मुख्य संदेश पारिवारिक सहयोग, शुद्धता, सादगी और प्रकृति के प्रति अटूट श्रद्धा है। यह गृहस्थ जीवन में धर्म के पालन को दर्शाता है।

हाँ, यद्यपि यह गीत छठ पर्व के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है, परंतु इसकी मधुर धुन और भक्तिमय बोलों के कारण भक्त इसे वर्षभर कभी भी सुन सकते हैं।

छठ पूजा में गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बने 'ठेकुआ' का विशेष महत्व है। इसके अतिरिक्त चावल के लड्डू (कसार) और मौसमी फल जैसे डाभ नींबू, केला और गन्ना भी चढ़ाए जाते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पर आधारित है। इस गीत के बोल और उसके भावार्थ को पारंपरिक छठ लोकगीतों की मर्यादा और भोजपुरी लोक साहित्य के मानकों के अनुसार संकलित किया गया है। खुशबू उत्तम का यह गीत आधुनिक डिजिटल युग में भी हमारी लोक विरासत को जीवित रखने का एक सराहनीय प्रयास है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पारंपरिक भोजपुरी लोक साहित्य एवं छठ पूजा पद्धति।
  • श्रीमद्भागवत पुराण और सूर्य उपनिषद (सूर्य देव की उपासना के संदर्भ में)।
  • बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय लोक परंपराएं।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 14 Oct 2026

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