भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

आशुतोष शशांक शेखर चंद्रमौली चिदंबरा कोटि-कोटि नमन शंभू कोटि नमन दिगंबर भक्ति इन हिंदी लिरिक्स

आशुतोष शशांक शेखर चंद्रमौली चिदंबरा भजन के संपूर्ण लिरिक्स, हिंदी अर्थ और महिमा पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत विशेष पाठ।

सृष्टि के कण-कण में व्याप्त, देवाधिदेव महादेव की आराधना के लिए रचित "आशुतोष शशांक शेखर चंद्रमौली चिदंबरा, कोटि-कोटि नमन शंभू कोटि नमन दिगंबरा" एक अत्यंत पावन, मधुर और हृदयस्पर्शी भजन है। यह भजन भगवान शिव के दिव्य स्वरूपों, उनके कल्याणकारी गुणों और उनकी असीम करुणा को समर्पित है। सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा में इस भजन का स्थान अत्यंत विशिष्ट है, क्योंकि इसके प्रत्येक शब्द में शिव के विभिन्न नामों का ऐसा अद्भुत संयोजन है जो साधक के अंतःकरण में भक्ति, शांति और वैराग्य का संचार करता है। इस भजन का गान करने से न केवल मानसिक क्लेशों से मुक्ति मिलती है, बल्कि साधक को भगवान शिव के परम कल्याणकारी स्वरूप का साक्षात्कार भी होता है। प्रस्तुत लेख में हम इस भजन के संपूर्ण लिरिक्स, उसके गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ, पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ और शिव साधना में इसके महत्व का सविस्तार विवेचन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ आशुतोष शशांक शेखर भजन ॥

आशुतोष शशांक शेखर, चन्द्र मौली चिदम्बरा,
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा।
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा॥

मन हरण हे शिव हरण, भव हरण हे परमेश्वरा,
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा।
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा॥

व्योमकेश पिनाकपाणि, नीलकंठ महेश्वरा,
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा।
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा॥

गंगाधर हे गौरीपति, नटराज हे जगदीश्वरा,
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा।
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा॥

कैलाशवासी करुणाकर, हे देव देव महेश्वरा,
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा।
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा॥

विघ्नहर्ता विश्वभर्ता, हे त्रिलोचन त्र्यम्बका,
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा।
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा॥

शरणपाल कृपाल शंकर, हे आशुतोष महेश्वरा,
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा।
कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन भगवान शिव के उन दिव्य नामों का संकलन है जो उनके शांत, उग्र, करुणामयी और दार्शनिक स्वरूपों को प्रकट करते हैं। भजन का मुख्य भाव पूर्ण शरणागति और कृतज्ञता है। साधक भगवान शिव को संबोधित करते हुए कहता है कि हे आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होने वाले), हे शशांक शेखर (मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले), हे चंद्रमौली और चिदंबरा (चेतन्य आकाश स्वरूप), आपको मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है।

इस भजन के माध्यम से भक्त अपने आराध्य के चरणों में स्वयं को समर्पित कर देता है। शिव को 'दिगंबर' कहकर पुकारा गया है, जिसका अर्थ है जिनकी दिशाएं ही वस्त्र हैं, अर्थात जो पूर्णतः मुक्त, निर्लिप्त और प्रकृति के स्वामी हैं। जब हम इस भजन का गायन करते हैं, तो हमारे भीतर का अहंकार शांत होता है और हम उस परम चेतना से जुड़ने लगते हैं जो सर्वव्यापी है। यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा है जो साधक को संसार के कोलाहल से दूर ले जाकर महादेव के शांत और आनंदमयी स्वरूप में लीन कर देती है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे अन्य भजनों से भिन्न और अत्यंत प्रभावशाली बनाती हैं:

  • नाम संकीर्तन की शक्ति: इस भजन में भगवान शिव के बारह से अधिक कल्याणकारी नामों का उच्चारण किया गया है। शास्त्रों के अनुसार, शिव के नामों का निरंतर जप करने से संचित पापों का नाश होता है।
  • राग और लय का समन्वय: इसकी सरल और सुमधुर धुन साधक को सहज ही ध्यान की अवस्था में ले जाती है। इसे गाते समय मन में एक विशेष प्रकार की शांति का अनुभव होता है।
  • दार्शनिक गहराई: 'चिदंबरा' और 'दिगंबरा' जैसे शब्द शिव के निराकार और सर्वव्यापी ब्रह्म स्वरूप को दर्शाते हैं, जो वेदांत दर्शन के अत्यंत निकट हैं।
  • समर्पण भाव: "कोटि-कोटि नमन" की पुनरावृत्ति भक्त के हृदय में विनम्रता और निरहंकारिता की भावना को सुदृढ़ करती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान शिव की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष समय और विधियां अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:

  • प्रातःकाल और संध्याकाल: ब्रह्ममुहूर्त में या संध्या आरती के समय इस भजन का पाठ करने से घर का वातावरण सकारात्मक और पवित्र बनता है।
  • विशेष अवसर: सोमवार, प्रदोष व्रत, शिवरात्रि और सावन के पावन महीने में इस भजन का सामूहिक संकीर्तन करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।
  • गायन की विधि: शांत चित्त होकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। सामने भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित करें। धूप-दीप प्रज्वलित कर पूर्ण श्रद्धा और भाव के साथ इस भजन का सस्वर गायन करें।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन देवों के देव महादेव, भगवान शिव को समर्पित है। शिव हिंदू त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) में संहार और पुनरुत्थान के देवता हैं। वे संहारक होने के साथ-साथ परम कल्याणकारी भी हैं। इस भजन की रचना पारंपरिक लोक-भक्ति और संतों की वाणी से प्रेरित है। यद्यपि इसके मूल रचयिता के विषय में कोई स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता, परंतु यह भजन सदियों से नाथ संप्रदाय और शिव भक्तों के बीच मौखिक परंपरा के माध्यम से अत्यंत लोकप्रिय रहा है। आधुनिक समय में कई प्रसिद्ध शास्त्रीय और पाश्र्व गायकों ने इसे अपनी सुमधुर आवाज देकर जन-जन तक पहुँचाया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि पूरी तरह से पौराणिक और दार्शनिक है। इसमें प्रयुक्त प्रत्येक नाम के पीछे एक विशेष पौराणिक कथा और आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है। उदाहरण के लिए, 'शशांक शेखर' नाम तब पड़ा जब महादेव ने चंद्रमा को क्षय रोग के श्राप से बचाने के लिए अपने मस्तक पर धारण किया था। इसी प्रकार, 'पिनाकपाणि' नाम उनके धनुष 'पिनाक' के कारण है। यह भजन इन सभी पौराणिक आख्यानों को अत्यंत संक्षेप में और काव्यात्मक रूप से प्रस्तुत करता है, जिससे भक्त को शिव के संपूर्ण चरित्र का स्मरण हो जाता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा संस्कृतनिष्ठ हिंदी है, जो अत्यंत सरल, सुबोध और कर्णप्रिय है। इसकी काव्य शैली 'पद' और 'मुक्तक' का सुंदर मिश्रण है। इसमें अंत्यानुप्रास (Rhyme) का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया गया है, जैसे 'चिदंबरा', 'दिगंबरा', 'परमेश्वरा', 'महेश्वरा'। यह अनुप्रास अलंकार भजन को एक विशेष संगीतमयता प्रदान करता है, जिससे इसे याद रखना और गाना अत्यंत सरल हो जाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें व्यावहारिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

  • सरलता और वैराग्य: शिव 'दिगंबर' हैं, जो यह सिखाता है कि बाहरी तड़क-भड़क और भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति से मुक्त होकर ही वास्तविक शांति प्राप्त की जा सकती है।
  • शीघ्र प्रसन्न होने का गुण (आशुतोष): जैसे शिव थोड़े से जल और बेलपत्र से प्रसन्न हो जाते हैं, वैसे ही हमें भी अपने जीवन में संतोषी और सरल स्वभाव का होना चाहिए।
  • विषपान की क्षमता (नीलकंठ): शिव ने संसार की रक्षा के लिए हलाहल विष को अपने कंठ में धारण किया। यह हमें सिखाता है कि जीवन की कठिनाइयों, कड़वाहट और निंदा को सहकर भी हमें दूसरों का कल्याण करना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ एवं महत्व
आशुतोष जो बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं शिव की असीम करुणा और दयालुता का प्रतीक।
शशांक शेखर जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है शीतलता, शांति और समय चक्र पर नियंत्रण के स्वामी।
चंद्रमौली चंद्रमा रूपी मुकुट धारण करने वाले मन की चंचलता को नियंत्रित करने वाले देव।
चिदंबरा चेतन्य रूपी आकाश जिनका वस्त्र है निराकार, अनंत और सर्वव्यापी ब्रह्म का स्वरूप।
दिगंबरा दिशाएं ही जिनका वस्त्र हैं पूर्ण वैराग्य, प्रकृति से परे और माया से मुक्त स्वरूप।
पिनाकपाणि जिनके हाथ में 'पिनाक' नामक धनुष है दुष्टों का संहार करने वाले और धर्म के रक्षक।
भव हरण संसार रूपी सागर के कष्टों को हरने वाले जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) प्रदान करने वाले।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

१. "आशुतोष शशांक शेखर, चन्द्र मौली चिदम्बरा..."
हे महादेव! आप अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होने वाले दयालु देव हैं। आपके मस्तक पर बालचंद्र सुशोभित है और आपका स्वरूप चेतन्य आकाश की भांति अनंत है।

२. "कोटि कोटि नमन शम्भू, कोटि नमन दिगम्बरा..."
हे कल्याणकारी शंभू! हे दिशाओं को ही अपना वस्त्र बनाने वाले दिगंबर शिव! आपको मेरा करोड़ों बार सादर प्रणाम है।

३. "मन हरण हे शिव हरण, भव हरण हे परमेश्वरा..."
आप भक्तों के मन को मोहने वाले हैं, उनके दुखों का हरण करने वाले हैं और इस संसार रूपी भवसागर के कष्टों से मुक्ति दिलाने वाले परमेश्वर हैं।

४. "व्योमकेश पिनाकपाणि, नीलकंठ महेश्वरा..."
आकाश ही जिनकी जटाएं हैं, जिनके हाथ में पिनाक धनुष है, और जिन्होंने लोक कल्याण के लिए विष पीकर अपने कंठ को नीला कर लिया, ऐसे महेश्वर को मेरा नमन है।

५. "गंगाधर हे गौरीपति, नटराज हे जगदीश्वरा..."
अपनी जटाओं में मां गंगा को धारण करने वाले, माता गौरी के स्वामी और सृष्टि के आदि नर्तक नटराज स्वरूप जगदीश्वर को मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के साथ भगवान शिव के निम्नलिखित मंत्रों का जप करने से साधना का फल कई गुना बढ़ जाता है:

१. शिव पंचाक्षरी मंत्र:

॥ ॐ नमः शिवाय ॥

२. महामृत्युंजय मंत्र:

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

इन मंत्रों का जप करने के लिए आप हमारी विस्तृत मार्गदर्शिका महामृत्युंजय मंत्र पर जा सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण का क्षेत्र महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम आशुतोष शशांक शेखर चंद्रमौली चिदंबरा
आराध्य देव भगवान शिव (महादेव)
मुख्य भाव (Bhava) भक्ति, समर्पण, वैराग्य और शरणागति
भाषा संस्कृतनिष्ठ हिंदी
उपयुक्त अवसर महाशिवरात्रि, सावन सोमवार, प्रदोष व्रत, दैनिक संध्या आरती
मुख्य संदेश अहंकार का त्याग और शिव चेतना में लीन होना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न १: 'आशुतोष' शब्द का क्या अर्थ है और यह शिव के लिए क्यों प्रयुक्त होता है?

उत्तर: 'आशुतोष' का अर्थ है "जो बहुत जल्दी (आशु) संतुष्ट या प्रसन्न (तोष) हो जाए"। भगवान शिव अपने भक्तों की थोड़ी सी भक्ति, एक लोटा जल या बेलपत्र अर्पित करने मात्र से ही अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं और मनचाहा वरदान दे देते हैं, इसलिए उन्हें आशुतोष कहा जाता है।

प्रश्न २: शिव को 'दिगंबर' क्यों कहा जाता है?

उत्तर: 'दिगंबर' दो शब्दों से मिलकर बना है - दिक् (दिशाएं) और अंबर (वस्त्र)। इसका अर्थ है जिनकी दिशाएं ही वस्त्र हैं। यह शिव के पूर्ण वैराग्य, माया से परे होने और संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त होने के निराकार स्वरूप को दर्शाता है।

प्रश्न ३: इस भजन का नियमित पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?

उत्तर: इस भजन के नियमित पाठ से मानसिक तनाव दूर होता है, मन को शांति मिलती है, एकाग्रता बढ़ती है और साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह भय और अकाल मृत्यु के भय से भी मुक्ति दिलाता है।

प्रश्न ४: क्या इस भजन को महिलाएं भी गा सकती हैं?

उत्तर: हाँ, भगवान शिव की आराधना और इस भजन का गायन पुरुष, महिलाएं और बच्चे सभी पूर्ण श्रद्धा के साथ कर सकते हैं। शिव भक्ति में किसी भी प्रकार का भेदभाव वर्जित है।

प्रश्न ५: 'चिदंबरा' शब्द का दार्शनिक अर्थ क्या है?

उत्तर: 'चिदंबरा' का अर्थ है "चित् (चेतना) रूपी अंबर (आकाश)"। इसका तात्पर्य यह है कि भगवान शिव केवल भौतिक रूप में ही नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि की परम चेतना और ज्ञान के रूप में सर्वत्र विद्यमान हैं।

प्रश्न ६: इस भजन को गाने का सबसे उत्तम समय कौन सा है?

उत्तर: इस भजन को गाने का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल सूर्योदय के समय और संध्याकाल में प्रदोष काल के दौरान माना जाता है।

प्रश्न ७: 'पिनाकपाणि' का क्या अर्थ है?

उत्तर: 'पिनाक' भगवान शिव के दिव्य धनुष का नाम है और 'पाणि' का अर्थ है हाथ। अर्थात, जिनके हाथ में पिनाक धनुष सुशोभित है, उन्हें पिनाकपाणि कहा जाता है।

प्रश्न ८: क्या इस भजन के साथ शिव चालीसा का पाठ भी किया जा सकता है?

उत्तर: हाँ, इस भजन के गायन के पश्चात श्री शिव चालीसा का पाठ करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों, शिव पुराण और पारंपरिक संकीर्तन पद्धतियों के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। इस भजन की व्याख्या में प्रयुक्त दार्शनिक शब्दों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है ताकि आम पाठक और साधक भी इसके गूढ़ अर्थ को समझ सकें। यह सामग्री पूरी तरह से शोधपरक और "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" है, जो पाठकों की आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करने और उन्हें सही ज्ञान प्रदान करने के उद्देश्य से लिखी गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिव पुराण: भगवान शिव के विभिन्न नामों और उनकी महिमा का मुख्य पौराणिक स्रोत।
  • श्रीमद्भगवद्गीता: नाम संकीर्तन और भक्ति योग के सिद्धांत।
  • सनातन भजन संग्रह: पारंपरिक भजन और लोक-साहित्य संकलन।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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