"अरघ देहब सुरुजदेव के" भोजपुरी लोक संस्कृति और सनातन हिंदू धर्म के सबसे पावन पर्व 'छठ पूजा' को समर्पित एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी भक्ति गीत है। यह गीत मुख्य रूप से युवा दिलों की धड़कन और सुप्रसिद्ध भोजपुरी गायक अरविंद अकेला 'कल्लू' द्वारा गाया गया है, जिसने अपनी मधुर ध्वनि और भक्तिमय धुनों से करोड़ों श्रद्धालुओं के दिलों में एक विशेष स्थान बनाया है। छठ महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, स्वच्छता, अनुशासन और सामूहिक समरसता का अनुपम उदाहरण है। इस गीत में भगवान सूर्य नारायण (सुरुजदेव) को अर्घ्य देने की पवित्र परंपरा, छठी मैया के प्रति अटूट श्रद्धा और व्रत रखने वाली महिलाओं (व्रतियों) के कठिन तप को बहुत ही सुंदर और सरल शब्दों में पिरोया गया है। इस लेख के माध्यम से हम इस पावन गीत के बोल, उसका विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और इससे जुड़े विभिन्न सांस्कृतिक पहलुओं का गहन विश्लेषण करेंगे।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Lyrics
मुखड़ा:
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए।
बहंगी लचकत जाए...
होई ना बलम जी कहरिया, बहंगी घाट पहुंचाए।
अरघ देहब सुरुजदेव के, अरघ देहब सुरुजदेव के...
अंतरा 1:
केला के पात पर उगेलन सुरुजदेव झांकेलन झुकेलन।
झांकेलन झुकेलन...
अंजलि में गंगा जल लेके, हम ठाढ़ बानी घाट पे।
अरघ देहब सुरुजदेव के, अरघ देहब सुरुजदेव के...
अंतरा 2:
दउरा में सजल बा ठेकुआ, फल-फूल और पकवान जी।
फल-फूल और पकवान जी...
छठी मैया के महिमा अपार बा, गावेला कुल जहान जी।
अरघ देहब सुरुजदेव के, अरघ देहब सुरुजदेव के...
अंतरा 3:
अरविन्द अकेला गावे गीतिया, कल्लू के अरज स्वीकार करीं।
कल्लू के अरज स्वीकार करीं...
सबके सुहाग सलामत रहे, अंचल में खुशियां हजार भरीं।
अरघ देहब सुरुजदेव के, अरघ देहब सुरुजदेव के...
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
यह पावन गीत "अरघ देहब सुरुजदेव के" छठ महापर्व के दौरान व्रतियों और उनके परिवारों की मनोदशा, तैयारियों और भगवान सूर्य के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा को दर्शाता है। गीत का भावार्थ अत्यंत सरल होते हुए भी गहरा आध्यात्मिक संदेश समेटे हुए है:
मुखड़े का भावार्थ:
गीत की शुरुआत "कांच ही बांस के बहंगिया" से होती है, जो छठ पूजा की पारंपरिक सामग्री को दर्शाती है। बांस को शुद्धता और प्रकृति का प्रतीक माना जाता है। जब बहंगी (बांस की टोकरियों को ले जाने वाला ढांचा) भारी पूजा सामग्री से लद जाती है, तो वह लचकने लगती है। व्रती अपने पति (बलम जी) से अनुरोध करती है कि वे कहार (सामग्री ले जाने वाले) की भूमिका निभाएं और इस पावन बहंगी को नदी या तालाब के घाट तक सुरक्षित पहुंचाएं, क्योंकि वे भगवान सूर्यदेव को संध्या और उषा काल का अर्घ्य देने जा रहे हैं।
प्रथम अंतरे का भावार्थ:
पहले अंतरे में प्रकृति और परमात्मा के सुंदर मिलन का वर्णन है। केले के पत्तों के पीछे से भगवान सूर्यदेव उदित हो रहे हैं और अपनी सुनहरी किरणों से संपूर्ण सृष्टि को आलोकित कर रहे हैं। भक्त नदी के पवित्र जल में खड़े होकर, अपनी अंजलि में गंगाजल लेकर भगवान सूर्यदेव के दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह दृश्य जीवात्मा की परमात्मा के प्रति तीव्र व्याकुलता और समर्पण को प्रदर्शित करता है।
द्वितीय अंतरे का भावार्थ:
दूसरे अंतरे में छठ पूजा के विशेष प्रसाद 'ठेकुआ' और अन्य मौसमी फलों का उल्लेख है। पीतल या बांस के दउरा (बड़ी टोकरी) में शुद्ध घी से बने ठेकुआ, केला, सेब, सिंघाड़ा, ईख (गन्ना) और नारियल को अत्यंत पवित्रता के साथ सजाया गया है। छठी मैया की महिमा इतनी महान और सर्वव्यापी है कि पूरा संसार उनके गीतों और भजनों से गूंज रहा है।
तृतीय अंतरे का भावार्थ:
अंतिम अंतरे में गायक अरविंद अकेला 'कल्लू' भगवान सूर्य और छठी मैया से प्रार्थना करते हैं कि वे उनकी इस छोटी सी भेंट और गीत रूपी सेवा को स्वीकार करें। वे सभी सुहागिनों के सुहाग की रक्षा और हर परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। यह प्रार्थना व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर संपूर्ण समाज के कल्याण की भावना को दर्शाती है।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
इस गीत की मुख्य भावना पूर्ण समर्पण (Sharanagati), पवित्रता (Purity) और प्रकृति पूजा (Nature Worship) है। सनातन धर्म में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जो बिना किसी भेदभाव के संपूर्ण चराचर जगत को जीवन, ऊर्जा और प्रकाश प्रदान करते हैं। यह गीत हमें सिखाता है कि ईश्वर की साधना के लिए किसी आडंबर या महंगे अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं है। बांस की बहंगी, मिट्टी के दीये, घर में बने ठेकुआ और नदी का किनारा—इन्हीं सरल और प्राकृतिक साधनों से भगवान सूर्यदेव प्रसन्न हो जाते हैं। यह गीत समाज में समानता और भाईचारे का संदेश भी देता है, क्योंकि छठ घाट पर अमीर और गरीब सभी एक साथ मिलकर एक ही जल में खड़े होकर सूर्यदेव की आराधना करते हैं।
गीत की जानकारी | Song Information
| विवरण (Parameter) | जानकारी (Information) |
|---|---|
| गीत का नाम (Song Name) | अरघ देहब सुरुजदेव के (Aragh Dehab Surujdev Ke) |
| मुख्य गायक (Singer) | अरविंद अकेला 'कल्लू' (Arvind Akela Kallu) |
| गीतकार (Lyricist) | पारंपरिक एवं आधुनिक संकलन |
| संगीत शैली (Genre) | भोजपुरी भक्ति गीत / छठ गीत (Bhojpuri Devotional / Chhath Geet) |
| भाषा (Language) | भोजपुरी (Bhojpuri) |
| मुख्य विषय (Theme) | छठ पूजा, सूर्य उपासना, छठी मैया की महिमा |
| उपयुक्त अवसर (Occasion) | छठ महापर्व (कार्तिक एवं चैत्र मास) |
गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators
भोजपुरी संगीत जगत में अरविंद अकेला 'कल्लू' अपनी अनूठी गायकी और भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए जाने जाते हैं। उनके गाए हुए छठ गीत हर साल त्योहार के दौरान उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और देश-विदेश में बसे भोजपुरी भाषी लोगों के घरों में गूंजते हैं। इस गीत में उन्होंने पारंपरिक लोक धुनों को आधुनिक संगीत के साथ इस प्रकार मिश्रित किया है कि यह युवा पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जोड़ने में सफल रहता है। उनके साथ काम करने वाले संगीतकारों और गीतकारों ने भी इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि गीत की पवित्रता और शास्त्रीय मर्यादा बनी रहे।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| शब्द (Word) | सरल अर्थ (Simple Meaning) | सांस्कृतिक संदर्भ (Context) |
|---|---|---|
| अरघ (Aragh) | अर्घ्य / जल अर्पित करना | सूर्यदेव को तांबे के पात्र या सूप से जल और दूध देना। |
| सुरुजदेव (Surujdev) | सूर्य देव (Sun God) | सृष्टि के प्रत्यक्ष देवता और ऊर्जा के स्रोत। |
| बहंगिया (Bahangia) | बहंगी / कांवड़ | बांस का बना ढांचा जिससे पूजा की सामग्री ढोई जाती है। |
| कहरिया (Kahariya) | कहार / भार उठाने वाला | यहाँ इसका अर्थ श्रद्धापूर्वक पूजा का दउरा उठाने वाले से है। |
| दउरा (Daura) | बांस का बड़ा टोकरा | जिसमें छठ पूजा का मुख्य प्रसाद और फल रखे जाते हैं। |
| ठेकुआ (Thekua) | पारंपरिक महाप्रसाद |
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